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क्या खराब प्रदर्शन के लिए टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम का माहौल है ज़िम्मेदार? लंकाई दौरे पर इम्तिहान से पहले गंभीर और मैनेजमेंट की नई मुश्किल!

शुभमन गिल की अगुवाई में भारतीय क्रिकेट टीम अपने अगले बड़े मिशन के लिए श्रीलंका पहुंच चुकी है. भारतीय खिलाड़ियों की ताज़ा तस्वीरें भी लगातार सामने आ रही हैं. जहां खिलाड़ी प्रैक्टिस करते, आपस में बात करते और मुस्कुराते हुए नज़र आ रहे हैं. वैसे बाहर से तो सब शांत और खुशनुमा दिख रहा है लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट्स इशारा दे रही हैं कि अंदर खामोशी के बजाय तूफान है. रिपोर्ट्स की मानें तो ड्रेसिंग रूम का माहौल एक बार फिर बिगड़ चुका है और निशाने पर हेड कोच गौतम गंभीर हैं. बड़ा सवाल है कि क्या टीम इंडिया की हालिया नाकामियों के लिए यही माहौल ज़िम्मेदार है?

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श्रीलंका का आगामी दौरा महज़ एक द्विपक्षीय सीरीज़ नहीं है. हकीकत में ये वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल की रेस में खुद को ज़िंदा रखने की एक बेहद कठिन और निर्णायक जंग का हिस्सा है. लंकाई शेरों को उन्हीं की मांद में और खासकर उनके जादुई स्पिनरों के खिलाफ धूल चटाना कभी आसान नहीं रहा. यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसे भेदने के लिए टीम इंडिया को अपना सर्वस्व झोंकना होगा.

चुनौती सिर्फ यहीं खत्म नहीं होगी, इसके बाद भारत को न्यूज़ीलैंड की तेज़ और चुनौतीपूर्ण पिचों पर दो टेस्ट मैचों की अहम विदेशी सीरीज़ खेलनी है. आखिर में सामना खूंखार ऑस्ट्रेलियाई टीम से 5 मैचों की बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी में होगा. जब आगे का सफर कांटों से भरा हो, तो ड्रेसिंग रूम का हर तनाव एक बड़े तूफान का संकेत देता है.

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गौतम गंभीर का बतौर कोच कार्यकाल

टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर के पिछले दो साल के कोचिंग कार्यकाल या सफर पर नज़र डालें, तो लिमिटेड ओवर्स यानी व्हाइट बॉल क्रिकेट में हमने कमाल का खेल दिखाया है. 2025 की ICC चैंपियंस ट्रॉफी और उसके बाद 2026 के T20 वर्ल्ड कप में टीम इंडिया ने जिस बेखौफ और निडर अंदाज़ में ट्रॉफियां अपने नाम कीं, उसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया.

सही मायनों में व्हाइट बॉल क्रिकेट में गंभीर की आक्रामक सोच और रिस्क लेने की क्षमता ने टीम को एक नई ऊर्जा दी. इन जीत ने यह साबित किया कि जब हमारे खिलाड़ी अपनी पूरी लय में होते हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत उनके सामने टिक नहीं पाती. बिना किसी शक, गंभीर के कार्यकाल में एक फैन के तौर पर हमें जीत का जश्न मनाने के कई मौके मिले. हालांकि एक कड़वा सच यह भी है कि गौतम गंभीर का यही कार्यकाल भारतीय क्रिकेट फैंस के लिए कई खौफनाक और तकलीफदेह यादों का भी गवाह रहा है.

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रेड बॉल और विदेशी दौरों की नाकामी कैसे भूलें

यह दूसरा सच वो है जो काफी परेशान करने वाला है. रेड बॉल क्रिकेट में हमारी तस्वीर एकदम उलट और बेचैन करने वाली नज़र आती है. वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप की मौजूदा साइकिल में हम नौ में से सिर्फ चार मैच जीत पाए हैं और पॉइंट्स टेबल में लुढ़ककर पांचवें नंबर पर खिसक गए हैं. पिछली साइकिल के दौरान घर में न्यूज़ीलैंड के हाथों 0-3 का क्लीन स्वीप और फिर ऑस्ट्रेलिया में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में 1-4 की शर्मनाक हार ने हमारी साख पर गहरी चोट की.

नई साइकिल में भी साउथ अफ्रीका से घर पर 0-2 की हार फैंस के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी. वैसे सिर्फ टेस्ट ही नहीं, हाल ही में विदेशी दौरों पर लिमिटेड ओवर्स में भी हम बुरी तरह लड़खड़ाए. आयरलैंड से टी20 सीरीज़ में 0-2 और इंग्लैंड से 0-4 की दिल तोड़ने वाली हार इस बात का सबूत है कि हमारी रणनीतियों में कहीं न कहीं बहुत बड़ी सेंध लग चुकी है. इंग्लैंड में वनडे सीरीज़ में भी हम सिर्फ एक मैच ही जीत सके. यह हालात सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर हमारी स्ट्रेटेजी कहां फेल हो रही है?

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क्या ड्रेसिंग रूम का माहौल है हार की वजह?

वैसे इन तमाम सवालों पर मंथन तो जारी रहेगा. लेकिन इसी बीच एक मीडिया रिपोर्ट ने ड्रेसिंग रूम में सुलग रही आग का बड़ा दावा किया है. रिपोर्ट सही है या गलत, यह कहना मुश्किल है लेकिन उसे देखकर एक सवाल पक्का उठता है. सवाल ये कि, ‘क्या टीम इंडिया की इस दुर्दशा के पीछे यही आपसी मनमुटाव और ड्रेसिंग रूम का दमघोंटू माहौल ज़िम्मेदार है?’ मुझे लगता है कि जब किसी भी टीम का अंदरूनी माहौल रिलैक्स और सुरक्षित नहीं होता तो उसका सीधा असर मैदान पर खिलाड़ियों के फोकस पर पड़ता है.

एक खिलाड़ी जब पिच पर उतरता है तो उसे मैनेजमेंट के पूरे सपोर्ट और अटूट विश्वास की ढाल चाहिए होती है. लेकिन अगर ड्रेसिंग रूम में ही एक-दूसरे पर भरोसा न हो और ‘ब्लेम गेम’ की राजनीति चल रही हो तो कोई भी अपना स्वाभाविक खेल कैसे खेल पाएगा? एक तरफ टीम इंडिया में गलत सिलेक्शन से लेकर मैदानी रणनीति पर राजनीति हो रही है, तो दूसरी तरफ विदेशी दौरों के अलावा रेड बॉल क्रिकेट में हमें करारी हार मिल रही है. अगर खिलाड़ियों का आधा ध्यान क्रिकेट के बजाय इस बात पर लगा रहेगा कि मैनेजमेंट पीठ पीछे उनकी क्या कमियां निकाल रहा है, तो फिर परफॉर्मेंस की उम्मीद करना बेमानी है.

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हार का ठीकरा और कम्यूनिकेशन गैप की खाई

मीडिया रिपोर्ट्स में उभरकर आई सबसे तकलीफदेह बात है, हार का ठीकरा दूसरों पर डाल देना. हालिया दिनों में कई मौकों पर हमने देखा कि जब भी टीम हारती है, तो कोचिंग स्टाफ यहां ज़िम्मेदारी लेने की बजाय खिलाड़ियों के एग्जीक्यूशन या NCA की फिटनेस ट्रेनिंग पर उंगली उठा देता है. मेरी राय में, एक सच्चा लीडर और महान कोच वही होता है जो मुश्किल वक्त में टीम के आगे एक चट्टान की तरह खड़ा रहे.

जो जीत का सेहरा खिलाड़ियों के सिर बांधे और हार का ज़हर खुद पी ले. लेकिन अगर हार का ठीकरा हमेशा खिलाड़ियों पर ही फूटेगा, तो उनके और मैनेजमेंट के बीच भरोसे की डोर टूटना तय है. इसी वजह से शायद कुछ सीनियर खिलाड़ी अब खुद को मैनेजमेंट से कटा हुआ और अलग-थलग महसूस कर रहे हैं.

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‘बाहरी शोर’ कहकर इग्नोर करना कितना सही?

अक्सर क्रिकेटर्स और मैनेजमेंट की तरफ से यह रटा-रटाया बयान सुनने को मिलता है कि वे मीडिया रिपोर्ट्स या ‘बाहरी बातों’ पर ध्यान नहीं देते. खुद गौतम गंभीर ने भी एक वक्त पर खुलेआम यही कहा था कि हार के वक्त लोग बाहर बैठकर मनगढ़ंत कहानियां बनाते हैं. यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन कभी भी बिना आग के धुआं नहीं उठता.

अगर सीनियर खिलाड़ी बीसीसीआई के अधिकारियों या अपने करीबियों के पास अपनी चिंताएं लेकर जा रहे हैं तो इसे सिर्फ ‘बाहरी शोर’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. सच्चाई से आंखें मूंदने के बजाय यहां ज़रूरत इस बात की है कि मैनेजमेंट आगे बढ़कर खिलाड़ियों से सीधे और खुले मन से संवाद करे. जिससे अविश्वास की हर दीवार को गिराया जा सके.

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पुराने कड़वे अनुभवों से सबक लेना ज़रूरी

टीम इंडिया के इतिहास में ऐसे चैप्टर पहले भी आ चुके हैं जब कोच और खिलाड़ियों के बीच के टकराव ने टीम को बद्हाली में धकेल दिया. यहां मुझे बतौर कोच ग्रेग चैपल और सौरव गांगुली, फिर हेड कोच रहते हुए अनिल कुंबले और विराट कोहली का दौर याद आता है. तब विचारों के टकराव ने टीम का काफी नुकसान किया था. इसके अलावा टीम में साथ-साथ खेल रहे क्रिकेटर्स के बीच हुए विवादों और तनाव से भी कई मौकों पर ड्रेसिंग रूम का माहौल खराब हुआ है.

वैसे गौतम गंभीर की टीम के एक असिस्टेंट कोच ने हाल ही में सफाई दी है कि ड्रेसिंग रूम में सब आपस में बात कर रहे हैं लेकिन फिर भी हमें इतिहास की गलतियों से सीखना ही होगा. पुरानी गलतियों को दोहराकर हम अपने क्रिकेट का ही नुकसान करेंगे. एक तनावमुक्त और खुशहाल ड्रेसिंग रूम ही मैदान पर चैंपियन पैदा करता है, डर और असुरक्षा का माहौल नहीं.

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वर्ल्ड चैंपियन कप्तान सूर्यकुमार यादव की क्या थी गलती?

ड्रेसिंग रूम के माहौल की खबरों और इन हार-जीत के अलावा एक बात जिसने मुझे सबसे ज्यादा आहत किया है, वो है सूर्यकुमार यादव को लेकर लिया गया सिलेक्टर्स या टीम मैनेजमेंट का फैसला. 2026 में अपनी कप्तानी में देश को T20 वर्ल्ड कप का ताज पहनाने वाले इस चैंपियन से अचानक ‘फ्यूचर प्लानिंग’ के नाम पर कप्तानी छीन लेना किसी के गले नहीं उतरा.

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बात सिर्फ कप्तानी छिनने तक नहीं रुकी, बाद में उन्हें टीम से ही ड्रॉप कर दिया गया. उनकी जगह जिन श्रेयस अय्यर को कप्तानी सौंपी गई है वो तो खुद टीम पर बोझ साबित हो रहे हैं. मुझे लगता है कि जो खिलाड़ी देश को विश्व विजेता बनाकर लौटा हो उसके साथ ऐसा बर्ताव किसी भी युवा खिलाड़ी के मन में असुरक्षा के बीज बो देगा. अगर वर्ल्ड कप जिताने के बाद भी आपकी जगह टीम में पक्की नहीं है, तो एक खिलाड़ी खुद को महफूज़ कैसे समझेगा?

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संन्यास की टीस, नाराज़गी और सिलेक्शन के गंभीर सवाल!

वैसे ड्रेसिंग रूम में बढ़ते इस तनाव की स्क्रिप्ट में सिर्फ एक या दो फैसले ज़िम्मेदार नहीं हैं. पिछले कुछ समय में विराट कोहली, रोहित शर्मा और आर अश्विन जैसे दिग्गजों के टेस्ट संन्यास और उनकी नाराज़गी से जुड़ी खबरों ने करोड़ों फैंस के दिलों को छलनी कर दिया. ऐसा लगा मानो इन महानायकों को वह विदाई नहीं मिली जिसके वे असली हकदार थे.

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इसके अलावा अजीत अगरकर वाली सिलेक्शन कमेटी के फैसलों को लेकर भी एक अजीब सी ज़िद देखने को मिली. कुछ चेहरों को लगातार फ्लॉप होने के बावजूद टीम में मौके पर मौके परोसे गए, जबकि मोहम्मद शमी और भुवनेश्वर कुमार जैसे बड़े मैच विनर्स और अनुभवी गेंदबाज़ों को हाशिये पर धकेल दिया गया. बताने की ज़रूरत नहीं कि जब चयन के पैमाने इतने धुंधले हों तो टीम के अंदर खिलाड़ियों का मनोबल टूटना लाज़िमी है.

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गंभीर के लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ वाले हालात

कुल मिलाकर देखा जाए तो फिलहाल सब कुछ इसी बात पर आकर टिकता है कि टीम इंडिया का अल्टीमेट गोल क्या है? जब टीम की जर्सी के सीने पर ‘इंडिया’ लिखा होता है, तो हर निजी अहंकार या हर छोटी-बड़ी नाराज़गी ड्रेसिंग रूम के दरवाज़े पर ही छूट जानी चाहिए. गौतम गंभीर अपने समय के एक महान क्रिकेटर और फाइटर रहे हैं. वो बाखूबी जानते हैं कि जीत के लिए पूरी टीम का एक मुट्ठी की तरह बंधना कितना ज़रूरी है.

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गंभीर को खुद यह समझना होगा कि उनका कोई भी विज़न तभी साकार होगा, जब पूरी टीम बिना किसी खौफ के उनके साथ खड़ी हो. श्रीलंका सीरीज़ एक नई और सकारात्मक शुरुआत करने का सबसे बेहतरीन मौका है. उम्मीद है कि गंभीर और बीसीसीआई टीम के खिलाड़ियों के साथ मिलकर ऐसा पारदर्शी माहौल बनाएंगे जहां एकमात्र लक्ष्य जीत होगा. इस बदलाव में रोहित और विराट जैसे दिग्गजों का भविष्य और वर्ल्ड कप 2027 की रणनीति भी शामिल है. क्योंकि अगर यह बदलाव अब नहीं हुआ तो शायद आगे चलकर बहुत देर हो जाएगी.

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First published on: Aug 05, 2026 06:42 PM

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