उद्धव खेमे में टूट से किसे होगा फायदा, कैसे बदल जाएगी महाराष्ट्र और दिल्ली की सियासत? समझें पूरा गणित
शिवसेना (UBT) के छह सांसदों द्वारा एक अलग संसदीय समूह बनाने की सुगबुगाहट ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चाओं को हवा दे दी है.
Edited By Arif Khan

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महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं. साल 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई ऐतिहासिक बगावत के बाद, अब उद्धव ठाकरे को एक और करारा झटका लग सकता है. शिवसेना (UBT) के छह सांसदों द्वारा एक अलग संसदीय समूह बनाने की सुगबुगाहट ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चाओं को हवा दे दी है. सियासी गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ये छह सांसद क्यों छोड़ रहे हैं, बल्कि यह है कि इसके लिए यही समय क्यों चुना गया? जानकार बताते हैं कि यह कोई रातों-रात हुआ घटनाक्रम नहीं है, बल्कि इसके पीछे महीनों की सीक्रेट स्ट्रेटेजी काम कर रही है.
अलग होने की राह देख रहे इन बागी सांसदों और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले खेमे के बीच पिछले कई महीनों से बंद दरवाजों के पीछे लगातार बातचीत चल रही थी. दोनों ही पक्ष सिर्फ एक सही और मजबूत राजनीतिक अवसर के इंतजार में थे. पिछले एक साल के दौरान इन बागी सांसदों ने मुंबई और दिल्ली में बेहद गोपनीय तरीके से कई दौर की बैठकें की हैं. हालांकि, उद्धव गुट के नेता लगातार इन खबरों का खंडन करते रहे और दावा करते रहे कि उनकी पार्टी पूरी तरह एकजुट है, लेकिन हाल के दिनों में शिंदे खेमे की आश्वस्त बॉडी लैंग्वेज और उनकी राजनीतिक व्यस्तताओं ने साफ कर दिया था कि पर्दे के पीछे कुछ बहुत बड़ा पक रहा है.
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‘ऑपरेशन टाइगर’ की टाइमिंग इसका सबसे दिलचस्प और रणनीतिक पहलू है. 19 जून को शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस है, जिसकी नींव दिवंगत बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी. अगर इन बागी सांसदों को स्थापना दिवस के भव्य समारोह के आसपास शिंदे गुट में शामिल किया जाता है, तो इसका बहुत बड़ा प्रतीकात्मक महत्व होगा. साल 2022 में विधायकों को तोड़कर विधायी विंग पर कब्जा करने के बाद, अब स्थापना दिवस पर सांसदों को तोड़कर शिंदे खुद को असली शिवसेना का एकमात्र वारिस साबित करने का संदेश देंगे. वहीं, उद्धव ठाकरे के लिए यह सिर्फ संख्याओं का नुकसान नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व और सांगठनिक पकड़ पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान होगा.
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इस संभावित टूट के तार दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति से भी जुड़े हैं. संसद का मानसून सत्र बेहद करीब है, ऐसे में एनडीए गठबंधन के लिए हर एक सांसद की संख्या बेहद अहम है. अगर उद्धव गुट के 6 सांसद शिंदे की शिवसेना के जरिए एनडीए के पाले में आते हैं, तो लोकसभा में सत्तापक्ष का आंकड़ा और मजबूत होगा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनडीए तात्कालिक संसदीय आंकड़ों से कहीं आगे की सोच रहा है. चर्चाएं हैं कि सरकार आगामी सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक और चुनावी सुधारों को दोबारा पेश करने की योजना बना रही है. इसके लिए संविधान संशोधन पास कराने हेतु दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, और यह ‘ऑपरेशन टाइगर’ उसी रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है.
अगर यह ऑपरेशन सफल होता है, तो एकनाथ शिंदे को महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक बड़ा सियासी फायदा मिलेगा. लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो जाएगी, जिससे एनडीए के भीतर उनकी मोलतोल करने की शक्ति काफी बढ़ जाएगी. वर्तमान में शिंदे की शिवसेना के पास केवल राज्य मंत्री के पद हैं. सांसदों की संख्या 13 होने के बाद केंद्रीय कैबिनेट में पूर्ण मंत्री पद के लिए उनका दावा बेहद मजबूत हो जाएगा. महाराष्ट्र की सत्ताधारी महायुति के भीतर भी शिंदे एक अधिक प्रभावशाली और कद्दावर नेता के रूप में उभरेंगे.
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2022 की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे ने जनसंपर्क और सहानुभूति के सहारे अपनी जमीन बचाए रखी थी. लेकिन सांसदों का यह अलगाव उनके राष्ट्रीय अस्तित्व पर सीधा प्रहार करेगा. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस खतरे को भांपते हुए शिवसेना (UBT) के संसदीय नेता अरविंद सावंत ने तुरंत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि वे पार्टी का पक्ष सुने बिना किसी भी अलग गुट को मान्यता न दें.
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