एक छत के नीचे 6 सास और 14 बहुएं, परिवार में कुल 83 सदस्य; आंध्र के नागप्पा फैमिली की कहानी कर देगी हैरान
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में नागप्पा परिवार की छह पीढ़ियां आज भी एक साथ रहती हैं. 83 सदस्यों वाले इस कुनबे में 14 बहुएं और 20 बच्चे हैं. चार घरों में रहने के बावजूद परिवार की रसोई, कमाई और रोजमर्रा की व्यवस्था साझा है.
Edited By : Versha Singh|Updated: Aug 13, 2026 12:30
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आज के दौर में जहां परिवार छोटे होते जा रहे हैं और नौकरी-रोजगार के चलते लोग अलग-अलग शहरों में बस रहे हैं, वहीं आंध्र प्रदेश का एक परिवार आज भी संयुक्त परिवार की पुरानी परंपरा को मजबूती से निभा रहा है. जिसने लोगों को हैरान कर दिया है. अनंतपुर जिले के कुरलापल्ली गांव का नागप्पा परिवार अपने आप में खास है. इस परिवार में 83 सदस्य और छह पीढ़ियां एक साथ रहती हैं. परिवार में छह सास, 14 बहुएं और 20 बच्चे भी हैं.
परिवार के सदस्य चार आस-पास बने घरों में रहते हैं, लेकिन इनके बीच घरों की दीवारें रिश्तों के बीच दूरी नहीं बनातीं. रोजमर्रा की जिंदगी में परिवार खुद को एक ही इकाई मानता है. खाना एक साथ बनता है, घर का खर्च भी आपस में बांटा जाता है और घरेलू काम से लेकर खेती-बाड़ी तक की जिम्मेदारियां मिल-जुलकर संभाली जाती हैं. परिवार के बड़े सदस्य कई अहम फैसले सामूहिक रूप से लेते हैं.
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सुबह की बैठक में तय होता है दिनभर का काम
इतने बड़े परिवार को संभालने के लिए यहां काम का बंटवारा भी व्यवस्थित तरीके से किया जाता है. परिवार के मुखिया हनुमंतरायडु ने बताया कि बुजुर्ग सदस्य हर सुबह चाय-कॉफी के दौरान बैठते हैं. इसी दौरान दिनभर के काम, खाने के मेन्यू और खेती से जुड़े कार्यों की योजना बनाई जाती है.
परिवार के कुछ सदस्य खेतों में काम करने निकल जाते हैं, जबकि कुछ लोग घर पर रहकर खाना बनाने और दूसरे घरेलू कामों की जिम्मेदारी संभालते हैं. घर की जरूरत का सामान खरीदने की जिम्मेदारी भी परिवार के बड़े सदस्यों के पास होती है.
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VIDEO | Anantpur, Andhra Pradesh: Six generations, 83 members; Nagappa family in Andhra Pradesh keeps the joint family legacy alive.
In an age of shrinking families, the Nagappa family in Kurlapalli village in Anantpur district of Andhra Pradesh stands as a rare example of… pic.twitter.com/kesZ5zgMJN
नागप्पा परिवार की सबसे खास बात इसकी साझा रसोई है. चार अलग-अलग मकानों में रहने के बावजूद परिवार के लिए भोजन एक साथ तैयार किया जाता है. परिवार की बहुएं मिलकर खाना बनाती हैं, जबकि बुजुर्ग सदस्य राशन और दूसरी जरूरी चीजों की व्यवस्था देखते हैं. परिवार की आमदनी भी साझा व्यवस्था का हिस्सा है. खेती के अलावा परिवार के पास चार बसें भी हैं, जो कल्याणदुर्गम और कर्नाटक के कुछ इलाकों के बीच चलती हैं. खेती और परिवहन से होने वाली आय को परिवार मिलकर संभालता है.
बात बढ़े तो उसी दिन कर लेते हैं सुलह
83 लोगों के इतने बड़े परिवार में विचारों का टकराव होना कोई असामान्य बात नहीं है. परिवार के बुजुर्ग भी मानते हैं कि कभी-कभी सदस्यों के बीच मतभेद हो जाते हैं, लेकिन कोशिश रहती है कि नाराजगी को ज्यादा देर तक न रखा जाए. दिन खत्म होने से पहले परिवार के लोग साथ बैठकर बातचीत करते हैं और आपसी विवाद को सुलझाने की कोशिश करते हैं. उनका मानना है कि सम्मान, सहयोग और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना ही परिवार को जोड़े रखने की सबसे बड़ी ताकत है. यही पारिवारिक समझ छह पीढ़ियों को आज भी एक साथ रहने की वजह बनी हुई है.
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चौथी पीढ़ी संभालती है परिवार की जिम्मेदारी
नागप्पा परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य महेश पर अब पूरे परिवार की कई अहम जिम्मेदारियां हैं. उनके मुताबिक, परिवार में एक साथ रहने की परंपरा नागप्पा के समय से चली आ रही है और अब यह छह पीढ़ियों तक पहुंच गई है. बुजुर्गों ने बाहरी कामकाज की जिम्मेदारी काफी हद तक महेश को सौंप दी है.
महेश बताते हैं कि परिवार के लिए रोजमर्रा का राशन जुटाने से लेकर किसी सदस्य के इलाज, बच्चों की पढ़ाई से जुड़े खर्च और किताबों की व्यवस्था तक का काम उन्हें देखना होता है. इसके अलावा वाहनों की देखरेख और बैंक से जुड़े काम भी उनकी जिम्मेदारियों में शामिल हैं. उनका कहना है कि इतने बड़े परिवार की जरूरतों को संभालना चुनौती जरूर है, लेकिन इसे लेकर उन्हें गर्व महसूस होता है. परिवार में उम्र और जिम्मेदारियों के स्तर पर अंतर हो सकता है, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपनापन आज भी बना हुआ है.
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खेती से लेकर बसों के कारोबार तक, आय के कई साधन
नागप्पा परिवार की आर्थिक व्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती पर टिका है. करीब 120 एकड़ जमीन पर परिवार खेती करता है, जिसमें मूंगफली, टमाटर, बैंगन, तरबूज, पपीता और मिर्च जैसी फसलें उगाई जाती हैं. इसके अलावा परिवार मिलकर ‘श्री कृष्णा हनुमान ट्रेवल्स’ की पांच बसों का संचालन भी करता है.
परिवार के पास पशुधन और खेती से जुड़े संसाधनों की भी अच्छी व्यवस्था है. इनके पास करीब 1000 भेड़ें, 70 भैंसें, तीन ट्रैक्टर, एक बोलेरो और एक आयशर ट्रक हैं. यानी परिवार की आजीविका केवल एक ही काम पर निर्भर नहीं है.
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चूल्हे पर बनता है खाना
बड़े परिवार की रसोई में आज भी आधुनिक साधनों के साथ पारंपरिक खान-पान की झलक देखने को मिलती है. यहां मिट्टी और लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाने की परंपरा आज भी चली आ रही है. सुबह और शाम रागी संगटी और ज्वार की रोटियां तैयार की जाती हैं, जो परिवार के नियमित भोजन का हिस्सा हैं.
त्योहारों और खास मौकों पर परिवार की रसोई का काम और भी बढ़ जाता है. ऐसे अवसरों पर जब पूरा परिवार एक जगह जुटता है, तो बड़ी मात्रा में खाना तैयार किया जाता है. परिवार के सदस्यों के मुताबिक, एक ही भोजन के लिए कई किलो चिकन और करीब तीन बकरे तक पकाए जाते हैं.