मराठी भाषा विवाद के बीच मुंबई से निकला सौहार्द का संदेश, उत्तर भारतीय संघ ने मराठी महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

मराठी भाषा विवाद के बीच मुंबई में सौहार्द की मिसाल, उत्तर भारतीय संघ ने मराठी महिलाओं को सिलाई मशीनें देकर आत्मनिर्भर बनाने की पहल की. कृपाशंकर सिंह और प्रताब सरनाईक के बयान के बीच सामाजिक एकता का संदेश.

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महाराष्ट्र दिवस पर जहां राज्य की राजनीति मराठी भाषा के मुद्दे पर गर्म दिखाई दी, वहीं मुंबई में एक ऐसा आयोजन हुआ जिसने भाषा की बहस के बीच सामाजिक सौहार्द और अपनत्व की तस्वीर पेश की. उत्तर भारतीय समाज के बड़े संगठन “उत्तर भारतीय संघ” ने जरूरतमंद मराठी महिलाओं को सिलाई मशीनें वितरित कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने की पहल की.

कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर चर्चा चरम पर है. राज्य सरकार में मंत्री प्रताब सरनाईक के उस बयान ने राजनीतिक हलकों से लेकर सड़क तक बहस छेड़ दी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र में रोजगार और व्यवसाय करने वालों को मराठी भाषा आना जरूरी है. खासतौर पर ऑटो और टैक्सी चालकों को मराठी सीखने की बात को लेकर माहौल गर्म है.

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इसी माहौल के बीच मुंबई में आयोजित महाराष्ट्र दिवस समारोह में उत्तर भारतीय समाज ने टकराव नहीं, बल्कि तालमेल का संदेश देने की कोशिश की. मंच से भाजपा नेता कृपा शंकर सिंह ने कहा कि महाराष्ट्र ने उत्तर भारतीय समाज को काम, सम्मान और पहचान दी है, इसलिए यहां की भाषा और संस्कृति का सम्मान करना हर किसी की जिम्मेदारी है.

कृपाशंकर सिंह ने कहा कि उत्तर भारतीय समाज मराठी सीखने की चुनौती स्वीकार करता है. उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले समय में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय मराठी बोलना सीखेंगे. उन्होंने यहां तक कहा कि अगले महाराष्ट्र दिवस पर मुंबई का उत्तर भारतीय रिक्शा चालक भी पूरे आत्मविश्वास के साथ महाराष्ट्र का राजकीय गीत गाता दिखाई देगा.

समारोह में सबसे ज्यादा ध्यान उस पल ने खींचा, जब मराठी महिलाओं को सिलाई मशीनें सौंपी गईं. उत्तर भारतीय संघ का कहना है कि यह केवल मशीन वितरण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की छोटी कोशिश है. संगठन के अध्यक्ष संतोष सिंह ने कहा कि महाराष्ट्र ने उत्तर भारतीयों को अपनाया है और अब समाज को भी राज्य के लोगों के लिए आगे आना चाहिए.

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संतोष सिंह ने कहा कि मराठी भाषा इस राज्य की पहचान है. यह सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और स्वाभिमान से जुड़ी हुई है. उन्होंने कहा कि “जय महाराष्ट्र” केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि दिल से निकली भावना है.

उन्होंने बताया कि उत्तर भारतीय संघ अब अपने संस्थानों में मराठी सिखाने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू करेगा, ताकि महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीय स्थानीय भाषा से और बेहतर तरीके से जुड़ सकें.

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भाषा को लेकर बढ़ती राजनीतिक बयानबाजी के बीच मुंबई में हुआ यह आयोजन एक अलग तस्वीर पेश करता नजर आया, जहां मंच पर मराठी और उत्तर भारतीय समाज साथ दिखाई दिए और संदेश यही देने की कोशिश हुई कि भाषा का सम्मान और सामाजिक सहयोग साथ-साथ चल सकते हैं.

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