2025 वर्ल्ड कप क्या ‘तुक्का’ था? लॉर्ड्स की हार ने क्यों खोल दी है भारतीय महिला क्रिकेट की पोल!
कुछ दिन पहले वुमेन्स टी20 वर्ल्ड कप में भारतीय लड़कियों ने पाकिस्तान को पटखनी देकर पूरे देश को जश्न का मौका दिया था. उस वक्त सोचा नहीं था कि शायद वर्ल्ड कप खत्म होने से भी पहले, मुझे अपनी ही टीम के बारे में एक ऐसा ओपिनियन पीस भी लिखना पड़ेगा. लेकिन सच कहूं तो आज मैं मजबूर होकर, भारतीय महिला क्रिकेट के शिखर से शून्य पर गिरने की दास्तां लिख रहा हूं. दरअसल पिछले साल 2025 में वन-डे वर्ल्ड कप जीतने का जो खुमार भारतीय महिला क्रिकेट के फैंस के सिर चढ़ा था, वह जून 2026 के टी-20 वर्ल्ड कप में लॉर्ड्स की शर्मनाक हार के साथ टूट गया. ना जाने क्यों टीम का प्रदर्शन देखने के बाद पुराने कई दर्द फिर ताज़ा हो गए हैं.
Indian Womens Cricket Team: क्या गजब का छलावा था वो! मई 2025 की वो खुशनुमा रात आज भी आंखों के सामने तैर जाती है. हमारी लड़कियों ने पहली बार क्रिकेट इतिहास में वन-डे वर्ल्ड कप की ट्रॉफी जो चूमी थी. उस दिन हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था. लेकिन महज़ एक साल बाद ही उम्मीदों का वो आलीशान महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया है.
जून 2026 में लॉर्ड्स का ऐतिहासिक मैदान और आईसीसी वुमेन्स टी-20 वर्ल्ड कप के ग्रुप स्टेज से ही टीम इंडिया का इस तरह बाहर होना सिर्फ एक शिकस्त नहीं है, यह करोड़ों फैंस के भरोसे का सरेआम कत्ल है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ निर्णायक मैच में मिली 6 विकेट की करारी हार ने दिल पर एक ऐसा गहरा ज़ख्म दिया है, जिसकी टीस लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ेगी.
तिजोरियों की चकाचौंध बनाम मैदान का सन्नाटा
एक सच्चे क्रिकेट फैन के तौर पर जो बात कलेजे को चीरती है, वो है इन खिलाड़ियों को मिलने वाला वीआईपी ट्रीटमेंट और उसके बदले में मिलने वाला यह सन्नाटा. एक दौर था जब महिला क्रिकेटर्स पुरूषों की तुलना में उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर आए दिन शिकायत किया करती थीं. लेकिन आज वक्त बदल गया है, आज भारतीय महिला क्रिकेटर्स के पास विमेंस प्रीमियर लीग (WPL) की चकाचौंध है, संभवत: दुनिया का सबसे महंगा कोचिंग स्टाफ है और बीसीसीआई जैसा दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है जो इनकी हर ख्वाहिश पलकों पर रखता है. सवाल ये है कि जब तिजोरियां इतनी भरी हैं, तो मैदान पर नतीजा हमेशा वही पुराना 'ढाक के तीन पात' क्यों रहता है?
वैसे जानता हूं कि इस सवाल का जवाब, देश के आम क्रिकेट फैन को शायद ही मिलेगा. लेकिन फिर भी देश का हर क्रिकेट फैन आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम की मैनेजमेंट से ये सीधा सवाल ज़रूर पूछना चाहता होगा. सवाल सिर्फ ये, कि साल 2024 में यूएई के शारजाह मैदान पर जब हम टी-20 वर्ल्ड कप से इसी तरह शर्मनाक ढंग से बाहर हुए थे, तब बड़े-बड़े वादे किए गए थे. लेकिन 2026 में लॉर्ड्स पर जो दिखा, वो उसी फ्लॉप स्क्रिप्ट का री-टेलीकास्ट था.
दो साल तक आखिर क्या तैयारी की गई और इसकी जवाबदेही किसकी है? क्या हेड कोच और चयनकर्ताओं का काम सिर्फ बड़े दौरों पर वीवीआईपी प्रोटोकॉल का आनंद लेना है? जब 2024 टी20 वर्ल्ड कप की हार के ज़ख्मों पर 2025 वन-डे वर्ल्ड कप की ट्रॉफी ने पट्टी बांध दी थी, लेकिन जब फॉर्मेट अलग है तो तैयारी भी अलग होनी चाहिए थी. ऐसे में 2026 में हुए इस हश्र की जवाबदेही किसके सिर आएगी?
'हार का डर' Vs बेफिक्र कंगारू?
मेरी राय में रविवार की शाम भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच लॉर्ड्स में जो सबसे बड़ा फासला था, वो था 'हार का डर.' कंगारू टीम बिना किसी खौफ के मैदान पर उतरी थी, जबकि हमारी टीम सिर्फ इस दबाव में खेल रही थी कि कहीं हम हार न जाएं. ऑस्ट्रेलिया ने ऑल-आउट अटैक की रणनीति अपनाई, जबकि भारतीय टीम 'सेफ्टी-फर्स्ट' के चक्कर में पूरी तरह रक्षात्मक हो गई. जो पिच 180-190 रनों की थी, वहां बिना विकेट खोए पावरप्ले खत्म करने के बाद भी हमारी गाड़ी कछुए की रफ्तार से चलती रही. स्मृति मंधाना क्रीज पर सेट होने के चक्कर में रनरेट बढ़ाना भूल गईं, तो जेमिमा रोड्रिग्स भी शुरुआती ओवरों में बड़े शॉट्स खेलने से हिचकिचाती रहीं.
मैनेजमेंट और कोचिंग स्टाफ की दिवालिया सोच तब उजागर हुई जब 17वें ओवर में जेमिमा रोड्रिग्स संघर्ष कर रही थीं. कप्तान हरमनप्रीत कौर ने आखिरी ओवरों में टीम को लड़ने लायक कुछ स्कोर तो दिया लेकिन वहां भी उन्हें दूसरे छोर से कोई सहयोग नहीं मिला. गेंदबाज़ी के दौरान भी श्री-चरणी ने क्रंच सिचुएशन पर नो-बॉल फेंक दी, जिसे टी-20 जैसे फॉर्मेट में किसी खुदकुशी से कम नहीं कहा जा सकता. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जब पेरी और गार्डनर की साझेदारी पनप रही थी, तो हमारे खिलाड़ियों के चेहरों पर खौफ साफ दिख रहा था.
मैच के दौरान कमेंट्री कर रहे पूर्व क्रिकेटर्स ने भी माना कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय टीम मानसिक रूप से तैयारी में कमजोर रह गई. आर-पार के मुकाबले में गेंदबाज़ी के साथ-साथ हमारी फील्डिंग भी किसी डरावने सपने जैसी थी. साउथ अफ्रीका के खिलाफ मैच में राधा यादव जैसी हमारी भरोसेमंद फील्डर द्वारा मैरिज़ेन कैप के दो ऐसे लड्डू कैच टपकाए, जिन्हें देखकर गली-मोहल्ले का कोई बच्चा भी शर्मा जाए. इसके अलावा क्रांति गौड़ जैसी सीनियर खिलाड़ी भी मैदान पर मिसफील्डिंग करने लगें, तो आप ट्रॉफी जीतने का ख्वाब भूल ही जाइए.
अब कोई ये रोना नहीं सुनेगा कि तैयारी का वक्त कम मिला, क्योंकि टीम मई के तीसरे हफ्ते से ही इंग्लैंड में पसीना बहा रही थी. कमी इंग्लैंड के मौसम में नहीं, हमारी खिलाड़ियों के 'किलर इंस्टिंक्ट' में थी. वर्ल्ड कप में हमारी गलतियां कोई इत्तेफाक नहीं थीं, हमारे मानसिक ब्लॉक का सरेआम प्रदर्शन थीं. हमने पाकिस्तान, नीदरलैंड और बांग्लादेश को हराकर अपनी पीठ थपथपा ली, लेकिन जैसे ही ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका जैसी खूंखार टीमें सामने आईं हमारी रणनीतियां बिखर गईं.
हम हर बार एक ही गलती को दोहराकर नए और जादुई नतीजे की उम्मीद नहीं कर सकते. भारतीय महिला क्रिकेट को अब उस सड़ चुके ढर्रे से बाहर निकलना होगा जहां केवल 'पुरानी साख' और 'बड़े नामों' के रसूख पर खिलाड़ियों को टीम में ढोया जाता है. क्या स्मृति मंधाना ने बड़े मैचों में कभी ऐसा प्रदर्शन किया है जो उन्हें कप्तानी की रेस में बनाए रखे? हमें साल 2007 का वो दौर याद करना होगा, जब मेंस क्रिकेट टीम के बड़े नामों को हटाकर महेंद्र सिंह धोनी जैसे युवा और निडर लीडर के हाथ में कमान सौंपी गई थी.
आज महिला क्रिकेट को भी ठीक उसी 'धोनी मोमेंट' और एक मुकम्मल रणनीतिक रीसेट की ज़रूरत है. 2024 टी20 वर्ल्ड कप के बाद पहले हार्दिक को भारतीय टीम की कमान सौंपी गई थी लेकिन फिर सूर्यकुमार यादव को कप्तान बनाया गया. सूर्या की कप्तानी में भारत का 2026 में तीसरी बार वर्ल्ड कप जीतना, सही वक्त पर सही फैसला लिए जाने का इनाम था.
नया खून या अधूरा ख्वाब?
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि शायद अब वक्त आ गया है, जब महिला क्रिकेट में भी बिना किसी ढील के कड़े फैसले लेने होंगे. हमें उन युवा और बेखौफ चेहरों पर दांव लगाना होगा जो दबाव में बिखरना नहीं, बल्कि निखरकर पलटवार करना जानते हों. इस पूरे टी-20 फॉर्मेट को रक्षात्मक सोच से निकालकर एक नई, आक्रामक और मॉडर्न माइंडसेट के साथ खेलना होगा. जब तक हम इस मलबे से सबक लेकर अपनी रगों में वो नया, भूखा और आक्रामक खून नहीं शामिल करेंगे, तब तक 2025 की वो जीत महज़ एक 'तुक्का' कहलाएगी, और टी-20 वर्ल्ड कप की यह ट्रॉफी ताउम्र एक अधूरा और चुभता हुआ ख्वाब बनी रहेगी.
Indian Womens Cricket Team: क्या गजब का छलावा था वो! मई 2025 की वो खुशनुमा रात आज भी आंखों के सामने तैर जाती है. हमारी लड़कियों ने पहली बार क्रिकेट इतिहास में वन-डे वर्ल्ड कप की ट्रॉफी जो चूमी थी. उस दिन हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था. लेकिन महज़ एक साल बाद ही उम्मीदों का वो आलीशान महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया है.
जून 2026 में लॉर्ड्स का ऐतिहासिक मैदान और आईसीसी वुमेन्स टी-20 वर्ल्ड कप के ग्रुप स्टेज से ही टीम इंडिया का इस तरह बाहर होना सिर्फ एक शिकस्त नहीं है, यह करोड़ों फैंस के भरोसे का सरेआम कत्ल है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ निर्णायक मैच में मिली 6 विकेट की करारी हार ने दिल पर एक ऐसा गहरा ज़ख्म दिया है, जिसकी टीस लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ेगी.
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तिजोरियों की चकाचौंध बनाम मैदान का सन्नाटा
एक सच्चे क्रिकेट फैन के तौर पर जो बात कलेजे को चीरती है, वो है इन खिलाड़ियों को मिलने वाला वीआईपी ट्रीटमेंट और उसके बदले में मिलने वाला यह सन्नाटा. एक दौर था जब महिला क्रिकेटर्स पुरूषों की तुलना में उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर आए दिन शिकायत किया करती थीं. लेकिन आज वक्त बदल गया है, आज भारतीय महिला क्रिकेटर्स के पास विमेंस प्रीमियर लीग (WPL) की चकाचौंध है, संभवत: दुनिया का सबसे महंगा कोचिंग स्टाफ है और बीसीसीआई जैसा दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है जो इनकी हर ख्वाहिश पलकों पर रखता है. सवाल ये है कि जब तिजोरियां इतनी भरी हैं, तो मैदान पर नतीजा हमेशा वही पुराना ‘ढाक के तीन पात’ क्यों रहता है?
AUSTRALIA HAS KNOCKED INDIA OUT OF THE T20 WORLD CUP 💔
वैसे जानता हूं कि इस सवाल का जवाब, देश के आम क्रिकेट फैन को शायद ही मिलेगा. लेकिन फिर भी देश का हर क्रिकेट फैन आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम की मैनेजमेंट से ये सीधा सवाल ज़रूर पूछना चाहता होगा. सवाल सिर्फ ये, कि साल 2024 में यूएई के शारजाह मैदान पर जब हम टी-20 वर्ल्ड कप से इसी तरह शर्मनाक ढंग से बाहर हुए थे, तब बड़े-बड़े वादे किए गए थे. लेकिन 2026 में लॉर्ड्स पर जो दिखा, वो उसी फ्लॉप स्क्रिप्ट का री-टेलीकास्ट था.
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दो साल तक आखिर क्या तैयारी की गई और इसकी जवाबदेही किसकी है? क्या हेड कोच और चयनकर्ताओं का काम सिर्फ बड़े दौरों पर वीवीआईपी प्रोटोकॉल का आनंद लेना है? जब 2024 टी20 वर्ल्ड कप की हार के ज़ख्मों पर 2025 वन-डे वर्ल्ड कप की ट्रॉफी ने पट्टी बांध दी थी, लेकिन जब फॉर्मेट अलग है तो तैयारी भी अलग होनी चाहिए थी. ऐसे में 2026 में हुए इस हश्र की जवाबदेही किसके सिर आएगी?
‘हार का डर’ Vs बेफिक्र कंगारू?
मेरी राय में रविवार की शाम भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच लॉर्ड्स में जो सबसे बड़ा फासला था, वो था ‘हार का डर.’ कंगारू टीम बिना किसी खौफ के मैदान पर उतरी थी, जबकि हमारी टीम सिर्फ इस दबाव में खेल रही थी कि कहीं हम हार न जाएं. ऑस्ट्रेलिया ने ऑल-आउट अटैक की रणनीति अपनाई, जबकि भारतीय टीम ‘सेफ्टी-फर्स्ट’ के चक्कर में पूरी तरह रक्षात्मक हो गई. जो पिच 180-190 रनों की थी, वहां बिना विकेट खोए पावरप्ले खत्म करने के बाद भी हमारी गाड़ी कछुए की रफ्तार से चलती रही. स्मृति मंधाना क्रीज पर सेट होने के चक्कर में रनरेट बढ़ाना भूल गईं, तो जेमिमा रोड्रिग्स भी शुरुआती ओवरों में बड़े शॉट्स खेलने से हिचकिचाती रहीं.
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मैच के दौरान कमेंट्री कर रहे पूर्व क्रिकेटर्स ने भी माना कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय टीम मानसिक रूप से तैयारी में कमजोर रह गई. आर-पार के मुकाबले में गेंदबाज़ी के साथ-साथ हमारी फील्डिंग भी किसी डरावने सपने जैसी थी. साउथ अफ्रीका के खिलाफ मैच में राधा यादव जैसी हमारी भरोसेमंद फील्डर द्वारा मैरिज़ेन कैप के दो ऐसे लड्डू कैच टपकाए, जिन्हें देखकर गली-मोहल्ले का कोई बच्चा भी शर्मा जाए. इसके अलावा क्रांति गौड़ जैसी सीनियर खिलाड़ी भी मैदान पर मिसफील्डिंग करने लगें, तो आप ट्रॉफी जीतने का ख्वाब भूल ही जाइए.
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हम हर बार एक ही गलती को दोहराकर नए और जादुई नतीजे की उम्मीद नहीं कर सकते. भारतीय महिला क्रिकेट को अब उस सड़ चुके ढर्रे से बाहर निकलना होगा जहां केवल ‘पुरानी साख’ और ‘बड़े नामों’ के रसूख पर खिलाड़ियों को टीम में ढोया जाता है. क्या स्मृति मंधाना ने बड़े मैचों में कभी ऐसा प्रदर्शन किया है जो उन्हें कप्तानी की रेस में बनाए रखे? हमें साल 2007 का वो दौर याद करना होगा, जब मेंस क्रिकेट टीम के बड़े नामों को हटाकर महेंद्र सिंह धोनी जैसे युवा और निडर लीडर के हाथ में कमान सौंपी गई थी.
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आज महिला क्रिकेट को भी ठीक उसी ‘धोनी मोमेंट’ और एक मुकम्मल रणनीतिक रीसेट की ज़रूरत है. 2024 टी20 वर्ल्ड कप के बाद पहले हार्दिक को भारतीय टीम की कमान सौंपी गई थी लेकिन फिर सूर्यकुमार यादव को कप्तान बनाया गया. सूर्या की कप्तानी में भारत का 2026 में तीसरी बार वर्ल्ड कप जीतना, सही वक्त पर सही फैसला लिए जाने का इनाम था.
नया खून या अधूरा ख्वाब?
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि शायद अब वक्त आ गया है, जब महिला क्रिकेट में भी बिना किसी ढील के कड़े फैसले लेने होंगे. हमें उन युवा और बेखौफ चेहरों पर दांव लगाना होगा जो दबाव में बिखरना नहीं, बल्कि निखरकर पलटवार करना जानते हों. इस पूरे टी-20 फॉर्मेट को रक्षात्मक सोच से निकालकर एक नई, आक्रामक और मॉडर्न माइंडसेट के साथ खेलना होगा. जब तक हम इस मलबे से सबक लेकर अपनी रगों में वो नया, भूखा और आक्रामक खून नहीं शामिल करेंगे, तब तक 2025 की वो जीत महज़ एक ‘तुक्का’ कहलाएगी, और टी-20 वर्ल्ड कप की यह ट्रॉफी ताउम्र एक अधूरा और चुभता हुआ ख्वाब बनी रहेगी.