माता-पिता की सेवा करना बेटा और बेटी की जिम्मेदारी है, बहू और दामाद इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. कोई शख्स अपनी पत्नी या कोई महिला अपने पति को माता-पिता की सेवा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है. घर के सभी कामों में पुरुष और महिला की बराबर की हिस्सेदारी होनी चाहिए और बराबर की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए. ऐसे में अगर माता-पिता की सेवा करनी हो तो बेटा-बेटी करें, बहू-दामाद को इसके लिए मजबूर न करें, अगर वे न करना चाहें तो. हां अगर रिश्ता और अपनापन दिखाते हुए बहू-दामाद सेवा करें तो उन्हें रोक भी नहीं सकते, लेकिन बेटा-बेटी को पहले अपनी जिम्मेदारी समझनी होगा.
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जबरदस्ती नहीं मर्जी से कर सकते हैं देखभाल
कर्नाटक हाईकोर्ट ने उपरोक्त टिप्पणी की है और एक केस में अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस चिल्लाकुर सुमलता ने 3 अगस्त को नेलमंगला तालुक के एक निवासी की याचिका खारिज की थी और केस का निपटारा किया था. जस्टिस सुमलता ने आदेश दिया था कि दामाद या बहू सास-ससुर की देखभाल अपनी मर्जी से कर सकते हैं, इसे लेकर उनके साथ जबरदस्ती नहीं की जा सकती है. हाईकोर्ट में तुमकुरु की फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी. फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी को गुजारे भत्ते के तौर पर 5000 रुपये और अपनी नाबालिग बेटी के खर्च के लिए 4000 रुपये देने का आदेश दिया था.
शादी के 6 महीने बाद ही बदला पत्नी का रवैया
याचिकाकर्ता ने तुमकुरु फैमिली कोर्ट के आदेश को चैलेंज किया और कहा कि वह मजदूर है और कुली का काम करता है. पत्नी और बेटी के गुजारे भत्ते के लिए तय की गई रकम बहुत ज्यादा है, क्योंकि उसे अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल करनी है. शादी के 6 महीने बाद ही पत्नी का सास-ससुर के प्रति रवैया बदल गया था. उसने सास-ससुर की सेवा करने और घर के सभी काम करने से साफ इनकार कर दिया था. पत्नी अकसर लड़ाई-झगड़ा करके बिना उसकी या उसके माता-पिता की इजाजत के अपने मायके चली जाती थी. इस दलील के खिलाफ जस्टिस सुमलता ने फैसला सुनाया और याचिका खारिज की.
जस्टिस ने याचक की दलीलों को खारिज किया
जस्टिस सुमलता ने कहा कि याचिकाकर्ता की दलील से लगता है कि उसने पत्नी को घर के काम करने और अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए बतौर कर्मचारी हायर किया है. पत्नी इजाजत के बिना मायके चली गई, इस दलील से पता चलता है कि पति अपनी पत्नी के व्यवहार, पसंद-नापसंद को कंट्रोल करना चाहता है और उस पर हुकम चलाना चाहता है. भारतीय महिला जब भी मन करे या जरूरत महसूस करे, अपने माता-पिता से मिलने जा सकती है, इसके लिए उसे किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है. इसलिए पति की याचिका खारिज की जाती है और उसे पत्नी-बेटी को मेंटेनेंस देना ही होगा.
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जस्टिस ने शादी के बंधन का मतलब समझाया
जस्टिस सुमलता ने कहा कि जजमेंट में कहा कि शादी पत्नी या पति को कंट्रोल करने का लाइसेंस नहीं है, बल्कि यह एक पवित्र बंधन है, जो 2 लोगों को आपस में जोड़ता है. रस्में निभाकर 2 लोग पति-पत्नी बनते हैं, लेकिन उनके रिश्ते का आधार भरोसा, सम्मान, प्यार और एक दूसरे की इज्जत है. महिला को अपनी जिंदगी का फैसले लेने का बुनियादी अधिकार है. पति अपनी पत्नी को अपनी इच्छाओं या उम्मीदों के हिसाब से साथ रहने और जीने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. शादी एक व्यक्ति के द्वारा दूसरे की पहचान, आजादी और इच्छा को कंट्रोल करने या कमजोर करने का लाइसेंस नहीं, बल्कि आपसी समझ का बंधन है.