Supreme Court Judgement: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और आत्महत्या के उकसावे से जुड़े एक मामले में बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने एक पति को बरी करते हुए साफ कहा कि पत्नी से कुछ दिनों तक बातचीत बंद कर देना क्रूरता नहीं माना जा सकता. शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक जीवन में मतभेद होना और कभी-कभार की चुप्पी एक सामान्य बात है.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला जयेश कन्नन और उनकी पत्नी संगीता से जुड़ा है. जयेश मस्कट (ओमान) में एक इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे. दोनों की शादी 2 नवंबर 2014 को हुई थी. शादी के कुछ ही दिन बाद 29 नवंबर 2014 को जयेश मस्कट चले गए. इसके बाद संगीता अपने मायके आ गई और 31 जनवरी 2015 को उसने वहां आत्महत्या कर ली.
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मायके जाने के बाद जयेश ने संगीता से फोन पर बात करना बंद कर दिया था. लगातार 13 दिनों तक बात न होने के कारण वह मानसिक रूप से परेशान हो गई और उसने आत्मघाती कदम उठा लिया. इस आधार पर निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने जयेश को आईपीसी की धारा 498A (महिला के प्रति क्रूरता) के तहत दोषी मानते हुए 3 साल की कठोर कैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे मद्रास हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया बरी?
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा. अदालत ने फैसले में निम्नलिखित मुख्य बातें रेखांकित कीं:
- कॉल रिकॉर्ड का न होना: अभियोजन पक्ष ने केवल मौखिक गवाही और व्हाट्सएप मैसेज न आने के रिकॉर्ड पेश किए थे. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ व्हाट्सएप पर मैसेज न आना यह साबित नहीं करता कि बात नहीं हुई, क्योंकि संपर्क सामान्य फोन कॉल से भी हो सकता था. पति का कहना था कि पत्नी का फोन खराब होने के कारण उसने ससुर से बात की थी, जिसे झुठलाने के लिए कोई कॉल रिकॉर्ड नहीं दिया गया.
- साथ रहने के दौरान कोई प्रताड़ना नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि जब तक यह जोड़ा भारत में साथ रहा (2 नवंबर से 29 नवंबर 2014 तक), तब तक क्रूरता या उत्पीड़न का कोई आरोप न तो लगाया गया और न ही साबित हुआ.
- क्रूरता की परिभाषा: 'मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य' मामले के पुराने फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि क्रूरता को लगातार, बार-बार या कम समय के अंतराल में साबित किया जाना चाहिए. छोटी-मोटी लड़ाइयों या कुछ दिनों की चुप्पी को आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता.
अदालत ने माना कि महज 13 दिन बात न होने को आधार बनाकर पति को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और जयेश को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
Supreme Court Judgement: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और आत्महत्या के उकसावे से जुड़े एक मामले में बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने एक पति को बरी करते हुए साफ कहा कि पत्नी से कुछ दिनों तक बातचीत बंद कर देना क्रूरता नहीं माना जा सकता. शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक जीवन में मतभेद होना और कभी-कभार की चुप्पी एक सामान्य बात है.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला जयेश कन्नन और उनकी पत्नी संगीता से जुड़ा है. जयेश मस्कट (ओमान) में एक इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे. दोनों की शादी 2 नवंबर 2014 को हुई थी. शादी के कुछ ही दिन बाद 29 नवंबर 2014 को जयेश मस्कट चले गए. इसके बाद संगीता अपने मायके आ गई और 31 जनवरी 2015 को उसने वहां आत्महत्या कर ली.
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मायके जाने के बाद जयेश ने संगीता से फोन पर बात करना बंद कर दिया था. लगातार 13 दिनों तक बात न होने के कारण वह मानसिक रूप से परेशान हो गई और उसने आत्मघाती कदम उठा लिया. इस आधार पर निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने जयेश को आईपीसी की धारा 498A (महिला के प्रति क्रूरता) के तहत दोषी मानते हुए 3 साल की कठोर कैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे मद्रास हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया बरी?
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा. अदालत ने फैसले में निम्नलिखित मुख्य बातें रेखांकित कीं:
- कॉल रिकॉर्ड का न होना: अभियोजन पक्ष ने केवल मौखिक गवाही और व्हाट्सएप मैसेज न आने के रिकॉर्ड पेश किए थे. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ व्हाट्सएप पर मैसेज न आना यह साबित नहीं करता कि बात नहीं हुई, क्योंकि संपर्क सामान्य फोन कॉल से भी हो सकता था. पति का कहना था कि पत्नी का फोन खराब होने के कारण उसने ससुर से बात की थी, जिसे झुठलाने के लिए कोई कॉल रिकॉर्ड नहीं दिया गया.
- साथ रहने के दौरान कोई प्रताड़ना नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि जब तक यह जोड़ा भारत में साथ रहा (2 नवंबर से 29 नवंबर 2014 तक), तब तक क्रूरता या उत्पीड़न का कोई आरोप न तो लगाया गया और न ही साबित हुआ.
- क्रूरता की परिभाषा: ‘मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य’ मामले के पुराने फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि क्रूरता को लगातार, बार-बार या कम समय के अंतराल में साबित किया जाना चाहिए. छोटी-मोटी लड़ाइयों या कुछ दिनों की चुप्पी को आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता.
अदालत ने माना कि महज 13 दिन बात न होने को आधार बनाकर पति को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और जयेश को सभी आरोपों से बरी कर दिया.