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141 साल पुराना है आरक्षण का इतिहास, जानें भारत में सबसे पहले कब उठी थी मांग और आज क्या चाहते हैं लोग?

भारत में आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग उठी है और आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने की मांग की जा रही है. हालांकि अभी आंदोलन ने तेजी नहीं पकड़ी है, लेकिन सोशल मीडिया ने आंदोलन की चिंगारी को पूरे देश में फैला दिया है.

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देश में आरक्षण हटाओ आंदोलन (आरक्षण सुधार आंदोलन) शुरू हुआ है, जिसका नेतृत्व युवा नेता हर्ष दुबे कर रहे हैं. दिल्ली में जंतर-मंतर पर गत 21 अगस्त को हर्ष दुबे समेत आरक्षण विरोधी लोगों ने एकजुट होकर आरक्षण के वर्तमान नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था है. इसके अलावा एक परिवार एक आरक्षण, क्रीमी लेयर का दायरा बढ़ाने, UGC के नियमों को वापस लेने, SC/ST एक्ट की समीक्षा, सनसेट क्लॉज आदि से जुड़ी मांगें भी प्रदर्शनकारियों ने उठाई हैं. सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को पूरे देश में पहुंचाकर नई बहस छेड़ दी है.

आरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री नड्डा से हुई चर्चा

21 अगस्त को विरोध प्रदर्शन के बाद हर्ष दुबे ने रणबहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक के साथ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की और आरक्षण के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की. वहीं सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि आज देश में कोई जाति ऐसी नहीं है, जिसे आरक्षण न मिल रहा हो. जनरल कैटेगरी में गरीब तबके के लोगों को भी EWS (आर्थिक रूप से कमजोर) वर्ग के तहत 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है. हर्ष दुबे का कहना है कि आरक्षण सुधार आंदोलन का कोई एक चेहरा नहीं होगा. आंदोलन संगठित होकर समूह में शुरू किया है और जो दिल्ली तक आए वो, जो घर बैठे आरक्षण की चर्चा कर रहे हैं, आंदोलन को बढ़ावा दे रहे हैं वे, आरक्षण आंदोलन का चेहरा हैं.

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आरक्षण को लेकर आंदोलनकारियों की मांगें

1. सरकारी नौकरियों, हायर एजुकेशन, स्कॉलरशिप और फीस में राहत के लिए जाति की बजाया आर्थिक आधार पर आधार दिया जाए.

2. एक परिवार एक आरक्षण का नियम लागू होना चाहिए. अगर माता-पिता में से कोई आरक्षण के जरिए उच्च पद पर पहुंचे तो बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए.

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3. अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर का नियम सख्ती से लागू होना चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से मजबूत लोगों की बजाय असली जरूरतमंदों को लाभ मिले.

4. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के द्वारा लागू किए गए जाति-समानता आधारित निर्देशों और नए नियमों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए.

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5. SC/ST एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए उसकी समीक्षा करके इसमें जरूरी बदलाव करने चाहिए या इस कानून को रद्द किया जाना चाहिए.

6. सनसेट क्लॉज होना चाहिए, यानी आरक्षण के खत्म होने की एक निश्चित समयसीमा तय होना चाहिए और समय-समय पर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए.

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141 साल पुराना भारत में आरक्षण का इतिहास

कमजोर, पिछड़े और निम्न वर्ग के लोगों को अन्याय से बचाने और उन्हें समानता के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण दिया जाता है. आरक्षण विशेषकर एजुकेशन और जॉब सेक्टर में दिया जाता है. आरक्षण देकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि भारतीय समाज के सबसे पिछड़े वर्ग तक आरक्षण का लाभ पहुंचे और सभी को समान अवसर मिलें. भारत में आरक्षण का इतिहास करीब 141 साल पुराना है. आजादी से 65 साल पहले ही देश में आरक्षण की मांग उठ चुकी थी और 1882 में हंटर आयोग का आयोग गठन हुआ था. उस समय के महान विचारक, समाज सेवी, लेखक ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने भारत में सबसे पहले निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग उठाई थी.

First published on: Sep 01, 2026 12:39 PM

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About the Author

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल ने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन एवं Mphil कोर्स किया है। 13 साल से डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री से जुड़ी हैं। वर्तमान में BAG Convergence Limited के माल‍िकाना हक वाले News 24 हिंदी डिजिटल विंग में बतौर चीफ सब एडिटर सेवाएं दे रही हैं। यहां की कोर टीम का हिस्सा हैं और नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम, यूटिलिटी, एजुकेशन, फीचर आदि विषयों पर अच्छी पकड़ रखती हैं।

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