देश में आरक्षण हटाओ आंदोलन (आरक्षण सुधार आंदोलन) शुरू हुआ है, जिसका नेतृत्व युवा नेता हर्ष दुबे कर रहे हैं. दिल्ली में जंतर-मंतर पर गत 21 अगस्त को हर्ष दुबे समेत आरक्षण विरोधी लोगों ने एकजुट होकर आरक्षण के वर्तमान नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था है. इसके अलावा एक परिवार एक आरक्षण, क्रीमी लेयर का दायरा बढ़ाने, UGC के नियमों को वापस लेने, SC/ST एक्ट की समीक्षा, सनसेट क्लॉज आदि से जुड़ी मांगें भी प्रदर्शनकारियों ने उठाई हैं. सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को पूरे देश में पहुंचाकर नई बहस छेड़ दी है.
आरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री नड्डा से हुई चर्चा
21 अगस्त को विरोध प्रदर्शन के बाद हर्ष दुबे ने रणबहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक के साथ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की और आरक्षण के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की. वहीं सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि आज देश में कोई जाति ऐसी नहीं है, जिसे आरक्षण न मिल रहा हो. जनरल कैटेगरी में गरीब तबके के लोगों को भी EWS (आर्थिक रूप से कमजोर) वर्ग के तहत 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है. हर्ष दुबे का कहना है कि आरक्षण सुधार आंदोलन का कोई एक चेहरा नहीं होगा. आंदोलन संगठित होकर समूह में शुरू किया है और जो दिल्ली तक आए वो, जो घर बैठे आरक्षण की चर्चा कर रहे हैं, आंदोलन को बढ़ावा दे रहे हैं वे, आरक्षण आंदोलन का चेहरा हैं.
आरक्षण को लेकर आंदोलनकारियों की मांगें
1. सरकारी नौकरियों, हायर एजुकेशन, स्कॉलरशिप और फीस में राहत के लिए जाति की बजाया आर्थिक आधार पर आधार दिया जाए.
2. एक परिवार एक आरक्षण का नियम लागू होना चाहिए. अगर माता-पिता में से कोई आरक्षण के जरिए उच्च पद पर पहुंचे तो बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए.
3. अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर का नियम सख्ती से लागू होना चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से मजबूत लोगों की बजाय असली जरूरतमंदों को लाभ मिले.
4. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के द्वारा लागू किए गए जाति-समानता आधारित निर्देशों और नए नियमों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए.
5. SC/ST एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए उसकी समीक्षा करके इसमें जरूरी बदलाव करने चाहिए या इस कानून को रद्द किया जाना चाहिए.
6. सनसेट क्लॉज होना चाहिए, यानी आरक्षण के खत्म होने की एक निश्चित समयसीमा तय होना चाहिए और समय-समय पर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए.
141 साल पुराना भारत में आरक्षण का इतिहास
कमजोर, पिछड़े और निम्न वर्ग के लोगों को अन्याय से बचाने और उन्हें समानता के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण दिया जाता है. आरक्षण विशेषकर एजुकेशन और जॉब सेक्टर में दिया जाता है. आरक्षण देकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि भारतीय समाज के सबसे पिछड़े वर्ग तक आरक्षण का लाभ पहुंचे और सभी को समान अवसर मिलें. भारत में आरक्षण का इतिहास करीब 141 साल पुराना है. आजादी से 65 साल पहले ही देश में आरक्षण की मांग उठ चुकी थी और 1882 में हंटर आयोग का आयोग गठन हुआ था. उस समय के महान विचारक, समाज सेवी, लेखक ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने भारत में सबसे पहले निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग उठाई थी.
भारत में क्या है आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था?
भारत में अनुसूचित जाति (SC) के लिए 15% आरक्षण का प्रावधान है. अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 7.5% आरक्षण का प्रावधान है. सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान है. जनरल कैटेगरी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के गरीबों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान साल 2019 से सरकार ने किया हुआ है. देश के सरकारी संस्थानों और नौकरियों में आरक्षित वर्गों का कोटा EWS को मिलाकर 50% से अधिक है. महिलाओं और दिव्यांगों के लिए भी होरिजोंटल रिजर्वेंशन मिलता है.
आरक्षण को लेकर किस राज्य में मांग उठी?
वर्तमान में भारत में महाराष्ट्र, राजस्थान, मणिपुर में आरक्षण की मांग उठी हुई है. महाराष्ट्र में मनोज जरांगे पाटिल के नेतृत्व में मराठा आरक्षण आंदोलन जारी है, जिसके तहत मराठा समुदाय के लोग सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की मांग कर रहे हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के तहत मराठा समुदाय को ‘कुनबी’ जाति का प्रमाण पत्र देने की मांग है. मणिपुर में अनुसूचित जनजाति मांग समिति (STDCM) और वर्ल्ड मैतेई काउंसिल मैतेई समुदाय के लोग अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे की मांग कर रहे हैं. वहीं राजस्थान में जाट और राजपूत समुदाय के लोग OBC सूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर आंदोलनरत रहे हैं.
भारत में आरक्षण से जुड़े नियम-प्रावधान
1891- त्रावणकोर में पब्लिक सर्विस के लिए विदेशी लोगों को भर्ती करने के विरोधस्वरूप सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग उठाई गई थी.
1901- महाराष्ट्र के कोल्हापुर में शाहू महाराज ने नौकरियों में वंचित समुदायों के लोगों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की थी. आरक्षण को लेकर यह पहला सरकारी आदेश जारी हुआ था.
1908- अंग्रेजों ने भी भारतीय जातियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण शुरू किया.
1909- भारत सरकार अधिनियम 1909 और 1919 लागू करके आरक्षण का प्रावधान किया गया.
1921- मद्रास प्रेसिडेंसी ने गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की.
1932- पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में 24 सितंबर को भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी ने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए. प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में आरक्षण दिया गया.
1942- भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की. सरकारी सेवाओं और शिक्षा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की.
1946- कैबिनेट मिशन और कई सिफारिशों के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव दिया गया.
1947- आजादी मिलते ही संविधान के तहत SC, ST और OBC वर्ग के लिए फैसले लिए गए.
1953- कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया. संविधान की अनुसूचियों में संशोधन किया गया.
1979- मंडल आयोग का गठन करके सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति की समीक्षा की गई.
1980- मंडल आयोग की रिपोर्ट पर मौजूदा कोटा बदलते हुए 22 से 49.5 प्रतिशत बढ़ोतरी की सिफारिश की.
1990- मंडल आयोग की सिफारिशों को सरकारी नौकरियों में लागू किया गया.
1991- नरसिम्हा राव सरकार ने अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10 फीसदी आरक्षण शुरू किया.