Pakistani Qawwali On Shree Krishna: भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा हो, लेकिन दिलों की दूरी कभी नहीं रही. एक पुरानी कव्वाली इसका बेहतरीन उदाहरण है. यह गाना भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है, जिसे मुस्लिम गायकों ने पाकिस्तान में गाया. गाने की शुरुआती पंक्ति है - “कन्हैया, याद है कुछ भी हमारी?” यह गाना आज भी लोगों के दिल छू लेता है.
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क्या है कव्वाली की कहानी?
यह कव्वाली 19वीं सदी में नवाब सादिक जंग बहादुर ‘हिल्म’ नामक कवि ने लिखी. नवाब साहब भारत में हैदराबाद से थे. गाने में राधा जी कृष्ण जी से पूछ रही हैं कि क्या उन्हें अपनी याद है? राधा कहती हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से पूछा, शिव जी के पास गईं, लेकिन कृष्ण जी भूल गए.
इस कव्वाली के बोल ऐसे हैं कि-
“कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी,
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी?”
यह गाना भक्ति और विरह की भावना से भरा है. सूफी परंपरा में इसे ईश्वर से जुड़ने का प्रतीक भी माना जाता है.
यह भी पढ़ें: ‘वाह! अब हॉलीवुड भी…’, Gal Gadot की फिल्म का ट्रेलर देख फैंस को आई Aishwarya Rai की
कव्वाली का इतिहास और रचना
नवाब सादिक जंग बहादुर 'हिल्म' शायर ने इस रचना में श्रीकृष्ण को सिर्फ एक भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अपने महबूब के रूप में पुकारा है. सूफीवाद में ईश्वर को महबूब मानकर प्रेम करने की एक लंबी परंपरा रही है. कराची, पाकिस्तान के रहने वाले उस्ताद फरीद अयाज और अबू मोहम्मद सूफी संगीत की 800 साल पुरानी दिल्ली कव्वाल बच्चों के घराने की रिवायत से ताल्लुक रखते हैं.
कराची के कव्वालों का जादू
जब ये दोनों भाई इस कव्वाली को पूरे हाव-भाव और रूहानियत के साथ गाते हैं, तो श्रोता सब कुछ भूलकर भक्ति में लीन हो जाते हैं. यह प्रस्तुति इस बात का जीवंत उदाहरण है कि नक्शे और राजनीति भले ही देशों को सरहदों में बांट दें, लेकिन सुर, संगीत और मोहब्बत को किसी भी दायरे में कैद नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, पाकिस्तान के महान कव्वाल उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने भी मीराबाई के प्रसिद्ध भजन "सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम" को कव्वाली के अंदाज में गाकर पूरी दुनिया में अमर कर दिया था, जिसमें 'पी' का सीधा संदर्भ भगवान कृष्ण से है.
यह भी पढ़ें: Masoom Sharma के साथ फिर हाथापाई, हरियाणवी सिंगर को 3 दिन के अंदर मारने की
Pakistani Qawwali On Shree Krishna: भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा हो, लेकिन दिलों की दूरी कभी नहीं रही. एक पुरानी कव्वाली इसका बेहतरीन उदाहरण है. यह गाना भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है, जिसे मुस्लिम गायकों ने पाकिस्तान में गाया. गाने की शुरुआती पंक्ति है – “कन्हैया, याद है कुछ भी हमारी?” यह गाना आज भी लोगों के दिल छू लेता है.
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क्या है कव्वाली की कहानी?
यह कव्वाली 19वीं सदी में नवाब सादिक जंग बहादुर ‘हिल्म’ नामक कवि ने लिखी. नवाब साहब भारत में हैदराबाद से थे. गाने में राधा जी कृष्ण जी से पूछ रही हैं कि क्या उन्हें अपनी याद है? राधा कहती हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से पूछा, शिव जी के पास गईं, लेकिन कृष्ण जी भूल गए.
इस कव्वाली के बोल ऐसे हैं कि-
“कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी,
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी?”
यह गाना भक्ति और विरह की भावना से भरा है. सूफी परंपरा में इसे ईश्वर से जुड़ने का प्रतीक भी माना जाता है.
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कव्वाली का इतिहास और रचना
नवाब सादिक जंग बहादुर ‘हिल्म’ शायर ने इस रचना में श्रीकृष्ण को सिर्फ एक भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अपने महबूब के रूप में पुकारा है. सूफीवाद में ईश्वर को महबूब मानकर प्रेम करने की एक लंबी परंपरा रही है. कराची, पाकिस्तान के रहने वाले उस्ताद फरीद अयाज और अबू मोहम्मद सूफी संगीत की 800 साल पुरानी दिल्ली कव्वाल बच्चों के घराने की रिवायत से ताल्लुक रखते हैं.
कराची के कव्वालों का जादू
जब ये दोनों भाई इस कव्वाली को पूरे हाव-भाव और रूहानियत के साथ गाते हैं, तो श्रोता सब कुछ भूलकर भक्ति में लीन हो जाते हैं. यह प्रस्तुति इस बात का जीवंत उदाहरण है कि नक्शे और राजनीति भले ही देशों को सरहदों में बांट दें, लेकिन सुर, संगीत और मोहब्बत को किसी भी दायरे में कैद नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, पाकिस्तान के महान कव्वाल उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने भी मीराबाई के प्रसिद्ध भजन “सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम” को कव्वाली के अंदाज में गाकर पूरी दुनिया में अमर कर दिया था, जिसमें ‘पी’ का सीधा संदर्भ भगवान कृष्ण से है.
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