अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका डेलिगेट्स जब चीन गया था तो अपने इलेक्ट्रोनिक डिवाइस को कथित तौर पर अमेरिका में ही छोड़कर गया था. इसी डर से कि कहीं चीन उनके डिवाइस की जासूसी ना कर ले या फिर कोई जासूसी वायरस ना डाल दे. इसी वजह से अमेरिका ने चीन से मिले सभी उपहारों के एयरपोर्ट पर ही कूड़ेदान में फेंक दिया था. दुनियाभर में चीन अपने नागरिकों की जासूसी करने को लेकर बदनाम है, लेकिन अब तो ड्रैगन ने हद ही पार कर दी है. हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें दावा किया गया है कि चीन विदेशी नागरिकों की भी जासूसी कर रहा है.
जासूसी का कैसे हुआ खुलासा?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक साइबर सिक्योरिटी रिसर्चर ने ऑनलाइन डेटाबेस से पता लगाया कि चीन में रहने वाले या वहां आने वाले सैकड़ों विदेशियों की निजी जानकारियां एक प्लेटफॉर्म पर दर्ज थीं. इसमें पासपोर्ट, मोबाइल नंबर, ट्रैवल, अस्पताल आने-जाने और अन्य गतिविधियों की पूरी जानाकरी मौजूद थी. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इस डेटा का इस्तेमाल किस स्तर पर किया गया, लेकिन इस खुलासे ने चीन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
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विदेशी यात्रियों की निजी जानकारी
इस डेटाबेस का नाम ‘डायनामिक कंट्रोल प्लेटफॉर्म फॉर ओवरसीज पर्सनेल’ बताया गया है. इसे सबसे पहले चीन की निगरानी व्यवस्था पर शोध करने वाले मार्क होफर ने देखा. उन्होंने बताया कि वेबसाइट खोलते ही उन्हें अपनी ही तस्वीर, पासपोर्ट नंबर और वह मोबाइल नंबर दिखाई दिए, जिसका इस्तेमाल उन्होंने चीन में रहने के दौरान किया था. प्लेटफॉर्म में झांगजियाकौ शहर से जुड़े 700 से अधिक विदेशी नागरिकों और करीब 12 हजार रिकॉर्ड मौजूद थे. इनमें विदेशी पत्रकार, हांगकांग और ताइवान के लोग और कई ऐसे नाम भी शामिल थे, जिनका उस शहर से कोई डायरेक्ट रिलेशन नहीं था.
कहां से कैसे मिली जानकारी?
रिपोर्ट के मुताबिक इस प्लेटफॉर्म पर दर्ज की गई जानकारियां सिर्फ सीसीटीवी कैमरों पर उपलब्ध डेटाबेस से ही नहीं थी, बल्कि अस्पतालों, गैस बिल, टैवल रिकॉर्ड, फेस रिकग्निशन सिस्टम, ट्रेन और फ्लाइट बुकिंग जैसी कई अलग-अलग प्रणालियों से डेटा को एड किया गया था. हैरानी की बात तो ये है कि किसी व्यक्ति ने डॉक्टर से कब मुलाकात की, गैस पर कितना खर्च किया, किस ट्रेन या फ्लाइट में कौन-सी सीट पर सफर किया, इन सब की भी जानकारी पोर्टल पर मौजूद थी.
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