Rishabh Sharma
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Vaibhav Sooryavanshi: क्रिकेट को चाहने वाले पूरी दुनिया के फैंस इस बात को लेकर खुश है कि वैभव सूर्यवंशी को जल्द ही भारतीय सीनियर टीम की जर्सी में देखने का सपना सच होने वाला है. आगामी आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे के साथ-साथ बीसीसीआई की सीनियर सिलेक्शन कमेटी ने साल 2026 के एशियन गेम्स के लिए भी उन्हें मेन्स क्रिकेट टीम में जगह दे दी है. यह रफ्तार हैरान करने वाली है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा और गंभीर सवाल भी खड़ा होता है. सवाल ये कि ‘क्या हम एक 15 साल के बच्चे पर उम्मीदों का वो हिमालय तो नहीं लाद रहे, जिसे संभालना अच्छे-अच्छे दिग्गजों के बस की बात नहीं होती?’
भारतीय क्रिकेट की यह पुरानी आदत रही है कि जब भी कोई नया टैलेंट चमकता है, हम तुरंत उसकी तुलना के तराजू लेकर बैठ जाते हैं. वैभव के साथ भी यही हो रहा है। कोई उनकी बेखौफ बल्लेबाजी में 16 साल के सचिन तेंदुलकर की झलक देख रहा है, तो कोई उनके एटीट्यूड और मैच जिताने की भूख की तुलना विराट कोहली से कर रहा है. बेशक, सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसे महान खिलाड़ियों ने खुद वैभव के टैलेंट को सराहा है.
सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशी क्रिकेटर्स और विरोधी बोर्ड्स भी इस बच्चे की टाइमिंग और निडरता के मुरीद हो चुके हैं. लेकिन हमें यह समझना होगा कि वैभव सूर्यवंशी को फिलहाल वैभव ही रहने दिया जाए. जब आप किसी 15 साल के बच्चे की तुलना उस सचिन से करने लगते हैं जिसके नाम 100 अंतरराष्ट्रीय शतक हैं, या उस विराट से करते हैं जिसने चेज़ मास्टर की परिभाषा बदल दी, तो आप अनजाने में उस बच्चे के पैरों में उम्मीदों की भारी बेड़ियां बांध देते हैं.
विराट कोहली और रोहित शर्मा के टी20 इंटरनेशनल से संन्यास लेने के बाद, भारतीय टीम इस फॉर्मेट में एक ऐसे ‘क्राउड पुलर’ की तलाश में थी जो मैदान पर आते ही मैच का रुख बदल दे. कुछ समय पहले तक ऐसा लगा कि अभिषेक शर्मा अपनी तूफानी बल्लेबाजी से इस खाली जगह को भर देंगे. उन्होंने शुरुआत भी वैसी ही धमाकेदार की थी. टी20 क्रिकेट में डेब्यू से फॉर्मेट का नंबर-1 बल्लेबाज़ बनने तक अभिषेक का सफर भी किसी सपने जैसा ही था.
लेकिन ‘उम्मीदों का दबाव’ क्या होता है, इसका अंदाजा अभिषेक को भी तब हुआ जब वो भारत की ही मेजबानी में खेले गए टी20 वर्ल्ड कप में खराब फॉर्म से जूझते नजर आए. घरेलू मैदान-लाखों फैंस की चीखें और लगभग हर गेंद पर बाउंड्री की उम्मीद यही वो दबाव था, जिसने अभिषेक के आत्मविश्वास को भी सोख लिया. अभिषेक शर्मा का यह दौर वैभव सूर्यवंशी के लिए एक बड़ी सीख है कि आईपीएल की चकाचौंध और इंटरनेशनल क्रिकेट की तपिश में जमीन-आसमान का अंतर होता है.

इसमें कोई दो-राय नहीं कि आईपीएल में वैभव का प्रदर्शन बेमिसाल रहा है. उन्होंने जिस स्ट्राइक रेट और निरंतरता से रन बनाए, उसी का नतीजा है कि आज वो टीम इंडिया के दरवाजे पर खड़े हैं. लेकिन इंटरनेशनल क्रिकेट की बिसात अलग होती है. यहां विरोधी टीमें आपकी ताकत से ज्यादा आपकी कमजोरी पर होमवर्क करती हैं. जब वैभव इंग्लैंड की तेज और सीम होती पिचों पर जोफ्रा आर्चर, जोश टंग और सैम करेन जैसे गेंदबाजों का सामना करेंगे तब असली परीक्षा शुरू होगी.
इससे पहले उन्हें आयरलैंड की ठंडी हवाओं में भी स्विंग होती गेंद पर अपने हुनर की आज़माइश का मौका मिलेगा. यहां वैभव को दबाव में बिखरने से बचने के लिए, ऐसी तैयारी की ज़रूरत होगी जो उनके खेल और पहचान को और निखार सके.
वैसे देखा जाए तो वैभव सूर्यवंशी का यह सफर अब सिर्फ उनकी खुद की मेहनत पर निर्भर नहीं करता. वैभव भविष्य में क्या करते हैं और कैसे करते हैं इसे लेकर बड़ी ज़िम्मेदारी टीम इंडिया मैनेजमेंट की भी होगी. खेल की भाषा में कहा जाए तो- ‘अब गेंद भारतीय टीम मैनेजमेंट के पाले में है.’ बताने की ज़रूरत नहीं कि आईपीएल की चकाचौंध से निकले वैभव जब टीम इंडिया की इंटरनेशनल टीम के ड्रेसिंग रूम में कदम रखेंगे, तो उन्हें गाइड करने की बड़ी जिम्मेदारी हेड कोच गौतम गंभीर और कप्तान श्रेयस अय्यर की होगी.
आईपीएल के आंकड़े आपको टीम का टिकट दिला सकते हैं, लेकिन इंटरनेशनल क्रिकेट का सफर लंबा तय करने के लिए आपको मानसिक रूप से लोहे का बनना पड़ता है. 15 साल की उम्र में शरीर और तकनीक दोनों में बदलाव आते हैं, और इसी दौर में खिलाड़ी को सबसे ज्यादा प्रोटेक्शन की जरूरत होती है.

कहने वाले कहेंगे कि, वैभव सूर्यवंशी आईपीएल के दौरान भी तो करीब 2 महीनों तक घर से दूर रहे तो इस बार ऐसा क्या खास है ? तो जवाब ये है कि आईपीएल 2026 अपनी ही घरेलू सरज़मीं यानी हिंदुस्तान में खेला गया था. दूसरी बात ये है कि आईपीएल की मीडिया कवरेज में हमेशा फ्लॉप सितारों से ज्यादा, प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों पर तवज्जो दी जाती है. वैभव का आईपीएल सीज़न-19 में लगातार प्रदर्शन अच्छा रहा. नतीजा ये हुआ कि वैभव के खिलाफ निगेटिव कवरेज हुई ही नहीं.
लेकिन भारत के लिए इंटरनेशनल टीम में आते ही वैभव का रोल और ज़िम्मेदारी के साथ उनके आसपास खेल का माहौल भी बदलना तय है. अब दबाव फ्रैंचाइज़ी के लिए खेलने का नहीं, बल्कि देश की उम्मीदों पर खरा उतरने का होगा. विरोधी गेंदबाज़ों से वैभव को तेज़ शॉर्ट बॉल्स का भी सामना करना होगा और तीखी स्लेजिंग का भी.
गौतम गंभीर अपने बेबाक और प्रैक्टिकल रवैये के लिए जाने जाते हैं. बतौर कोच गौतम गंभीर को यह सुनिश्चित करना होगा कि वैभव को फ्रंटलाइन मीडिया की हाइप और सोशल मीडिया से दूर रखा जाए. उन्हें एक ऐसा माहौल देना होगा जहां वो बेखौफ होकर खेल सकें, बिना इस डर कि एक मैच में फ्लॉप होने पर वो टीम से बाहर हो जाएंगे. वहीं, कप्तान के तौर पर श्रेयस अय्यर की भूमिका भी बेहद अहम होने वाली है. भारतीय टी20 टीम की मौजूदा औसत उम्र 25-28 साल के बीच होनी चाहिए.
ऐसे में टीम के ड्रेसिंग रूम में 15-16 साल के वैभव सूर्यवंशी को अलग महसूस ना हो, अच्छे-बुरे हर अनुभव के लिए वो मानसिक तौर पर तैयार हों, ये ज़िम्मा कप्तान को ही उठाना होगा. इसके अलावा वैभव की उम्र को देखते हुए उनके सही वर्कलोड मैनेजमेंट के लिए तैयारी करनी होगी. जिससे अत्याधिक क्रिकेट से होने वाली शरीर की चोटों से भी वैभव को बचाया जा सके.
वैभव सूर्यवंशी भारतीय क्रिकेट का वो भविष्य हैं जिसकी चमक पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है. उनके पास टैलेंट है, उम्र है और अब मौका भी है. एशियन गेम्स 2026 और उससे पहले आगामी विदेशी दौरे उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकते हैं. लेकिन एक खेल प्रेमी के तौर पर हमारी और एक मैनेजमेंट के तौर पर गंभीर-अय्यर की जिम्मेदारी यह है कि हम इस ‘बॉस बेबी’ के बचपन को जिंदा रखें.
उन्हें अपने खेल के लिए आज़ाद माहौल देने की ही तरह, मैदान पर कुछ गलतियां करने की भी आजादी मिले. मेरी राय में यही वो गलतियां होंगी जिससे वो सचिन या विराट बनने के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे. फिलहाल वैभव सिर्फ क्रिकेट खेलें, इतिहास लिखने के लिए पूरी उम्र पड़ी है.
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