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त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अमृत कुंड में मिला 240 साल से ज्यादा पुराना शिवलिंग, ASI की सफाई में हुआ बड़ा खुलासा

महाराष्ट्र के नासिक में मौजूद त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के 65 फीट गहरे अमृत कुंड की सफाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एक प्राचीन शिवलिंग मिला है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये कम से कम 240 साल पुराना है, जबकि इसकी वास्तविक उम्र इससे भी ज्यादा हो सकती है.

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जब एक टैंक का पानी सूख जाता है तो उसकी तली में कुछ ऐसा दिखाई देता है जिसे किसी भक्त ने पहले कभी नहीं देखा होता. महाराष्ट्र के नासिक में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में ठीक ऐसा ही हुआ, जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मंदिर परिसर के अंदर मौजूद लगभग 65 फुट गहरे पत्थर के टैंक ‘अमृत कुंड’ का पानी निकालकर उसकी सफाई कर रहा था. जब कर्मचारियों ने दशकों से जमा गाद को हटाया तो टैंक की तली में पत्थर से तराशा हुआ एक शिवलिंग दिखाई दिया. ये इतने लंबे समय से पानी में डूबा हुआ था कि इसके होने की बात लोगों की यादों में ही बची थी.

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त्र्यंबकेश्वर के अमृत कुंड में ASI को क्या मिला?

अमृत कुंड, जिसे कभी-कभी अमृतवर्षिणी भी कहा जाता है, पेशवा के ज़माने का एक तालाब है जिसका पानी लंबे समय से रोज़ाना पूजा और अभिषेक के लिए इस्तेमाल होता रहा है. ये मंदिर के बाहर बने बड़े कुशावर्त कुंड से अलग है, जो गोदावरी नदी का सोर्स है. ASI ने 1 जुलाई को ये खोज शेयर की और बताया कि तालाब के फ़र्श से जमा गाद और मलबा हटाने के बाद ये पानी निकला. इसकी कोई पक्की उम्र नहीं है, क्योंकि इस पर अभी तक कोई पेट्रोग्राफिक या डेटिंग स्टडी पब्लिश नहीं हुई है और इस खोज पर कोई पीयर-रिव्यूड रिसर्च पेपर भी नहीं है. बस इतना कहा जा सकता है कि इससे एक बाहरी सीमा मिलती है.

तालाब कहां है?

ये तालाब एक मंदिर के अंदर है जिसे 1755 और 1786 के बीच पेशवा बालाजी बाजी राव ने फिर से बनवाया था. मतलब ये कम से कम 240 साल पुराना है और शायद काफी पुराना है. अगर ये उस पहले के मंदिर का है जिसे औरंगज़ेब की सेना ने 1690 में तोड़ दिया था, जिससे ये लगभग 335 साल या उससे ज़्यादा पुराना हो जाएगा. कुछ स्थानीय परंपराएं तो इसे और भी आगे ले जाकर बहुत पुराने मूल मंदिर का ही हिस्सा मानती हैं, लेकिन इसकी पुष्टि के लिए लिथोलॉजी जैसे असली डेटिंग कामों की जरूरत होगी.

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छिपी हुई नक्काशी क्यों दिखाई देती है?

ये असल में sedimentation की प्रक्रिया है. हर बारिश के मौसम में, ऐसे जलाशय में मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों की एक नई परत जमा हो जाती है, जो सदियों से परतों के रूप में इकट्ठा होती रहती है. संरक्षण विशेषज्ञ इस प्रक्रिया को ‘डीसिल्टिंग’ कहते हैं और ये असल में एक नियंत्रित खुदाई है. जैसे-जैसे गाद की हर परत हटती है, उसमें दबी हुई चीज़ें जैसे सीढ़ियां, दीवारें और मूर्तियां बिना किसी खुदाई के ही दिखाई देने लगती हैं. त्रिमबकेश्वर दक्कन ट्रैप पर्वतमाला पर मौजूद है, जो लगभग 66 मिलियन साल पहले विशाल ज्वालामुखी विस्फोटों द्वारा निर्मित बेसाल्ट की परतें हैं. यहां के शिल्पकारों ने मंदिरों, किलों और गुफा-गृहस्थियों के लिए इसी काले बेसाल्ट को 2,000 सालों से तराशा है, क्योंकि ये मौसम के प्रभावों का असाधारण रूप से प्रतिरोध करता है.

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First published on: Jul 02, 2026 04:16 PM

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