संयुक्त राष्ट्र (UN) ने वैश्विक तापमान, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन पर हुई रिसर्च की रिपोर्ट जारी की है. जिसमें चेतावनी दी गई है कि आने वाले कुछ सालों में वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री तक की बढ़ोतरी होगी और अगर तापमान इससे ज्यादा हो गया तो दुनिया खासकर भारत के लिए बड़े जोखिम पैदा हो जाएंगे. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने चेतावनी दी है कि दुनिया ऐसे खतरों की ओर बढ़ रही है, जो वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी को पार करने पर पैदा होंगे. लेकिन दुनिया चाहे तो तापमान में होने वाली इस वृद्धि को सीमित कर सकती है और ग्लोबल वार्मिंग पर लगाम लगा सकती है.
भारत पर बढ़ते तापमान का असर ज्यादा पड़ेगा
रिपोर्ट के अनुसार, धरती पर हर जगह का तापमान 1.5°C बढ़ जाएगा. लेकिन भारत के लिए 1.5 डिग्री तापमान थोड़ा ज्यादा खतरनाक है. क्योंकि भारत की जनसंख्या, कृषि और अर्थव्यवस्था जलवायु और मौसम पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है. विश्व बैंक का कहना है कि भारत की 88% से अधिक आबादी उन शहरों में रहती है, जहां जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण बहुत ज्यादा गर्मी पड़ती है. बाढ़, सूखा और चक्रवाती तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं. साल 2026 में हुई रिसर्च में पता चला कि 1981 और 2020 के बीच गर्मियों के मौसम में भारत के अधिकतम तापमान में 1 डिग्री की बढ़ोतरी हुई और लू का प्रकोप भी बढ़ा.
भारत की जल और खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ा
रिपोर्ट के अनुसार, रिसर्च में पता चला कि असहनीय गर्मी में मानव शरीर किसी भी स्थिति में खुद को ठंडा नहीं कर पाता है. न केवल गर्मियों के मौसम में बल्कि मानसून सीजन में भी असहनीय उमस भरी गर्मी पड़ रही है. ग्लोबल वार्मिंग से भारत की जल और खाद्य सुरक्षा को भी खतरा है. वहीं अल नीनो के कारण समस्याओं के और बढ़ने की आशंका है. ग्रीनहाउस के कारण एल नीनो और भारतीय मानसून सीजन में सूखे के बीच संबंध मजबूत हो सकता है, जिससे खाद्य उत्पादन के लिए खतरे बढ़ सकते हैं, जबकि भारत में पहले से ही जलसंकट से जूझ रहा है और यह समस्या बद से बदतर हो सकती है. इसके अलावा रिसर्च में हिमालयी क्षेत्र के लिए भी चेतावनी है.
बढ़ते तापमान के कारण ही पिघल रहे ग्लेशियर
संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते वैश्विक तापमान का असर गर्मी और बारिश तक ही सीमित नहीं रहेगा. भारत की नदियां हिंदू कुश हिमालय (HKH) पर निर्भर करती हैं, जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. ICIMOD ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने की दर साल 2000 के बाद दोगुनी हो गई है. इससे जल सुरक्षा को खतरा बढ़ने के साथ-साथ बाढ़ और अन्य पर्वतीय आपदाओं का जोखिम भी बढ़ गया है. नेपाल में हाल ही में हुई त्रासदी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. क्योंकि नेपाल जैसे देशों ने वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में न के बराबर योगदान दिया, इसलिए नेपाल के हिमालयी क्षेत्र के पहाड़ और ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ाकर प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन रहे हैं.