Puja Path ke Niyam: बहुत लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या पूजा में चढ़ाई गई मिठाई या फल अगले दिन फिर भगवान को चढ़ाना चाहिए? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका जवाब है, ‘नहीं’. हिन्दू धर्म के प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, भगवान को एक बार अर्पित की गई सामग्री प्रसाद बन जाती है. इसलिए उसे दोबारा भोग में रखना उचित नहीं माना जाता है. इसे ‘उच्छिष्ट’ और ‘निर्माल्य’ की मान्यता से जोड़ा जाता है. इसके पीछे भोग की पवित्रता और श्रद्धा का भाव भी जुड़ा है. आइए जानते हैं, भगवान को अर्पित प्रसाद फिर से चढ़ाना क्यों वर्जित माना जाता है?
भोग का सही नियम
हिंदू पूजा पद्धति में भगवान को ताजा, सात्विक और शुद्ध सामग्री चढ़ाने की परंपरा है. ईश्वर को भोग लगाने का अर्थ है अपनी सबसे प्रिय और शुद्ध वस्तु उन्हें समर्पित करना. फल, मिठाई, दूध, मेवे या सात्विक भोजन भोग में रखा जाता है. भोग लगाने से पहले भोजन को चखना भी उचित नहीं माना जाता है. भाव यही रहता है कि भोजन सबसे पहले भगवान को समर्पित किया जाए. मान्यता है कि भोग लगाने के बाद वही सामग्री प्रसाद बन जाती है. इसलिए उसे दोबारा नैवेद्य के रूप में चढ़ाने के बजाय श्रद्धा से ग्रहण करना चाहिए. परिवार और दूसरे भक्तों में बांटना भी अच्छी परंपरा मानी जाती है.
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उच्छिष्ट की मान्यता
धार्मिक परंपरा में पहले से अर्पित सामग्री को दोबारा नैवेद्य के रूप में इस्तेमाल करने से बचने की बात कही गई है. पूजा में शुद्धता का खास महत्व होता है. इसलिए भोग के लिए नई और अनछुई सामग्री रखना बेहतर माना जाता है. पूजा के बाद बचे प्रसाद को वापस पूजा की थाली में रखने के बजाय ग्रहण या वितरित करने की परंपरा है. इससे प्रसाद का सम्मान बना रहता है और अन्न की बर्बादी भी नहीं होती.
निर्माल्य क्या होता है?
पूजा के बाद भगवान को अर्पित फूल, माला और कुछ अन्य सामग्री को कई परंपराओं में निर्माल्य कहा जाता है. अलग-अलग मंदिरों में निर्माल्य के नियम भी अलग होते हैं. लेकिन प्रसाद के मामले में मंदिरों और पंडितों की राय है कि निर्माल्य का भी दुबारा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
प्रसाद का रखें ध्यान
भोग लगाने के बाद प्रसाद को बहुत देर तक खुले में न छोड़ें. दूध, दही, मिठाई और पका भोजन जल्दी खराब हो सकता है. मौसम के अनुसार उसे सुरक्षित रखना जरूरी है. खराब या खाने योग्य न रह गई सामग्री भगवान को चढ़ाना उचित नहीं माना जाता. अगर प्रसाद बच गया है, तो उसे दोबारा भगवान को चढ़ाने के बजाय परिवार के साथ ग्रहण करें. जरूरतमंद लोगों में बांटना भी अच्छा माना जाता है.
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तांत्रिक भोग परंपरा में ‘उच्छिष्ट’
तांत्रिक यज्ञ, पूजा या अनुष्ठान के बाद जो अंश या भोग शेष बच जाता है, उसे भी ‘उच्छिष्ट’ कहते हैं. उदाहरण के लिए, भगवान गणेश के तांत्रिक स्वरूप को ‘उच्छिष्ट गणपति’ कहा जाता है.
जगन्नाथ मंदिर का ‘महाप्रसाद’
आपको बता दें कि पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में महाप्रसाद को लेकर यह नियम लागू नहीं होता है. वहां भगवान को अर्पित होने के बाद भी प्रसाद को महाप्रसाद मानकर पुनः समर्पित या वितरित किया जाता है, क्योंकि वह सदा पवित्र माना गया है.
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