महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ किया था 21 दिनों का अनशन, सोनम वांगचुक के आंदोलन दिलाई ब्रिटिश काल की याद

Mahatma Gandhi’s 21 Day Fast Against Britishers: सोनम वांगचुक की अनशन ने महात्मा गांधी के भूख हड़ताल के तरीके को फिर से चर्चा में ला दिया है. जहां कुछ आलोचक गांधी के उपवास को राजनीतिक दबाव या जिद का तरीका मानते हैं, वहीं इतिहासकार बताते हैं कि ये उनके सत्याग्रह के विचार पर आधारित थे, जो सच और नैतिक जिम्मेदारी वाला अहिंसक विरोध का एक रूप था. गांधी अनशन को सिर्फ एक राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि समाज और सत्ता में बैठे लोगों की अंतरात्मा को जगाने का एक जरिया मानते थे.

Gandhi Ji
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Mahatma Gandhi (AI Image)

1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद, 1948 में अपनी हत्या से पहले गांधी ने करीब 30 बार अनशन किए. इतिहासकार चंदूलाल दलाल ने 'गांधीजी नी दिनवारी' में इन उपवासों का जिक्र किया है और बताया है कि कुछ अनशन का शायद कभी सार्वजनिक रूप से रिकॉर्ड नहीं रखा गया. इन उपवासों की अवधि एक दिन से लेकर 21 दिन तक थी. दिलचस्प बात ये है कि इनमें से कुछ ही ब्रिटिश प्रशासन के फैसलों के खिलाफ थे, जबकि ज्यादातर सामाजिक सुधार, सांप्रदायिक सद्भाव और गांधी के अपने समर्थकों के बिहेवियर पर फोकस्ड थे.

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गांधी अक्सर मानते थे कि उनसे जुड़े लोगों के कामों की जिम्मेदारी उनकी भी है. जब भी उनके नेतृत्व वाले आंदोलनों में हिंसा या सामाजिक अन्याय होता था, तो वे आत्म-अनुशासन और नैतिक जवाबदेही के तौर पर उपवास करते थे. उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक तनाव के समय शांति की अपील करने के लिए भी बार-बार उपवास किए, क्योंकि उनका मानना ​​था कि निजी त्याग सुलह के लिए प्रेरित कर सकता है.

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गांधी के सबसे चर्चित अनशन में से एक 1932 में यरवदा जेल में हुआ था, जब ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग चुनाव व्यवस्था का ऐलान किया. इस विरोध के कारण डॉ. बीआर अंबेडकर और हिंदू नेताओं के बीच बातचीत हुई, जिसके बाद पूना पैक्ट हुआ. अलग चुनाव क्षेत्रों के बजाय, इस समझौते में संयुक्त चुनावी प्रणाली के तहत दलितों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई, जिससे ये अनशन भारत के राजनीतिक इतिहास में एक अहम मोड़ बन गया.

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गांधी ने छुआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ भी अनशन किए. 1930 के दशक की शुरुआत में जेल में रहने के दौरान, उन्होंने दलितों के जीवन को बेहतर बनाने के मकसद से सामाजिक सुधार गतिविधियों को जारी रखने की इजाजत मांगी. जब अधिकारियों ने परमिशन देने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने एक और हंगर स्ट्राइक शुरू किया और जोर दिया कि छुआछूत के खिलाफ अभियान उनके जीवन के मिशन का अहम हिस्सा था. उनकी सेहत बहुत बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें पुणे के ससून अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जहां से वो बाद में ठीक हुए.

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गांधी जी शायद सबसे ज्यादा सख्त अनशन 1943 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान किया गया था. जब ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन के बाद हुई हिंसा के लिए गांधी जी और कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया, तो गांधी ने इन आरोपों को नकार दिया और सबूत की मांग की. जब अधिकारियों ने अपने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया, तो 73 साल के महात्मा ने पुणे के आगा खान पैलेस में 21 दिन का अनशन शुरू किया. उनकी हालत गंभीर हो गई, जिससे देश और दुनिया का ध्यान इस तरफ गया.

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आज भी गांधी के अनशन और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल जैसे विरोध प्रदर्शनों की तुलना पर बहस होती रहती है. भले ही राजनीतिक हालात बहुत अलग हों, लेकिन गांधी के हंगर स्ट्राइक अहिंसक विरोध की एक ऐसी मिसाल हैं जो निजी त्याग, नैतिक दृढ़ता और इस भरोसे पर आधारित है कि मोरल तरीके से समझा-बुझाकर कभी-कभी वो हासिल किया जा सकता है जो जोर-जबरदस्ती से नहीं हो सकता.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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