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कुछ नया खाने से झिझकता है बच्चा तो AIIMS की डाइटीशियिन का बताया तरीका आएगा काम, इस तरह फूड निओफोबिया होगा दूर

Baby Nutrition: एम्स नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी डिपार्टमेंट की डाइटीशियन मोनिता गहलोत से जानिए छोटे बच्चे की फूड हैबिट्स को कैसे सुधारा जा सकता है. डाइटीशियन बता रही हैं कि बच्चे को कुछ नया कैसे खिलाएं और खाना खिलाते समय किन बातों का ध्यान रखें.

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Nutrition Tips For Babies: एम्स नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी डिपार्टमेंट की डाइटीशियन मोनिता गहलोत कहती हैं कि 3 साल तक के बच्चे के लिए न्यूट्रिशन का ख्याल रखना बेहद जरूरी है. 3 साल तक की उम्र का समय बच्चे की डेवलपमेंट के लिए बेहद जरूरी है. इसी उम्र में बच्चे देखकर और समझकर दुनिया को जानना शुरू करते हैं, बात करना सीखते हैं, संवाद सीखते हैं, सोचना सीखते हैं, चीजें याद रखना सीखते हैं, अपनी इंद्रियों के बारे में जानते हैं और खाने के अनुभव से उनमें स्वस्थ खाने की आदतों की नींव डलती है. यह समय खासतौर से बच्चे के दिमाग के लिए क्रिटिकल समय होता है. डाइटीशियन कहती हैं कि इस समय सीखी हुई अच्छी फूड हैबिट्स (Good Food Habits) बच्चे के फ्यूचर की फूड हैबिट्स का ब्लूप्रिंट होती हैं. ऐसे में यह माता-पिता और सभी परिवारजन की जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चे में सही पोषण और खानपान की सही आदतों का विकास करें.

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बच्चे को कराएं रिस्पोंसिव फीड

डाइटीशियन की सलाह है कि 3 साल तक के बच्चों क रिस्पोंसिव फीड करवाना चाहिए. इस दौरान बच्चे की बात सुनें और बच्चे का सम्मान करें. जब बच्चे को भूख लगे तभी बच्चे को खाना दें. बच्चे के भूख के संकेतों को पहचानें, जैसे मुंह खोलना, आगे झुकना और खाने में रुचि दिखाना. जब बच्चे का पेट भर जाए तो खाना खिलाना बंद कर दें. बच्चे के संतुष्टि संकेतों को पहचानें, जैसे मुंह बंद करना, सिर घुमाना और खाने में रुचि का कम हो जाना. बच्चे की गति और मात्रा का सम्मान करें, बच्चे को कितना खाना है यह वह खुद तय करता है. इस बात का ध्यान रखें कि आप कभी भी बच्चे को जबरदस्ती ना खिलाएं.

फूड निओफोबिया से कैसे निपटें

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जब भी बच्चे को कुछ नया खिलाया जाता है या खाने के लिए दिया जाता है तो बच्चा झिझकने लगता है और अनिच्छा प्रकट करता है. इसे ही फूड निओफोबिया (Food Neophobia) कहते हैं. ऐसे में जब बच्चा 2 से 3 बार कुछ खाने से मना करता है तो सभी को लगता है कि बच्चा चिड़चिड़ा हो रहा है, जबकि असल में यह बच्चे के दिमाग का नॉर्मल बिहेवियर है. इतने छोटे बच्चे के लिए हर चीज एक नई चीज होती है. वह अपरिचित और नए फूड को असुरक्षित मानता है. इसलिए बच्चा उसे खाने में झिझकता है. इस स्थिति में विज्ञान यह कहता है कि इस नए फूड को ही बच्चे को बार-बार दिया जाए तो बच्चे का दिमाग उस नए फूड को धीरे-धीरे सुरक्षित मानने लगता है.

डाइटीशियन बताती हैं कि पहले बच्चे को खाने की यह चीज अपरिचित लगती है, फिर उसमें जिज्ञासा शुरू होती है, वह खाने को देखता और सूंघता है और फिर धीरे-धीरे खाना शुरू करता है.

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स्क्रीन के सामने ना खिलाएं खाना

डाइटीशियन पैरेंट्स को खासतौर से यह सलाह देती हैं कि बच्चे की फूड हैबिट्स को माता-पिता कई तरह से प्रभावित करते हैं. बच्चे के सामने जंक फूड खाना और रिवॉर्ड में उसे जंक फूड देना सही नहीं है. इसके अलावा, बच्चा अगर खाना नहीं खाता है तो उस समय उसे स्क्रीन के सामने ना बिठाएं. बच्चा अगर टीवी या फोन की स्क्रीन के सामने बैठकर खाता है तो उसका पूरा ध्यान स्क्रीन पर होता है. इससे बच्चे को यह नहीं पता चलता कि उसे भूख कब लगी, उसका पेट कब भरा या जो खाना वह खा रहा है उसका स्वाद कैसा है, खाने का नाम क्या है, रंग कैसा है या बनावट कैसी है.

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माता-पिता के साथ या पूरे परिवार के साथ खाना खाने के अनुभव को बच्चे से नहीं छीनना चाहिए. खाना खाते समय परिवार से होने वाली बातें और परिवार से साथ बनने वाली बॉन्डिंग को स्क्रीन रिप्लेस कर देती है. इससे बच्चे का दिमाग यह सीखता है कि खाना खाने का मतलब है कि बच्चे को उसका मनपसंद कार्टून देखने को मिलेगा जोकि एक नेगेटिव फूड हैबिट है. बच्चे मासूम होते हैं और उन्हें सही और गलत के बारे में नहीं पता होता है. ऐसे में यह पैरेंट्स की जिम्मेदारी है कि वे उन्हें खाने से जुड़ी अच्छी आदतें सिखाएं.

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अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.


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Source - AIIMS

First published on: Sep 18, 2026 03:37 PM

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About the Author

Seema Thakur

सीमा ठाकुर पत्रकारिता से पिछले 7 सालों से जुड़ी हैं. न्यूज24 में सीमा बतौर चीफ सब एडिटर काम कर रही हैं. सीमा हेल्थ और लाइफस्टाइल बीट पर लिखती हैं और कॉन्टेन्ट क्रिएशन के साथ ही टीम लीड की भूमिका भी निभा रही हैं. न्यूज24 में सीमा ने अपनी बीट से हटकर इलेक्शंस की स्टोरीज पर भी काम किया है. हेल्थ और लाफस्टाइल से जुड़ी स्टडीज, लेटेस्ट न्यूज और एक्सपर्ट्स/डॉक्टर्स से बातचीत पर आधारित लेख लिखने में सीमा की मजबूत पकड़ है. सीमा हेल्थ खबरों और लेटेस्ट अपडेट के लिए AIIMS, ICMR, WHO,  स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों और डॉक्टरों के संपर्क में रहती है. अनुभव सीमा ने पत्रकारिता की शुरुआत दिल्ली प्रेस ग्रुप से की थी जहां वे सरिता, मुक्ता और गृहशोभा मैग्जीन में वुमेन ओरिएंटेड, सोशल, लाइफस्टाइल, हेल्थ और बॉलीवुड के अलावा पॉलिटकल आर्टिकल्स लिखती थीं. सीमा को प्रूफरीडिंग और एडिटिंग का भी खासा अनुभव है. प्रिंट में काम करने के दौरान सीमा की हिंदी भाषा में अच्छी पकड़ है. दिल्ली प्रेस के बाद सीमा डायमंड पब्लिशिंग हाउस से जुड़ी थीं जहां उन्होंने मैग्जीन और वेबसाइट दोनों के लिए काम किया. डायमंड पब्लिशिंग हाउस के बाद सीमा ने NDTV के साथ डिजिटल मीडिया में अपना करियर शुरू किया. NDTV में सीमा ने राइटर के साथ ही वीडियो प्रोड्यूसर, एंकर और पॉडकास्टर के तौर पर भी काम किया. लाइफस्टाइल वीडियोज और बॉलीवुड गोल्ड सीरीज को प्रोड्यूस और एंकर करने के साथ ही वे बॉलीवुड पॉडकास्ट किया करती थीं. वीडियो प्रोडक्शन में सीमा का इंटरेस्ट और पकड़ यहीं से आई है. शिक्षा सीमा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज से बी.ए किया है. इसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. जामिया की पीजी डिप्लोमा इन जर्नलिज्म डिपार्टमेंट की मैग्जीन में सीमा स्टूडेंट एडिटर और अपने बैच की कॉन्टेंट हेड रह चुकी हैं. अनुभव - 7 साल शिक्षा - जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा पिछला अनुभव - NDTV, दिल्ली प्रेस, डायमंड पब्लिशिंग हाउस

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