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Religion

Dasha Mata Vrat Katha: आज 13 मार्च 2026 को दशा माता व्रत पर पढ़ें ये कथा, बदलेंगे दिन और होगा लाभ ही लाभ

Dasha Mata Ki Kahani Likhit Mein: आज 13 मार्च 2026 को देवी लक्ष्मी के रूप दशा माता और विष्णु जी के स्वरूप पीपल के पेड़ को समर्पित दशा माता व्रत है, जिसका विवाहित महिलाओं के लिए खास महत्व है. हालांकि, आज के दिन केवल व्रत व पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि उपवास की कथा सुनना-पढ़ना भी शुभ होता है. यहां पर आप दशा माता व्रत की कथा पढ़ सकते हैं.

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Written By: Nidhi Jain Updated: Mar 13, 2026 07:12
Dasha Mata Vrat Katha In Hindi
Credit- Pinterest

Dasha Mata Vrat Katha In Hindi: प्रत्येक वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशा माता व्रत रखा जाता है, जो कि इस बार आज 13 मार्च 2026, वार शुक्रवार को रखा जा रहा है. खासतौर पर ये व्रत विवाहित महिलाएं अपने घर की सुख-शांति और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए रखती हैं. इस दिन महिलाएं न सिर्फ शाम तक उपवास रखती हैं, बल्कि सुबह-सुबह माता लक्ष्मी के रूप दशा देवी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु के स्वरूप पीपल के वृक्ष की पूजा भी करती हैं.

हालांकि, पूजा के दौरान दशा माता व्रत की कथा सुनना या पढ़ना भी जरूरी होता है, अन्यथा उपासना का पूरा फल नहीं मिलता है. चलिए अब जानते हैं आज पढ़ी जाने वाली दशा माता व्रत की कथा के बारे में.

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दशा माता व्रत की कथा (Dasha Mata Ki Kahani)

राजमहल में आई एक ब्रह्माणी

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नल नामक राजा था, जिसकी पत्नी दमयंती थी. एक दिन राजमहल में एक ब्रह्माणी रानी के पास अपनी परेशानी लेकर आई. ब्रह्माणी ने अपने गले में एक पीला डोरा बांध रखा था, जिस पर रानी की नजर गई और उसने उसके बारे में पूछा. ब्रह्माणी ने बताया कि ये डोरा दशा माता व्रत का है, जिसे गले में धारण करने से घर में सुख-शांति व अन्न-धन का वास होता है. रानी ने ब्रह्माणी से अपने लिए भी एक डोरा ले लिया और गले में पहन लिया.

राजा के सपने में आईं दशा माता

जब राजा ने रानी के गले में उस डोरे को देखा तो उन्होंने उसके बारे में पूछा. रानी ने राजा को पूरी बात बताई, लेकिन उन्होंने कहा ‘तुम्हें किस चीज की कमी है और उस डोरे को तोड़कर फेंक दिया.’ उसी रात दशा माता राजा के सपने में आई और कहा ‘हे राजा, तेरी अच्छी दशा जल्द बुरी दशा में बदल जाएगी. तूने मेरा अपमान करके ठीक नहीं किया.’ इसी के बाद राजा की संपत्ति में कमी आने लगी, जिसके बाद उसने वहां से जाने का निश्चय किया.

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बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया

इसी दौरान रास्ते में चलते-चलते भील नामक राजा का महल पड़ा, जहां नल ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया. कुछ दूरी पर राजा के एक दोस्त का घर था, जहां उन्होंने कुछ देर रुकने का निश्चय किया. रात काफी हो चुकी थी, इसलिए राजा के दोस्त ने उसे और उसकी पत्नी को रातभर वहीं रुकने को कहा. रात में जब राजा-रानी सो रहे थे तो उसी कमरे में एक खूंटी पर हीरों का कीमती हार टंगा था. मध्यरात्रि में जब रानी की नींद खुली तो उसने देखा कि एक मोरनी हार को खा रही है. ये देख रानी घबरा गई और उसने राजा को उठाया, लेकिन तब तक हार मोरनी के पेट में जा चुका था. ये देख राजा-रानी घबरा गए और रात में ही अपने दोस्त का घर छोड़ने का निश्चय किया.

अगले दिन सुबह जब राजा का दोस्त और उसकी पत्नी नींद से जागे तो उन्होंने देखा कि घर में न तो हार है और न ही वो दोनों. ऐसे में वो राजा-रानी को चोर समझने लगे.

जमीन में गाड़ दिया भोजन

कुछ ही देर बाद राजा-रानी अपनी बहन के घर पहुंच गए. बहन ने अपने भाई और भाभी के भोजन की व्यवस्था की. राजा ने तो अपनी बहन के घर खाना खा लिया, लेकिन रानी ने अपने हिस्से का भोजन जमीन में गाड़ दिया. अपनी बहन से विदा लेकर वो कुछ ही दूर तक आए थे कि रास्ते में एक नदी पड़ी.

राजा ने नदी से मछलियां निकालकर रानी को पकड़ा दीं और खुद बर्तन लाने के लिए एक गांव में चल पड़ा. राजा जब गांव पहुंचा तो उसने देखा कि वहां पर एक सेठ सभी लोगों को भोजन करा रहा है. राजा ने खुद तो वहीं पर भोजन कर लिया और अपनी पत्नी के लिए भोजन लेकर आ रहा था, लेकिन बीच रास्ते में ही चील के झपट्टे के कारण सारा खाना गिर गया.

दूसरी तरफ रानी के हाथ से मछलियां गिरकर नदी में वापस चली गईं. ये देख रानी उदास हो गई और सोचने लगी कि राजा को लगेगा कि उसने ही सारी मछलियां खा ली हैं. जब राजा रानी के पास पहुंचा तो दोनों में से किसी ने भी कुछ नहीं कहा और आगे चलने लगे.

रानी ने रखा दशा माता का व्रत

कुछ देर बाद रानी के मायके का गांव पड़ा. राजा ने रानी से कहा कि ‘तुम अपने मायके चली जाओ और वहां जाकर दासी का काम कर लेना, जबकि मैं तेली के घर पर काम कर लूंगा.’ इसी बीच दशा माता का व्रत पड़ा. दासी ने भी ये व्रत रखने का निश्चय किया. इसी दिन राजमाता सभी रानियों का सिर गूंथ रही थीं. वहीं, पर दासी (रानी दमयंती) भी खड़ी थीं. राजमाता दासी का सिर गूंथने लगीं, लेकिन बीच में ही रोने लगीं. दासी ने जब उनसे रोने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा ‘तेरे जैसी मेरी बेटी के सिर में भी पद्म था.’ दासी अपने आप को रोक नहीं पाई और बोली मैं ही आपकी बेटी हूं. साथ ही कहा ‘दशा माता के प्रकोप के कारण हमारा सब कुछ छिन गया.’

दासी ने पूरे विधि-विधान से दशा माता का व्रत किया, जिसके बाद उनके अच्छे दिन लौट आए. राजा-रानी ने अपने महल वापस जाने का निश्चय किया. रानी दमयंती के पिता ने उन्हें खूब सारा धन व हाथी-घोड़े आदि देकर विदा किया.

राजा-रानी ने एक-दूसरे को बताया सच

रास्ते में राजा-रानी का रथ उसी नदी के पास रुका, जहां से उन्होंने मछलियां निकाली थीं. तभी राजा-रानी ने एक-दूसरे को भोजन का सच बताया. इसके बाद वो अपनी बहन के घर गए, जहां रानी दमयंती ने धरती माता से प्रार्थना कि और कहा ‘धरती मां मुझे मेरी अमानत वापस कर दो’ और उसी जगह पर खुदाई कि जहां भोजन गाड़ा था. हालांकि, इस बार वहां से सोने की रोटी और चांदी का कांदा निकला. रानी ने दोनों चीजें अपनी ननद को दीं और वहां से राजा के साथ चल पड़ी.

मित्र को बताई पूरी बात

अब वो दोनों राजा के मित्र के घर गए. राजा के मित्र ने फिर से उनका स्वागत किया और रात में रुकने को कहा. उसी रात फिर से मोरनी वहां आई और हार उगलने लगी. तभी राजा ने अपने मित्र को जगाया और उसे पूरी बात बताई. अगले दिन राजा-रानी वहां से चल पड़े और भील राजा के महल में पहुंचे. वहां से अपने बच्चों को लेकर अपने राज्य में पहुंच गए. राजा-रानी को अपने राज्य में देखकर नगरवासी बहुत खुश हुए और उनका भव्य स्वागत किया. राजा-रानी ने नगरवासियों को दशा माता की महिमा के बारे में बताया और हर साल इस दिन पूजा-पाठ करने का निश्चय किया.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Mar 13, 2026 07:10 AM

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