Ashadha Navratri 2026: आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि 15 जुलाई, 2026 से शुरू हो रही है. यह सिर्फ 9 दिनों का त्योहार नहीं, बल्कि तंत्र-मंत्र और दश महाविद्याओं की साधना का महापूजन काल है. इस साल की खास बात यह है कि मां दुर्गा ‘नाव’ पर सवार होकर आ रही हैं और ‘हाथी’ पर बैठकर विदा होंगी. देवी भागवत पुराण के अनुसार, जब नवरात्रि बुधवार से शुरू होती है, तो माता की सवारी नाव होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं इन सवारियों का क्या अर्थ है और इसका हमारे जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ता है? आइए, जानते हैं इसके पीछे का गहरा रहस्य क्या है?
देवी की सवारियों का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि जिस दिन से शुरू होती है, उसके आधार पर मां दुर्गा के वाहन का निर्धारण होता है. इस बार आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 15 जुलाई, बुधवार से प्रारंभ हो रही है. परंपरा के मुताबिक, इसलिए इस बार देवी मां नाव पर सवार होकर आएंगी.
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नाव पर आगमन का अर्थ
बुधवार के दिन मां दुर्गा का नाव पर आना अत्यंत शुभ माना जाता है. यह सवारी भक्तों के लिए बड़े संकटों से मुक्ति और मनोकामनाओं के पूर्ण होने का संकेत है. मान्यता है कि देवी इस बार भक्तों की ‘नैया पार’ लगाएंगी. जिन लोगों के जीवन में कठिनाइयां हैं, उनके लिए यह बहुत अच्छा संकेत है.
हाथी पर प्रस्थान का अर्थ
इस बार आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के अंत में मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर विदा होंगी. हाथी की सवारी सुख, समृद्धि, शांति और अच्छी वर्षा का प्रतीक माना गया है. इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में भारतवर्ष में खुशहाली और उन्नति आएगी.
गुप्त नवरात्रि की साधना
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में देवी दुर्गा के 9 रूपों के के साथ-साथ दश महाविद्याओं की साधना का विशेष महत्व है. इन 9 दिनों में मां काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और मां कमला की उपासना की जाती है. हिन्दू धर्म में यह समय गुप्त मंत्रों के जाप और आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करने के लिए बहुत उत्तम माना गया है.
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आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 की खास तिथियां
घट-स्थापना: 15 जुलाई, बुधवार (सुबह 5:33 से 10:09 बजे तक)
महाअष्टमी: 22 जुलाई, बुधवार
महानवमी और पारण: 23 जुलाई, गुरुवार
गुप्त नवरात्रि का महत्व
गुप्त नवरात्रि में सात्विकता और संयम बहुत जरूरी है. यह समय तंत्र-मंत्र साधना के लिए सबसे अनुकूल होता है. देवी को प्रसन्न करने के लिए सच्ची श्रद्धा और नियमित पूजा-पाठ जरूरी है. मान्यता है कि इस दौरान की गई साधना कई गुना अधिक फलदायी होती है.
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