150 सालों से बंद है इस गांव में होली का जश्न, आखिर क्या है इसके पीछे की कहानी?

Where Holi Is Not Celebrated: क्या आपको पता है कि भारत में एक ऐसा गांव भी है यहां पर पिछले 150 सालों से न तो होली खेली जाती है और न ही होलिका दहन होता है. लोग ना कहीं रंग उड़ाते हैं और ना ही ढोल की आवाज सुनाई देती है, लेकिन ऐसा क्यों है?

Bharat Mein Holi Kaha Nahi Manate

क्या है 150 साल पुरानी कहानी? Image Credit- Shutterstock

Bharat Mein Holi Kaha Nahi Manate: भारत में होली का नाम सुनते ही चेहरे पर अलग ही मुस्कान आ जाती है. रंग, गुलाल, ढोल-नगाड़े और मस्ती की तस्वीर जैसी चीजें भी सामने आती रहती हैं. वैसे फाल्गुन का पूरा महीना ही रंगों में डूबा हुआ गुजरता है, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में एक ऐसा गांव भी है जहां पर होली नहीं मनाई जाती है? इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के खरहरी गांव में पिछले करीब 150 सालों से न तो होली खेली जाती है और न ही होलिका दहन होता है. लोग ना कहीं रंग उड़ाते हैं और ना ही ढोल की आवाज सुनाई देती है, लेकिन ऐसा क्यों है? आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं. 

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क्या है 150 साल पुरानी कहानी?

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग डेढ़ सौ साल पहले होली के दिन गांव में एक बड़ी अनहोनी हुई थी. कहा जाता है कि होलिका दहन के दौरान आग बेकाबू हो गई थी और कई घर इसकी चपेट में आ गए थे. गांव को भारी नुकसान उठाना पड़ा. 

गांव की पंचायत का फैसला 

इस हादसे के बाद गांव के एक प्रतिष्ठित परिवार में अचानक मृत्यु हो गई थी. इन घटनाओं को गांव वालों ने अपशकुन माना था. इसके बाद गांव की पंचायत ने सामूहिक निर्णय लिया कि भविष्य में गांव की सीमा के अंदर कभी भी होली नहीं मनाई जाएगी. 

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नहीं किया जाता होलिका दहन

पूरे देश में होलिका दहन बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. होली से एक दिन पहले होलिका दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, लेकिन खरहरी गांव में यह परंपरा पूरी तरह बंद है. गांव के लोग उस दिन ना तो लकड़ियां इकट्ठा करते हैं और ना ही किसी तरह का आयोजन करते हैं. 

फिर कैसे मनाते हैं त्योहार? 

गांव के लोग होली ना मनाने को लेकर विरोध नहीं करते हैं. अगर कोई रंग खेलना चाहता है तो वह गांव की सीमा से बाहर जाकर होली मना सकता है. हालांकि, लोगों को गांव की चौहद्दी के भीतर रंग, गुलाल या जश्न की इजाजत नहीं है. इस नियम का पालन सभी लोग बिना किसी विवाद के करते हैं. 

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परंपरा तोड़ने पर क्या हुआ था? 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ साल पहले गांव की इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन उसी समय गांव में बीमारी फैलने की चर्चा हुई. इसके बाद, लोगों का विश्वास और गहरा हो गया कि यह परंपरा गांव की भलाई से जुड़ी है. 

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लेखक के बारे में

Shadma Muskan

Shadma Muskan

शादमा मुस्कान न्यूज 24 डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं और हेल्थ व लाइफस्टाइल बीट कवर करती हैं. शादमा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज से BJMC और दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस से पीजी डिप्लोमा किया है. उन्होंने गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार से MJMC की पढ़ाई भी की है. शादमा को पत्रकारिता के क्षेत्र में 5 साल से ज्यादा का अनुभव है. शादमा ने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका और हरिभूमि में इंटर्नशिप से की. इसके बाद, उन्होंने जागरण न्यू मीडिया की वेबसाइट हरज़िंदगी के साथ 4 साल से अधिक समय तक काम किया, जहां उन्होंने हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लेखन किया. इस दौरान उन्होंने ब्यूटी, फैशन, फूड, होम रेमेडीज, गार्डनिंग, होम डेकोर और पेरेंटिंग जैसे विषयों पर भी काम किया. इस अनुभव के दौरान शादमा ने अलग-अलग क्षेत्रों के कई विशेषज्ञों के साथ काम किया है. एक्सपर्ट ओपीनियन के आधार पर वह रीडर्स तक सटीक और आसान शब्दों में चीजों को पहुंचाने का काम कर रही हैं. कुल अनुभव - 5 साल पिछला अनुभव- शादमा ने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की. इसके बाद तहजीब टीवी, हरिभूमि और जागरण न्यू मीडिया की वेबसाइट के साथ चार साल तक हेल्थ और लाइफस्टाइल पर लिखा. किस क्षेत्र में महारत शादमा मुस्कान को लाइफस्टाइल, ट्रैवल, फूड और हेल्थ से जुड़े विषयों के बारे में काफी अच्छी जानकारी है. इसके अलावा शादमा को फूड रिव्यू, किचन गाइड, फैशन टिप्स, शॉपिंग गाइड, ब्यूटी, रिलेशनशिप और इंटीरियर पर वह विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर लिखती हैं.
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