भारत की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसे समझने और सीखने के लिए विदेश से लोग आते हैं और यहां लंबा वक्त बिता कर बड़ों का आदर, पूजा, प्यार, आदि कई भारतीय संस्कृति को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं. लेकिन चिंता की बात यह है कि जो बच्चे यहां पैदा हो रहे हैं, उनके बीच भारत की अनोखी वे खूबसूरत संस्कृति कहीं न कहीं धुंधली दिखाई देने लगी है. बच्चों के बीच फोन का बढ़ता ट्रेंड और माता पिता की गैर जिम्मेदारी के कारण बच्चे अपनी संस्कृति से दूर हो रहे हैं, जिसके बाद माता-पिता की शिकायत रहती है कि बच्चे न सिर्फ उनकी बात नहीं मानते, बल्कि कई बार उन पर चिल्लाने भी लगते हैं, जोकि हमारी संस्कृति का हिस्सा बिल्कुल नहीं है.
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बाबा रामदेव ने की बेहतरीन शुरुआत
योग गुरु बाबा रामदेव ने इस समस्या से निपटने के लिए साल 2013 में गुरुकुल आचार्यकुलम की शुरुआत की, जिसे मॉडर्न गुरुकुल भी कहा जाता है. यहां शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसे जागरूक और सक्षम व्यक्तित्व तैयार करना है जो समाज, देश व दुनिया के विकास में अच्छा योगदान दे सकें. इस संस्थान में वैदिक ज्ञान, संस्कृत, वेद, उपनिषद, भारतीय इतिहास और दर्शन जैसे विषयों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है, ताकि छात्र आध्यात्मिक और बौद्धिक दोनों रूप से मजबूत बनें.
कैसे होता मिलता है यहां एडमिशन?
यहां एडमिशन का तरीका थोड़ा अलग है, जहां आम मॉडर्न स्कूलों में नर्सरी से एडमिशन शुरू हो जाते हैं, यहां 5वीं से 12वीं तक की पढ़ाई होती है. आचार्यकुलम में प्रवेश के लिए पूरे भारत में परीक्षा आयोजन होती है, जो आमतौर पर दिसंबर-जनवरी में आयोजित होती है, जिसमें सामान्य ज्ञान, अंग्रेजी, रीजनिंग और करेंट अफेयर्स से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं, पासिंग मार्क्स पाने के बाद ही तय सीटों पर दाखिला होता है.
क्यों जरूरी है आज के समय में ऐसा संस्थान?
आज के दौर में जब परिवार छोटे हो रहे हैं और माता-पिता की व्यस्तता बढ़ रही है, तब बच्चों के अंदर संस्कारों का ज्ञान देना काफी मुश्किल हो गया है. आचार्यकुलम जैसे संस्थान एक 'सुरक्षित कवच' की तरह काम करते हैं, यहां बच्चा न सिर्फ 'इंजीनियर' या 'डॉक्टर' बनने का सपना देखता है, बल्कि वह एक संवेदनशील इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनना भी सीखता है. यह स्कूल सिखाता है कि प्रगति का अर्थ अपनी जड़ों को भूलना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को मजबूत करते हुए आसमान छूना है, जो कहीं न कहीं बच्चे भूल गए हैं.
ऐसे में अगर आप भी अपने बच्चे को एक ऐसा भविष्य देना चाहते हैं जहां वह आधुनिकता की दौड़ में पीछे न रहे और अपनी संस्कृति का गौरव भी बना रहे, तो आचार्यकुलम एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है, यहां के एडिमशन के लिए हर साल फॉर्म निकलते रहते हैं, जिसे फॉलो करके आप सही समय पर एडमिशन ले सकेंगे.
यह भी पढ़ें: माता-पिता को शुगर है तो क्या आपको भी होगी? जानिए बचाव के 4 आसान तरीके
भारत की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसे समझने और सीखने के लिए विदेश से लोग आते हैं और यहां लंबा वक्त बिता कर बड़ों का आदर, पूजा, प्यार, आदि कई भारतीय संस्कृति को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं. लेकिन चिंता की बात यह है कि जो बच्चे यहां पैदा हो रहे हैं, उनके बीच भारत की अनोखी वे खूबसूरत संस्कृति कहीं न कहीं धुंधली दिखाई देने लगी है. बच्चों के बीच फोन का बढ़ता ट्रेंड और माता पिता की गैर जिम्मेदारी के कारण बच्चे अपनी संस्कृति से दूर हो रहे हैं, जिसके बाद माता-पिता की शिकायत रहती है कि बच्चे न सिर्फ उनकी बात नहीं मानते, बल्कि कई बार उन पर चिल्लाने भी लगते हैं, जोकि हमारी संस्कृति का हिस्सा बिल्कुल नहीं है.
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बाबा रामदेव ने की बेहतरीन शुरुआत
योग गुरु बाबा रामदेव ने इस समस्या से निपटने के लिए साल 2013 में गुरुकुल आचार्यकुलम की शुरुआत की, जिसे मॉडर्न गुरुकुल भी कहा जाता है. यहां शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसे जागरूक और सक्षम व्यक्तित्व तैयार करना है जो समाज, देश व दुनिया के विकास में अच्छा योगदान दे सकें. इस संस्थान में वैदिक ज्ञान, संस्कृत, वेद, उपनिषद, भारतीय इतिहास और दर्शन जैसे विषयों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है, ताकि छात्र आध्यात्मिक और बौद्धिक दोनों रूप से मजबूत बनें.
कैसे होता मिलता है यहां एडमिशन?
यहां एडमिशन का तरीका थोड़ा अलग है, जहां आम मॉडर्न स्कूलों में नर्सरी से एडमिशन शुरू हो जाते हैं, यहां 5वीं से 12वीं तक की पढ़ाई होती है. आचार्यकुलम में प्रवेश के लिए पूरे भारत में परीक्षा आयोजन होती है, जो आमतौर पर दिसंबर-जनवरी में आयोजित होती है, जिसमें सामान्य ज्ञान, अंग्रेजी, रीजनिंग और करेंट अफेयर्स से संबंधित सवाल पूछे जाते हैं, पासिंग मार्क्स पाने के बाद ही तय सीटों पर दाखिला होता है.
क्यों जरूरी है आज के समय में ऐसा संस्थान?
आज के दौर में जब परिवार छोटे हो रहे हैं और माता-पिता की व्यस्तता बढ़ रही है, तब बच्चों के अंदर संस्कारों का ज्ञान देना काफी मुश्किल हो गया है. आचार्यकुलम जैसे संस्थान एक ‘सुरक्षित कवच’ की तरह काम करते हैं, यहां बच्चा न सिर्फ ‘इंजीनियर’ या ‘डॉक्टर’ बनने का सपना देखता है, बल्कि वह एक संवेदनशील इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनना भी सीखता है. यह स्कूल सिखाता है कि प्रगति का अर्थ अपनी जड़ों को भूलना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को मजबूत करते हुए आसमान छूना है, जो कहीं न कहीं बच्चे भूल गए हैं.
ऐसे में अगर आप भी अपने बच्चे को एक ऐसा भविष्य देना चाहते हैं जहां वह आधुनिकता की दौड़ में पीछे न रहे और अपनी संस्कृति का गौरव भी बना रहे, तो आचार्यकुलम एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है, यहां के एडिमशन के लिए हर साल फॉर्म निकलते रहते हैं, जिसे फॉलो करके आप सही समय पर एडमिशन ले सकेंगे.
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