दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो हुआ, वो पूरी दुनिया ने देखा. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे समेत कॉकरोच जनता पार्टी की सभी मांगें सरकार ने मान ली. प्रदर्शनकारियों में ज्यादातर Gen Z शामिल थे, लेकिन इसमें हर पीढ़ी के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. जंतर-मंतर पर दिखाई दे रही लोगों की भीड़ के बीच कुछ चेहरे ऐसे भी थे, जिन्हें किसी ने नहीं देखा. उन्होंने पर्दे के पीछे से इस आंदोलन को उस मुकाम तक पहुंचाया, जिसके आगे सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए.
ये भी पढ़ें: धर्मेंद्र प्रधान ही नहीं… 2014 के बाद ये 5 बड़े फैसले, जब दबाव में बदली मोदी सरकार की रणनीति
क्या था रोल?
आंदोलन की रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली इस टीम ने देश के युवाओं के ज़रिए अपने मुद्दों को सही तरीके से उठाया. अभिजीत दीपके के नाम पर शुरू हुआ ये विरोध प्रदर्शन देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया. दीपके इसका मुख्य चेहरा थे, तो वहीं दीपांगी रणनीति पर काम कर रही थीं. दीपांगी जैसे और भी कई युवा अपने-अपने तरीके से आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने में जुटे हुए थे.
कौन थे वो 7 चेहरे
वैष्णवी- इनमें सबसे पहला नाम है दिल्ली की रहने वाली वैष्णवी का, जो सीजेपी में प्रवक्ता हैं. उनका करियर बेहद दिलचस्प रहा है. वैष्णवी ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ कई रिसर्च सेंटर्स में काम किया है. उनका ये ही अनुभव आंदोलन की रणनीति तैयार करने में काम आया.
आशुतोष रांका- कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी इस प्रदर्शन को मुकाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. जयपुर के रहने वाले रांका ने कई सामाजिक आंदोलनों में हिस्सा लिया है. 'परिवर्तन'नाम से उनकी अपनी संस्था भी है, जो अरावली संरक्षण और नीट पेपर लीक जैसे मुद्दों पर अभियान कर चुकी है. केंद्र के सामने अपनी बात रखने में रांका की अहम भूमिका रही.
सौरव दास- एक जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर चुके सौरव दास ने मीडिया और केंद्र से बात करने का जिम्मा संभाला. उन्होंने सही तरीके से मुद्दों को पेश किया ताकि उनपर अमल किया जा सके.
दीपक- किसान परिवार से आने वाले राजस्थान के दीपक सीजेपी के प्रवक्ता हैं. वो लगातार किसानों से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं.
इनके अलावा बेंगलुरू की रहने वाली आफरीन ने इस आंदोलन से जुड़ने के लिए अपनी प्राइवेट नौकरी तक छोड़ दी. वहीं रत्ना और सिद्धांत ने भी नीट पेपर लीक का मुद्दा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आखिरकार सरकार को उनकी बात माननी पड़ी.
ये भी पढ़ें: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी ही क्यों बनाए गए शिक्षा मंत्री? 5 पॉइंट में जानें PM मोदी की पसंद की खासियतें
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो हुआ, वो पूरी दुनिया ने देखा. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे समेत कॉकरोच जनता पार्टी की सभी मांगें सरकार ने मान ली. प्रदर्शनकारियों में ज्यादातर Gen Z शामिल थे, लेकिन इसमें हर पीढ़ी के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. जंतर-मंतर पर दिखाई दे रही लोगों की भीड़ के बीच कुछ चेहरे ऐसे भी थे, जिन्हें किसी ने नहीं देखा. उन्होंने पर्दे के पीछे से इस आंदोलन को उस मुकाम तक पहुंचाया, जिसके आगे सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए.
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क्या था रोल?
आंदोलन की रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली इस टीम ने देश के युवाओं के ज़रिए अपने मुद्दों को सही तरीके से उठाया. अभिजीत दीपके के नाम पर शुरू हुआ ये विरोध प्रदर्शन देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया. दीपके इसका मुख्य चेहरा थे, तो वहीं दीपांगी रणनीति पर काम कर रही थीं. दीपांगी जैसे और भी कई युवा अपने-अपने तरीके से आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने में जुटे हुए थे.
कौन थे वो 7 चेहरे
वैष्णवी- इनमें सबसे पहला नाम है दिल्ली की रहने वाली वैष्णवी का, जो सीजेपी में प्रवक्ता हैं. उनका करियर बेहद दिलचस्प रहा है. वैष्णवी ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ कई रिसर्च सेंटर्स में काम किया है. उनका ये ही अनुभव आंदोलन की रणनीति तैयार करने में काम आया.
आशुतोष रांका- कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी इस प्रदर्शन को मुकाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. जयपुर के रहने वाले रांका ने कई सामाजिक आंदोलनों में हिस्सा लिया है. ‘परिवर्तन’नाम से उनकी अपनी संस्था भी है, जो अरावली संरक्षण और नीट पेपर लीक जैसे मुद्दों पर अभियान कर चुकी है. केंद्र के सामने अपनी बात रखने में रांका की अहम भूमिका रही.
सौरव दास- एक जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर चुके सौरव दास ने मीडिया और केंद्र से बात करने का जिम्मा संभाला. उन्होंने सही तरीके से मुद्दों को पेश किया ताकि उनपर अमल किया जा सके.
दीपक- किसान परिवार से आने वाले राजस्थान के दीपक सीजेपी के प्रवक्ता हैं. वो लगातार किसानों से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं.
इनके अलावा बेंगलुरू की रहने वाली आफरीन ने इस आंदोलन से जुड़ने के लिए अपनी प्राइवेट नौकरी तक छोड़ दी. वहीं रत्ना और सिद्धांत ने भी नीट पेपर लीक का मुद्दा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आखिरकार सरकार को उनकी बात माननी पड़ी.
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