Pawan Mishra
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देश की सुरक्षा में भारतीय सेना 24 घंटे बिना ब्रेक की लगी रहती है और जब सेना को ही घटिया क्वालिटी का हथियार मुहैया करा दिया जाए, तब सोचिए कि कैसे इन हथियारों के दम पर चौकसी बरतेंगे. संसद की लोक लेखा समिति की 54वीं रिपोर्ट के सामने आने के बाद रक्षा मंत्रालय में हड़कंप मच गया है. रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि गंभीर हादसे जिनकी संख्या 269 है, जो सेना के लिए छोटे हथियार मुहैया कराए गए थे. यह आंकड़ा साल 2015 से लेकर 2020 तक का है. रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह की घटना कबाड़ हो चुकी राइफल्स, छोटे हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए खराब कच्चे माल और इसकी निगरानी ठीक से नहीं कर पाना एक बड़ी वजह मानी जा रही है.
न्यूज 24 के पास सीएजी की रिपोर्ट से मिली जानकारी के मुताबिक 2023 की रिपोर्ट संख्या 5 में कई गंभीर सवाल भारतीय रक्षा मंत्रालय के ऊपर उठाए गए है. डिफेंस प्रोडक्शन और उसके काम करने के तरीके की बारीकी से समीक्षा की गई है, समीक्षा के बाद यह सामने आया कि नई पीढ़ी के हथियार के निमार्ण में कई अनियमितता बरती गई है. इसके प्रोडक्शन पर भी कई गंभीर सवाल उठाए गए है.
कई बार यह मामला देखने को मिला की हथियार से फायरिंग के दौरान जवान या तो घायल हो गया है या फिर उसकी मौत हो गई है. इसे एक हादसा मानकर सेना खामोश हो जाती थी, लेकिन जब इसकी बारीकी से जांच की गई तो एक अलग ही मामला सामने आते दिखा. नफरी करने वाले सैनिकों के पास सालों पुराना हथियार रहता है और जो नए छोटे हथियार दिए जाते हैं वह मानक पर खरा नहीं उतरा था यानी खराब क्वॉलिटी से इसे बनाया गया था.
पीएससी की रिपोर्ट में इंसास राइफल का जिक्र विशेष तौर पर किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक 5.56 एमएम की इंसास में कई गड़बड़ी देखी गई है. 26 राइफल की ऑडिट की गई थी जिसमें 14 राइफल की गुणवत्ता बेहद ही खराब निकली. रिपोर्ट के मुताबिक इन राइफलों में सबसे ज्यादा कमी घटिया मटेरियल को लगाया जाने पर सबसे ज्यादा सवाल उठाए गए है. पीएसी के सवाल का जवाब देते हुए भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सफाई देते हुए कहा है कि देश की सेना में इस्तेमाल होने वाले इंसास राइफल का साल 1998, 1999 और 2003 में किया गया था, जिस वजह से हथियार पुराने हो गए हैं. अब इसको बदलने की प्रक्रिया की जा रही है. यानी जो इंसास राइफल का इस्तेमाल सेना कर रही है वह लगभग 23 साल पुराने हो चुके हैं.
रिटायर्ड मेजर जनरल एसके सिंह के मुताबिक, इंसास राइफल की उम्र 15 से 20 साल की होती है, अगर इस राइफल से 10 हजार फायरिंग हो चुकी है तो इसे तत्काल बेडे़ से हटा देने का नियम है. पीएसी की रिपोर्ट के मुताबिक जितने भी हादसे राइफल चलाने या टेस्टिंग के दौरान हुए है, उसकी सबसे बड़ी वजह कबाड़ हो चुके हथियार का इस्तेमाल करना ही है.
पीएसी में सिर्फ टेक्निकल फॉल्ट ही नहीं इंवेस्टिगेशन कर रही टीम पर भी सवाल किए गए हैं. आखिर ऐसी क्या वजह रही है कि इसकी जांच में इतना टाइम लग गया, क्योंकि दुर्घटना होने के एक महीने के अंदर रिपोर्ट तैयार करना होता है. पीएसी ने कहा कि डिफेक्ट इन्वेस्टिगेशन कमेटी समय पर जांच पूरी करने और तुरंत कार्रवाई करने में नाकाम रही है. इसमें कैसे सुधार किया जाए इसपर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.
इंसास राइफल की फैक्ट्री ईशापुर जो कि वेस्ट बंगाल में मौजूद है यहां होने वाले निर्माण पर भी कई गंभीर सवाल उठाए गए है. इस फैक्ट्री में राइफल तैयार करने के बाद उसकी क्वालिटी को बिना जांचे और परखे ही सीधा सेना के हवाले कर दिया जाता था. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर रेगुलर बेसिस पर इनकी जांच की जाए तो स्थिति बेहतर हो सकती है. यानी खराब राइफल को तत्काल रिप्लेस किया जा सकता है. साल 2015 से साल 2020 का जिक्र रिपोर्ट में किया गया है, यह बताया गया है कि पांच साल में सेना या पैरामिलिट्री की तरफ से बहुत कम मांग इंसास राइफल, लाइट मशीन गन, और 9 एमएम की पिस्टल की गई थी. आंकड़ों पर गौर करे तो जितना निर्माण फैक्ट्री में किया गया उसकी सिर्फ 10 फीसदी ही सप्लाई की गई. इससे यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि छोटे हथियारों की निगरानी की ही नही जाती है जिस वजह से बार-बार हादसे सामने आते रहते हैं.
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पीएसी की रिपोर्ट में यह विशेष तौर पर जिक्र किया गया है कि सेना की तरफ से बहुत कम डिमांड होने के साथ ही जो कीमत हथियारों को बनाने में लगती है यानी लागत से भी कम कीमत में सप्लाई करने के कारण 366 करोड़ रुपये का घाटा राइफल फैक्ट्री ईशापुर, स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री कानपुर और ऑर्डनेंस फैक्ट्री तिरुचिरापल्ली को साल 2015 से लेकर साल 2020 तक में हो गया है. पीएसी की तरफ से जवाब मांगे जाने पर डिफेंस मिनिस्ट्री की तरफ से कहा गया है कि हेडक्वार्टर लेवल पर हर तीसरे महीने एक मीटिंग रखे जाने के साथ ही क्वालिटी एश्योरेंस के डायरेक्टर जनरल के साथ काम करने का प्रस्ताव दिया गया है.
आर्मस के प्रोडक्शन की क्ववालिटी से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, हर 6 महीने पर इसकी गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए. सेना, पारामिलेट्री, स्टेट पुलिस को एक साथ डिमांड का प्लान करना चाहिए कि जिससे यह पहले ही पता लग जाएगा, कि किस लेयर में कितने हथियार की डिमांड है और कितने का प्रोडक्शन किया जाना चाहिए, जिससे कम से कम घाटा प्रोडक्शन कंपनी सह सके. रिपोर्ट के मुताबिक छोटे हथियार को बनाने वाली फैक्ट्री की यूनिट को ज्यादा मजबूती देने के लिए कंवॉलिटी कंट्रोल, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और टेक्निकल सिस्टम में बेहद ही सुधार की जरूरत है.
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