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UP के दलितों पर किसकी पकड़? BJP के जवाब में चंद्रशेखर का ‘बहुजन कार्ड’; क्या बदलेगा सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा सत्ता की चाबी रहा है. 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत सरकार से लेकर 2014 के बाद भाजपा के उभार और 2024 में PDA की चुनौती तक, हर दौर में दलित वोट निर्णायक रहा है. (मानस श्रीवास्तव की रिपोर्ट)

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2027 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को लेकर सियासी जंग तेज हो चुकी है. एक तरफ भाजपा संत रविदास, बाबा साहब अंबेडकर और सामाजिक समरसता के जरिए दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है. दूसरी तरफ आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने 45 विधानसभा प्रभारियों की पहली सूची जारी कर बहुजन राजनीति को नई धार देने की कोशिश की है. लिस्ट में एक भी सवर्ण चेहरा नहीं है. ऐसे में सवाल है… क्या 2027 में मुकाबला भाजपा के ‘समरसता अभियान’ और बहुजन राजनीति की नई गोलबंदी के बीच होगा?

दलितों के बीच पहुंच बना रही BJP

वाराणसी में संत रविदास जन्मस्थली से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समरसता संकल्प अभियान की शुरुआत की. मंच से सामाजिक समरसता, संत परंपरा और दलित महापुरुषों के सम्मान का संदेश दिया गया. मुख्यमंत्री ने संत रविदास, बाबा साहब अंबेडकर और महर्षि वाल्मीकि से जुड़े कई ऐलान किए. भाजपा इसे सामाजिक समरसता का अभियान बता रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 से पहले दलित समाज के बीच यह पार्टी का बड़ा राजनीतिक आउटरीच है.

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में समाजवादी पार्टी पर दलित महापुरुषों के सम्मान को लेकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने बाबा साहब अंबेडकर से जुड़े फैसलों को आगे बढ़ाया है और भदोही को फिर संत रविदास नगर के नाम से पहचान दिलाने की घोषणा की. साथ ही दलित महापुरुषों की प्रतिमाओं और स्मारकों के विकास का भी ऐलान किया.

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आजाद समाज पार्टी की रणनीति

भाजपा के इस अभियान के दो दिन बाद ही दलित राजनीति में एक नया संदेश आजाद समाज पार्टी की ओर से आया. चंद्रशेखर आजाद ने 45 विधानसभा प्रभारियों की पहली सूची जारी कर दी. इस सूची में 18 दलित, 16 ओबीसी, 10 मुस्लिम और एक सिख को जिम्मेदारी दी गई है, जबकि एक भी सवर्ण चेहरा शामिल नहीं है. पांच सामान्य सीटों पर भी दलित प्रभारियों की तैनाती कर पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि उसका फोकस बहुजन-मुस्लिम सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने पर है.

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INDIA गठबंधन का क्या फोकस

2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का एक हिस्सा इंडिया गठबंधन की ओर जाता दिखाई दिया था. समाजवादी पार्टी के PDA अभियान ने दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोटों को साथ लाने की कोशिश की. बसपा के कमजोर प्रदर्शन का फायदा भी विपक्ष को मिला. अब समाजवादी पार्टी इसी सामाजिक समीकरण को 2027 तक मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है.

कांग्रेस भी संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों के जरिए दलित समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाने में जुटी है. पार्टी का दावा है कि 2024 में बना सामाजिक गठजोड़ आने वाले विधानसभा चुनाव तक और मजबूत होगा.

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यूपी का दलित गणित :-

  • दलित आबादी : करीब 21 फीसदी
  • जाटव : BSP का पारंपरिक आधार
  • गैर-जाटव दलित : हाल के वर्षों में BJP का मजबूत आधार
  • 2024 में INDIA गठबंधन की ओर वोट शिफ्ट के संकेत

भाजपा समरसता के जरिए भरोसा मजबूत करना चाहती है, समाजवादी पार्टी PDA को धार दे रही है और अब चंद्रशेखर आजाद भी अलग बहुजन ध्रुवीकरण की कोशिश में हैं. ऐसे में लड़ाई अब सिर्फ दलित वोट पाने की नहीं, बल्कि उसका नेतृत्व तय करने की भी है क्योंकि स्पोर्ट बैंक की पारंपरिक और सबसे बड़ी दावेदार खुद मायावती थी. लिहाजा चौतरफा माहौल देखते हुए खुद मायावती भी आकाश आनंद के सहारे दलित वोट बैंक को लामबंद करने में जुट गईं.

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हर किसी की नजर दलितों पर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा सत्ता की चाबी रहा है. 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत सरकार से लेकर 2014 के बाद भाजपा के उभार और 2024 में PDA की चुनौती तक, हर दौर में दलित वोट निर्णायक रहा है. अब भाजपा सामाजिक समरसता और दलित महापुरुषों के सम्मान के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है. समाजवादी पार्टी PDA के जरिए सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने में लगी है. कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दे उठा रही है, जबकि चंद्रशेखर आजाद अपनी पार्टी के संगठन में दलित, ओबीसी और मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाकर खुद को बहुजन राजनीति के नए चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे 2027 में दलित वोटों की लड़ाई और दिलचस्प होने के संकेत मिल रहे हैं.

First published on: Jul 31, 2026 08:52 PM

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