Arif Khan
आरिफ खान मंसूरी को डिजिटल मीडिया में करीब 15 वर्षों का अनुभव है . वर्तमान में न्यूज24 की डिजिटल विंग में कार्यरत हैं. इससे पहले देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.
Read More---विज्ञापन---
2027 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को लेकर सियासी जंग तेज हो चुकी है. एक तरफ भाजपा संत रविदास, बाबा साहब अंबेडकर और सामाजिक समरसता के जरिए दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है. दूसरी तरफ आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने 45 विधानसभा प्रभारियों की पहली सूची जारी कर बहुजन राजनीति को नई धार देने की कोशिश की है. लिस्ट में एक भी सवर्ण चेहरा नहीं है. ऐसे में सवाल है… क्या 2027 में मुकाबला भाजपा के ‘समरसता अभियान’ और बहुजन राजनीति की नई गोलबंदी के बीच होगा?
वाराणसी में संत रविदास जन्मस्थली से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समरसता संकल्प अभियान की शुरुआत की. मंच से सामाजिक समरसता, संत परंपरा और दलित महापुरुषों के सम्मान का संदेश दिया गया. मुख्यमंत्री ने संत रविदास, बाबा साहब अंबेडकर और महर्षि वाल्मीकि से जुड़े कई ऐलान किए. भाजपा इसे सामाजिक समरसता का अभियान बता रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 से पहले दलित समाज के बीच यह पार्टी का बड़ा राजनीतिक आउटरीच है.
यह भी पढ़ें : गुरु पूर्णिमा पर CM योगी का बड़ा ऐलान, भदोही जिले का नाम बदला, कहलाएगा ‘संत रविदास नगर’
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में समाजवादी पार्टी पर दलित महापुरुषों के सम्मान को लेकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने बाबा साहब अंबेडकर से जुड़े फैसलों को आगे बढ़ाया है और भदोही को फिर संत रविदास नगर के नाम से पहचान दिलाने की घोषणा की. साथ ही दलित महापुरुषों की प्रतिमाओं और स्मारकों के विकास का भी ऐलान किया.
भाजपा के इस अभियान के दो दिन बाद ही दलित राजनीति में एक नया संदेश आजाद समाज पार्टी की ओर से आया. चंद्रशेखर आजाद ने 45 विधानसभा प्रभारियों की पहली सूची जारी कर दी. इस सूची में 18 दलित, 16 ओबीसी, 10 मुस्लिम और एक सिख को जिम्मेदारी दी गई है, जबकि एक भी सवर्ण चेहरा शामिल नहीं है. पांच सामान्य सीटों पर भी दलित प्रभारियों की तैनाती कर पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि उसका फोकस बहुजन-मुस्लिम सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने पर है.
यह भी पढ़ें : फिर सवालों में अयोध्या! मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की नगरी में बार-बार क्यों टूटती है मर्यादा ?
2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का एक हिस्सा इंडिया गठबंधन की ओर जाता दिखाई दिया था. समाजवादी पार्टी के PDA अभियान ने दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोटों को साथ लाने की कोशिश की. बसपा के कमजोर प्रदर्शन का फायदा भी विपक्ष को मिला. अब समाजवादी पार्टी इसी सामाजिक समीकरण को 2027 तक मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है.
कांग्रेस भी संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों के जरिए दलित समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाने में जुटी है. पार्टी का दावा है कि 2024 में बना सामाजिक गठजोड़ आने वाले विधानसभा चुनाव तक और मजबूत होगा.
यह भी पढ़ें : यूपी में मुस्लिम मतों को लेकर सपा को सताया डर, क्या ओवैसी देंगे ‘हाथ’ का साथ?
भाजपा समरसता के जरिए भरोसा मजबूत करना चाहती है, समाजवादी पार्टी PDA को धार दे रही है और अब चंद्रशेखर आजाद भी अलग बहुजन ध्रुवीकरण की कोशिश में हैं. ऐसे में लड़ाई अब सिर्फ दलित वोट पाने की नहीं, बल्कि उसका नेतृत्व तय करने की भी है क्योंकि स्पोर्ट बैंक की पारंपरिक और सबसे बड़ी दावेदार खुद मायावती थी. लिहाजा चौतरफा माहौल देखते हुए खुद मायावती भी आकाश आनंद के सहारे दलित वोट बैंक को लामबंद करने में जुट गईं.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा सत्ता की चाबी रहा है. 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत सरकार से लेकर 2014 के बाद भाजपा के उभार और 2024 में PDA की चुनौती तक, हर दौर में दलित वोट निर्णायक रहा है. अब भाजपा सामाजिक समरसता और दलित महापुरुषों के सम्मान के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है. समाजवादी पार्टी PDA के जरिए सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने में लगी है. कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दे उठा रही है, जबकि चंद्रशेखर आजाद अपनी पार्टी के संगठन में दलित, ओबीसी और मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाकर खुद को बहुजन राजनीति के नए चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे 2027 में दलित वोटों की लड़ाई और दिलचस्प होने के संकेत मिल रहे हैं.
न्यूज 24 पर पढ़ें Explainer, राष्ट्रीय समाचार (National News), खेल, मनोरंजन, धर्म, लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।