BRICS 2026: क्या दुनिया की अर्थव्यवस्था बदलने की है ताकत? जानिए बढ़ते समूह की बढ़ती चुनौतियां

सवाल यह नहीं है कि BRICS के पास वैश्विक प्रभाव है या नहीं. सवाल यह है कि क्या यह प्रभाव ऐसी साझा संस्थाओं में बदला जा सकता है, जिनके लिए सदस्य देशों को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता छोड़नी न पड़े.

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BRICS के पास वैश्विक प्रभाव है या नहीं. (Photo: AI)

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जब 12 सितंबर को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के लिए नेता नई दिल्ली पहुंचना शुरू करेंगे, तब राजधानी में किसी बड़े कूटनीतिक आयोजन जैसा माहौल होगा. सुरक्षा घेरा, मोटरकेड, बंद कमरे में बैठकें, अलग-अलग देशों के झंडे और बेहद सावधानी से तैयार किए गए संयुक्त घोषणापत्र, ये सब इस आयोजन का हिस्सा होंगे. लेकिन इन औपचारिकताओं के पीछे एक ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है.

आखिर BRICS बन क्या रहा है?

ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने करीब 20 साल पहले इस समूह को राजनीतिक पहचान दी थी और 15 साल पहले दक्षिण अफ्रीका इसके साथ जुड़ा. लेकिन अब BRICS पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का छोटा समूह नहीं रह गया है. आज यह एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका तक फैला 11 देशों का मंच है. इसके साथ 10 साझेदार देश भी जुड़े हुए हैं. इस समूह में दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश, दुनिया के कुछ सबसे बड़े ऊर्जा उत्पादक, प्रमुख विनिर्माण शक्तियां, महत्वपूर्ण जिंस निर्यातक और ऐसे देश शामिल हैं जिनके अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं.

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भारत ने जनवरी 2026 में BRICS की घूर्णन अध्यक्षता संभाली. इस साल भारत ने इसका विषय रखा है- ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’. भारत की अध्यक्षता के दौरान देशभर में वित्त, व्यापार, विज्ञान, ऊर्जा, तकनीक और लोगों के बीच संपर्क जैसे विषयों पर 350 से अधिक बैठकें और कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. BRICS को लेकर अक्सर इसे नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत, डॉलर के प्रभुत्व के अंत या पश्चिमी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन इन तीनों व्याख्याओं में कुछ न कुछ कमी है. BRICS न तो पूरी तरह तैयार कोई वैकल्पिक व्यवस्था है और न ही केवल बातचीत का मंच. यह इस बात का प्रयोग है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक संरचनाओं और रणनीतिक हितों वाले देश बिना औपचारिक गठबंधन बनाए कितनी साझा संस्थागत व्यवस्था तैयार कर सकते हैं.

एक संक्षिप्त नाम से राजनीतिक मंच तक

BRICS की शुरुआत अपेक्षाकृत सीमित उद्देश्य के साथ हुई थी. ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने 2006 में एक समूह के तौर पर बैठकें शुरू कीं. 2011 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ. शुरुआत में इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक था, ये बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं थीं, जिन्हें लगता था कि 21वीं सदी में बदल चुके आर्थिक समीकरण के हिसाब से वैश्विक संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है. धीरे-धीरे समूह ने राजनीतिक पहचान भी हासिल कर ली. वैश्विक वित्तीय संकट ने इस तर्क को मजबूत किया कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में अधिक प्रभाव मिलना चाहिए. 2015 में ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ की स्थापना महत्वपूर्ण कदम रही. इससे वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग केवल बयानबाजी नहीं रही, बल्कि एक वास्तविक संस्था का रूप लेने लगी.

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इसके बाद BRICS का विस्तार हुआ. मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समूह में शामिल हुए. 2025 में इंडोनेशिया भी इसका सदस्य बना. अब BRICS में आधिकारिक रूप से 11 सदस्य हैं. इसके अलावा साझेदार देशों की व्यवस्था भी है. बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम इस श्रेणी में हैं.

साझेदार देश BRICS के शिखर सम्मेलन और मंत्रिस्तरीय बैठकों में हिस्सा ले सकते हैं और आम सहमति होने पर अन्य बैठकों में भी भाग ले सकते हैं. यह विस्तार केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि अब मेज पर अधिक देशों के झंडे हैं. विस्तार ने संगठन के स्वरूप को ही बदल दिया है. मूल पांच देशों को, अपने मतभेदों के बावजूद, बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अपेक्षाकृत समान समूह के तौर पर देखा जा सकता था. लेकिन मौजूदा BRICS को परिभाषित करना कहीं ज्यादा कठिन है. इसमें लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दोनों तरह की व्यवस्थाएं हैं. ऊर्जा निर्यातक और ऊर्जा आयातक देश हैं.

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विनिर्माण दिग्गज और जिंस आधारित अर्थव्यवस्थाएं हैं. ऐसे देश भी हैं जिनके वॉशिंगटन से करीबी संबंध हैं और ऐसे भी जो पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं. यही विविधता BRICS की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी. इससे समूह को व्यापक भौगोलिक प्रतिनिधित्व मिलता है, लेकिन साझा नीतियां बनाना मुश्किल हो जाता है.

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आंकड़े प्रभावशाली हैं, लेकिन पूरी कहानी नहीं बताते

व्यापक आंकड़ों के लिहाज से BRICS बेहद बड़ा समूह है. भारतीय सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 11 सदस्य देश दुनिया की करीब आधी आबादी और क्रय शक्ति समानता यानी PPP के आधार पर वैश्विक GDP का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं. लेकिन इन देशों की आर्थिक संरचना बेहद अलग है. चीन दुनिया की विनिर्माण शक्ति है. भारत सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और सेवाओं तथा डिजिटल तकनीक का बड़ा केंद्र है. ब्राजील कृषि और जिंसों का प्रमुख निर्यातक है. रूस अभी भी ऊर्जा और कच्चे माल का बड़ा उत्पादक है. खाड़ी देशों के पास बड़ी वित्तीय और ऊर्जा संपदा है. मिस्र और इथियोपिया समूह को अफ्रीका में ज्यादा प्रतिनिधित्व देते हैं, जबकि इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है.

लेकिन कुल GDP बड़ा होना अपने आप में सामूहिक आर्थिक शक्ति की गारंटी नहीं है. किसी परिवार के पास बड़ा घर हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परिवार के सभी सदस्य इस बात पर सहमत होंगे कि घर के कमरों का इस्तेमाल कैसे किया जाए. चीन की अर्थव्यवस्था BRICS के अधिकांश देशों से कहीं बड़ी है. भारत के लिए चीन एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, लेकिन साथ ही वह सबसे जटिल रणनीतिक संबंधों में से एक भी है. ब्राजील की प्राथमिकताएं हमेशा रूस जैसी नहीं होतीं.

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खाड़ी देशों के अमेरिका के साथ व्यापक आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं, जबकि वे चीन, भारत और रूस के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत कर रहे हैं. इसलिए सवाल यह नहीं है कि BRICS के पास वैश्विक प्रभाव है या नहीं. सवाल यह है कि क्या यह प्रभाव ऐसी साझा संस्थाओं में बदला जा सकता है, जिनके लिए सदस्य देशों को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता छोड़नी न पड़े.

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