Emergency Movie Review: (Navin Singh Bhardwaj) ‘सारी उमर पिता और पति के बीच में जूझती रही, ना पिता खुश… ना पति’ – कंगना रनौत बतौर इंदिरा गांधी बन कर अपनी फिल्म इमरजेंसी में लाइनें कह रही हैं, लेकिन क्या इमरजेंसी की कहानी महज, 1975 से 1977 के बीच 22 महीने तक चली इमरजेंसी की ही कहानी है या फिर इंदिरा की कहानी में सिर्फ एक चैप्टर। उस वक्त आपातकाल के दौरान चुनाव स्थगित किए गए और नागरिक अधिकारों पर रोक लगाई गई, इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उस दौरान विरोधी पार्टी के अध्यक्ष जय प्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि’ कहा था। कंगना रनौत की ये फिल्म ‘इमरजेंसी’ कुमी कपूर की किताब द इमरजेंसी : ए पर्सनल हिस्ट्री पर आधारित है।
कैसी है फिल्म की कहानी?
आखिर कैसी है कंगना की ये फिल्म इसके लिए पढ़िए E 24 का रिव्यू। कहानी – फिल्म की कहानी में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन के मुख्य अध्याय को दिखाया गया है। प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण से लेकर उनकी मृत्यु तक की जर्नी को 2 घंटे 27 मिनट में समेट कर दिखाया गया है। हां इस से पहले इंदिरा गांधी को असम और चीन के बीच सुलह करवाते देखा गया है। वही प्रधानमंत्री पद मिलने के बाद 1971 के त्रिपुरा की बर्बर और विभत्स हालत और बांग्लादेश को आज़ाद राष्ट्र बनाने का घटनाक्रम भी दिखाया गया है। एमरजेंसी में इंदिरा के शिमला एग्रीमेंट की कहानी भी बताई गई है और साथ ही उनके बेटे संजय गांधी के मां-बेटे का क्लोजनेस को भी दिखाया गया है। आज़ाद भारत को पटरी पर लाने के लिए जो बन पड़ा वो करते इस फिल्म में श्रीमती इंदिरा गांधी को दिखाया गया है।
1929 से 1984 तक की इस कहानी में – ‘इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया’ के बीच की लकीर पर चलते हुए, कंगना ने एहतियात बहुत बरती है। डायरेक्टर, राइटिंग और म्यूजिक राइटर-डायरेक्टर-प्रोड्यूसर कंगना की फ़िल्म इमरजेंसी, अब थिएटर्स में आ गई है। इसमें इंदिरा और इतिहास को जैसे कंगना ने दिखाया है, उसका जमकर पोस्ट-मार्टम होगा। मगर स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स के मामले में – कंगना के साथ रितेश शाह और तन्वी केसरी पशुमार्थी ने मेहनत की है।