ईरान को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया रणनीति ने पश्चिम एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों की चिंता बढ़ा दी है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, ओमान और अन्य खाड़ी देशों का मानना है कि वॉशिंगटन की ईरान नीति में लगातार हो रहे बदलाव के कारण क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नई चुनौतियां पैदा हो रही है. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन के साथ करीबी संबंध होने के बावजूद ये देश अमेरिकी रणनीति को लेकर असहज नजर आ रहे हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के सप्ताह में अमेरिका ने एक ओर ईरान के खिलाफ कड़े तेवर अपनाए, जबकि दूसरी ओर बड़े सैन्य हमले की योजना को रोककर बातचीत और कूटनीतिक समाधान की ओर भी रुख किया. इस बदलते रुख ने खाड़ी देशों को असमंजस में डाल दिया है. उनका मानना है कि यदि अमेरिकी नीति स्पष्ट और स्थिर नहीं रही तो पूरे क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम बढ़ सकते हैं.
खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि किसी भी बड़े सैन्य टकराव का पहला असर उनके भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों पर पड़ेगा. फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है. ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ने की स्थिति में ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.
खाड़ी देशों ने अमेरिका से की ये अपील
सूत्रों के मुताबिक, सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों ने अमेरिका से सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देने की अपील की है. इन देशों का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकता है, जिसका असर निवेश, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा.
ट्रंप का कूटनीतिक प्रयास?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को ईरान को लेकर अपना रुख बदला. उन्होंने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान बताया कि खाड़ी देशों के नेताओं की सलाह और ईरान की ओर से मिले कुछ संदेशों के बाद उन्होंने सैन्य हमला फिलहाल रोकने का फैसला किया है.
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से सीधे पूछा था कि क्या अमेरिका को हमला करना चाहिए. इस पर क्राउन प्रिंस ने जवाब दिया कि युद्ध के बजाय बातचीत और समझौते का रास्ता बेहतर होगा, क्योंकि किसी भी सैन्य कार्रवाई के परिणाम गंभीर हो सकते हैं.
ट्रंप के मुताबिक, सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों को आशंका थी कि अगर हमला हुआ तो पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ जाएगा और भारी नुकसान हो सकता है. उनका मानना था कि अभी भी बातचीत के जरिए समाधान निकलने की संभावना है, इसलिए युद्ध से बचना चाहिए.
हालांकि, इससे एक दिन पहले ट्रंप का रुख बिल्कुल अलग था. उन्होंने कहा था कि उन्हें ईरान के साथ बातचीत पर भरोसा नहीं रहा और जरूरत पड़ने पर अमेरिका कड़ी सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा. लेकिन बाद में सहयोगी देशों की सलाह को देखते हुए उन्होंने फिलहाल हमले की योजना रोकने का फैसला लिया.
खाड़ी देश क्यों है चिंता में?
- ईरान के साथ लंबे समय से जारी तनाव और हमलों की वजह से खाड़ी देशों पर सुरक्षा का खतरा लगातार बढ़ रहा है.
- इन देशों ने अमेरिका से अतिरिक्त एयर डिफेंस इंटरसेप्टर और रक्षा प्रणाली उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि संभावित हमलों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके.
- खाड़ी देशों का कहना है कि यदि संघर्ष आगे बढ़ता है, तो अमेरिका उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने का भरोसा दे.
- वहीं, कई विशेषज्ञों और क्षेत्रीय अधिकारियों का मानना है कि ईरान को लेकर अमेरिका की मौजूदा सैन्य रणनीति स्पष्ट नहीं है, जिससे सहयोगी देशों के बीच अनिश्चितता और चिंता बढ़ रही है.
कूटनीतिक मोर्चे पर क्या है हलचल?
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर भी कोशिशें जारी हैं. शनिवार को कतर की मध्यस्थता में ईरान के सामने होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने का एक नया प्रस्ताव रखा गया है. शुरुआती जानकारी के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने इस प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख दिखाया है, हालांकि इसे अंतिम मंजूरी मिलने को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं हुई है.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्ताव में अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई वार्ता को फिर से शुरू करने, होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री आवाजाही बहाल करने और पूरे क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को कम करने का सुझाव दिया गया है. इसमें इराक में ईरान समर्थित समूहों द्वारा किए जाने वाले हमलों को रोकने की बात भी शामिल है. बदले में अमेरिका से नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और ईरान के तेल निर्यात पर लगी पांबदी में राहत देने का प्रस्ताव रखा गया है. हालांकि, इस मसले पर दोनों पक्षों के बीच अभी तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है.
इस बीच, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट किया कि होर्मुज स्ट्रेट को युद्ध से पहले जैसी स्थिति में बहाल करने का कोई फैसला नहीं लिया गया है. उन्होंने कहा कि ओमान के साथ समुद्री परिवहन को लेकर बातचीत जरूर चल रही है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने का मुद्दा फिलहाल एजेंडे में नहीं है.
वहीं, ईरान के रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया मंच X पर कहा कि देश अमेरिका की चेतावनियों को गंभीरता से ले रहा है और हर संभावित स्थिति के लिए तैयार है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान न तो किसी दबाव में है और न ही निष्क्रिय बैठा है.
रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के शीर्ष नेतृत्व में भी इस बात पर मतभेद हैं कि मौजूदा संकट का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाए या फिर अमेरिका पर दबाव बनाए रखने की नीति जारी रखी जाए. ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के कूटनीतिक कदम पूरे पश्चिम एशिया की स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं.
सऊदी अरब का क्या है रुख?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने शनिवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने आगाह किया कि यदि ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगी देशों या उनके हितों को निशाना बनाया, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है. उन्होंने अमेरिका से आगे की रणनीति और संभावित कदमों को लेकर स्पष्ट जानकारी देने का भी आग्रह किया.
सूत्रों के मुताबिक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कतर ने अपनी सुरक्षा तैयारियों को काफी मजबूत कर रखा है और वे संभावित ईरानी हमलों से निपटने के लिए भी तैयार हैं. हालांकि, कुवैत को लेकर अधिक चिंता जताई जा रही है, क्योंकि वहां ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों की गतिविधियों का खतरा ज्यादा माना जा रहा है.
रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि सऊदी अरब लगातार क्षेत्रीय तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान पर जोर देता रहा है. इससे पहले भी रियाद ने होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया था और अमेरिकी सैन्य हमलों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी.
क्या सभी खाड़ी देशों की राय एक जैसी है?
हालांकि अधिकांश खाड़ी देश तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान के पक्ष में हैं, लेकिन ईरान को लेकर सभी का रुख पूरी तरह एक जैसा नहीं है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान के खिलाफ अधिक सख्त रुख अपनाने की अपील की है. यूएई का मानना है कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) पर प्रभावी दबाव डालने के लिए कड़े कदम उठाना जरूरी है.
इजरायल की खुफिया एजेंसी के पूर्व अधिकारी डैनी सिट्रिनोविच का कहना है कि मौजूदा हालात में ट्रंप के फैसलों पर इजरायल की तुलना में खाड़ी देशों का प्रभाव अधिक दिखाई दे रहा है. उनके अनुसार, खाड़ी देशों की सबसे बड़ी प्राथमिकता क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है, इसलिए वे किसी भी बड़े सैन्य टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं.
दुनिया के किन देशों में हैं अमेरिकी मिलिट्री बेस?
दुनिया में विदेशी सैन्य ठिकानों (Overseas Military Bases) के मामले में अमेरिका पहले स्थान पर है. अमेरिका के सैकड़ों सैन्य अड्डे दुनिया के 100 से अधिक देशों और क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जिनका उद्देश्य वैश्विक सैन्य उपस्थिति बनाए रखना और रणनीतिक हितों की रक्षा करना है. अमेरिका के प्रमुख विदेशी सैन्य अड्डे जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, कतर, बहरीन, कुवैत, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों में स्थित हैं.
मध्य पूर्व में कतर का अल उदैद एयर बेस और बहरीन में अमेरिकी नौसेना का फिफ्थ फ्लीट मुख्यालय सबसे अहम ठिकानों में शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने दशकों से अपने सहयोगी देशों में सैन्य अड्डों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया है, जिससे वह किसी भी क्षेत्रीय संकट या युद्ध की स्थिति में तेजी से सैन्य कार्रवाई कर सकता है.
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