मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष लगातार हमलावार है. इसी बीच पूर्व IAS अधिकारियों और एक्टिविस्ट्स के एक ग्रुप ने CEC को पद से हटाने के लिए ‘पीपुल्स महाभियोग’ नोटिस जारी किया और उनके खिलाफ आरोपों की एक चार्जशीट दायर करने का प्लान बनाया, लेकिन वो पहले ही फेल हो गया. 15 लोगों के इस ग्रुप में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी के पिल्लई, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग और कार्यकर्ता योगेंद्र यादव शामिल थे, जिन्हें चुनाव आयोग के कार्यालय में घुसने ही नहीं दिया गया.
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क्या आरोप लगाए?
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लाए गए चार पेज के नोटिस में उन पर चुनाव आयोग की सामूहिक कार्यप्रणाली को कमजोर करने, वैधानिक फॉर्म 6 में बदलाव को मंजूरी देना, ECINET के जरिए मतदाता-सूची प्रशासन को सेंट्रलाइज करने, SIR के जरिए बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने, राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता करने और बार-बार वैधानिक कर्तव्यों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है. इसमें आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के भीतर जरूरी चर्चा, परामर्श या रिकॉर्ड की गई कार्यवाही के बिना SIR से जुड़े अहम फैसले लिए गए थे. इसमें बाकी चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना लिए गए फैसलों पर आपत्तियों की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है.
‘ये संविधान का उल्लंघन है’
अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने कहा कि अधिकारियों को ये पता होने के बावजूद कि पूर्व सिविल सेवकों वाला एक प्रतिनिधिमंडल दौरा करेगा, चुनाव निकाय मुख्यालय की ओर जाने वाली सभी सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए गए. उन्होंने प्रतिबंधों को कानून और संविधान का उल्लंघन बताया. एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, नजीब जंग ने कहा कि पूर्व सिविल सेवकों ने अपने पूरे करियर में संविधान को बनाए रखने की शपथ ली थी, लेकिन अब इसे कमजोर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि वो सरकार के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन CEC का आचरण और SIR के दौरान लोगों को वोटिंग के अधिकार से वंचित करना कतई मंजूर नहीं है.