Arif Khan
आरिफ खान मंसूरी को डिजिटल मीडिया में करीब 15 वर्षों का अनुभव है . वर्तमान में न्यूज24 की डिजिटल विंग में कार्यरत हैं. इससे पहले देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.
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चार दशकों के बाद कनाडा ने आखिरकार वह कड़वा सच स्वीकार कर लिया है जिसे भारत पहले दिन से कहता आ रहा था. कनाडा की मुख्य खुफिया एजेंसी ‘कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा’ (CSIS) ने पहली बार आधिकारिक और सार्वजनिक तौर पर माना है कि 1985 में एयर इंडिया के विमान ‘एमपरर कनिष्क’ (फ्लाइट 182) को बम से उड़ाने के पीछे कनाडा में मौजूद खालिस्तानी आतंकवादी थे.
कनाडा के इस कबूलनामे को भारत के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि अब तक ओटावा इस आतंकी हमले के लिए खालिस्तान का नाम लेने से बचता रहा था.
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बुधवार को इस त्रासदी की बरसी पर एक फेसबुक पोस्ट के जरिए CSIS ने सीधे तौर पर अलगाववादी आंदोलन को इस हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया. एजेंसी ने लिखा, ’23 जून 1985 को कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा लगाए गए बम ने विमान को नष्ट कर दिया था, जिससे बोर्ड पर सवार सभी लोग मारे गए थे. यह कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला है.’
23 जून 1985 को टोरंटो से मुंबई आ रहा एयर इंडिया का बोइंग 747 विमान अटलांटिक महासागर के ऊपर ब्लास्ट के बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें 329 लोग मारे गए थे. 9/11 के हमले से पहले यह दुनिया का सबसे बड़ा विमानन आतंकी हमला था. इसे प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘बब्बर खालसा’ के आतंकियों ने अंजाम दिया था.
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इस बड़े खुलासे के बाद सवाल उठ रहा है कि कनाडा को यह सच स्वीकार करने में चार दशक क्यों लग गए? साल 2010 की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा की खुफिया एजेंसी CSIS और पुलिस के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी थी. CSIS ने बब्बर खालसा के सरगना तलविंदर सिंह परमार के सैकड़ों घंटों की वायरटैप रिकॉर्डिंग्स को नष्ट कर दिया था, जो इस मामले का सबसे अहम सबूत थे.
मरने वाले 329 लोगों में से 268 कनाडाई नागरिक थे, लेकिन इसके बावजूद तत्कालीन कनाडाई राजनेताओं और जनता ने इसे एक ‘भारतीय समस्या’ मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया था. दशकों तक चले मुकदमों के दौरान मुख्य गवाहों की टारगेट किलिंग की गई और गवाहों को डराया-धमकाया गया, जिसके कारण 2005 में मुख्य आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो गए.
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पंजाब में 1970 और 80 के दशक में उभरा खालिस्तान आंदोलन भारत में बहुत पहले ही खत्म हो चुका है, लेकिन इसके कई चेहरे कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में शरण लेकर भारत के खिलाफ एजेंडा चलाते रहे हैं. कनाडा में इन्हें ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ के नाम पर लगातार राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण मिलता रहा.
पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान भारत-कनाडा के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे, खासकर जब ट्रूडो ने कनाडाई धरती पर खालिस्तानी एक्टिविस्ट हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ पर लगाया था.
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