---विज्ञापन---

उत्तराखंड के 23 ग्लेशियर को खतरा, नेपाल की बाढ़ के बाद मंडराया खौफ, नई रिसर्च में खुलासा

हिमालय में मौजूद बर्फ भारत के लिए पानी के बड़े सोर्स हैं, लेकिन उत्तराखंड में जिस रफ्तार से ग्लेशियरों के पिघलने का सिलसिला जारी है, वो बड़े खतरे की तरफ इशारा करता है. नेपाल में आए फ्लैश फ्लड के बाद स्थिति और चिंताजनक हो गई है.

---विज्ञापन---

Uttarakhand Glaciers Melting Rapidly: उत्तराखंड के 23 ग्लेशियरों पर हुई एक स्टडी में हिमालय के कई ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की बात सामने आई है. इससे पानी की सुरक्षा और मौसम से जुड़ी आपदाओं के बढ़ते खतरे को लेकर चिंता बढ़ गई है. ये नतीजे नेपाल में हुई एक जानलेवा आपदा के कुछ दिनों बाद आए हैं, जिसने हिमालयन कम्यूनिटी के खतरे में होने की तरफ फिर से ध्यान खींचा है.

कई बड़े ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के रिसर्चर्स ने 23 ग्लेशियरों के पुराने रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि उनके पीछे हटने की रफ्तार में काफी अंतर है. ‘डिस्कवर जियोसाइंस’ में छपी इस स्टडी में कहा गया है कि पिघलने की प्रक्रिया पर सिर्फ बढ़ता तापमान ही नहीं, बल्कि ग्लेशियर की ढलान, आकार और मलबे की परत जैसे फैक्टर्स भी असर डालते हैं.

---विज्ञापन---

मिसाल के तौर पर पिंडारी ग्लेशियर 1845 और 1966 के बीच हर साल औसतन 23.4 मीटर पीछे हटा. 2000-2018 के दौरान इसके पीछे हटने की रफ्तार बढ़कर 45.85 मीटर पर ईयर हो गई. मिलम ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार 32 से 37.8 मीटर पर ईयर के बीच रही है, जबकि खतलिंग ग्लेशियर हर साल तकरीबन 88 मीटर पीछे हट रहा है.

यह भी पढ़ें- हिमालय के पिघलते ग्लेशियर क्यों है भारत की इकॉनमी के लिए खतरा? जानिए कैसे बच सकते हैं हम

---विज्ञापन---

गंगोत्री ग्लेशियर के पीछे हटने की रफ्तार लंबे समय तक हर साल लगभग 22 मीटर रही. रिसर्च में जिन दूसरे ग्लेशियरों का जिक्र किया गया है, उनमें सतोपंथ, रमानी, नॉर्थ नंदा देवी, डोकियानी और बंदरपूंछ शामिल हैं. रिसर्चर्स ने पाया कि साफ बर्फ वाले ग्लेशियर आम तौर पर मलबे से ढके ग्लेशियरों की तुलना में तेजी से पीछे हटते हैं.

हिमालयन ग्लेशियरों का पिघलना क्यों खतरनाक है?

उत्तराखंड के ग्लेशियर बड़ी नदी प्रणालियों को पानी देते हैं और पीने, खेती और पनबिजली के लिए जरूरी पानी उपलब्ध कराते हैं. हिमालयी क्षेत्र गंगा, यमुना, अलकनंदा, भागीरथी, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों का स्रोत है. साइंटिस्ट्स ने ये भी चेतावनी दी है कि बर्फ के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़, हिमस्खलन और अचानक मलबे के बहाव की संभावना बढ़ सकती है.

---विज्ञापन---

क्लाइमेंट चेंज है वजह

स्टडी में बढ़ते तापमान, सर्दियों में कम बर्फबारी और लंबी गर्मियों को तेजी से पीछे हटने वाले ग्लेशियरों के पीछे अहम वजह बताया गया है. अब उन ऊंचाइयों पर भी बारिश देखी जा रही है जहां पहले बर्फबारी आम बात थी, जबकि बर्फ कम जमा होने से ग्लेशियरों के पास सालाना नुकसान की भरपाई के लिए कम ताजी बर्फ बचती है.

बड़े नुकसान की आशंका

हिमालयन ग्लेशियर कुदरती भंडार की तरह काम करते हैं, जो पानी को बर्फ के रूप में जमा करते हैं और धीरे-धीरे छोड़ते हैं. उनके लगातार पीछे हटने से शुरू में कुछ इलाकों में पानी की अवेलेबिलिटी बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय तक बर्फ के नुकसान से आखिरकार भरोसेमंद पानी की सप्लाई कम हो सकती है और नीचे की ओर रहने वाले लोगों के लिए खतरे बढ़ सकते हैं.

---विज्ञापन---

First published on: Sep 20, 2026 05:11 PM

End of Article

About the Author

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.

Read More
---विज्ञापन---
संबंधित खबरें
Sponsored Links by Taboola