---विज्ञापन---

हिमालय के पिघलते ग्लेशियर क्यों है भारत की इकॉनमी के लिए खतरा? जानिए कैसे बच सकते हैं हम

पिछले कुछ दशकों में ग्लोबल वॉर्मिंग और एवरेज एनुअल टेंपरेचर का असर हिमालय पर भी पड़ रहा है, ये वो पर्वत श्रृंखला है जहां से भारत की बेहद अहम नदियां निकली हैं, और यहां के लोगों को जिंदगी जीने का जरिया देती हैं. लेकिन यहां के ग्लेशियर न सिर्फ हमारी जिंदगी बल्कि देश की इकॉनमी के लिए भी बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं.

---विज्ञापन---

Himalayan Glaciers And Indian Economy: हिमालय सिर्फ पहाड़ों की एक सीरीज नहीं है, बल्कि भारत के लिए इकॉनमिक और वाटर रिसोर्सेज का एक अहम सोर्स भी है. हाल ही की एक रिपोर्ट, ‘ए रेजिलिएंट हिमालय: प्रोटेक्टिंग ए रीजन एट रिस्क एंड सिक्योरिंग फ्यूचर प्रॉस्पेरिटी’ का अनुमान है कि 64.8 लाख करोड़ रुपये के बराबर आर्थिक गतिविधि हिमालय से जुड़े संसाधनों, खासकर पानी पर निर्भर करती है. ये भारत के फाइनेंशियल ईयर 2024 की जीडीपी का 21.5 फीसदी हिस्सा है. इस आंकड़े का मतलब ये नहीं है कि ग्लेशियर खत्म होने से सीधे तौर पर GDP का 21.5% हिस्सा खत्म हो जाएगा; बल्कि ये हिमालयन रीजन और उसकी नदियों से जुड़ी आर्थिक एक्टिविटीज को नापता है.

ग्लेशियर का पिघलना क्यों मायने रखता है?

हिमालयन ग्लेशियर कुदरती जल भंडार के तौर पर काम करते हैं, जो पानी को बर्फ के रूप में जमा करते हैं और नदियों में छोड़ते हैं. ये नदियां खेती, इंडस्ट्री, शहरों और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स को सहारा देती हैं. सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र रिवर सिस्टम उन अहम नदियों के नेटवर्कों में शामिल हैं जो हिमालयी क्रायोस्फीयर में बदलाव से अफेक्ट होते हैं.

---विज्ञापन---

यह भी पढ़ें- दुनिया के ‘5 किलर माउंटेन’, जहां बर्फ में दफन हैं मौत के सैकड़ों राज! इंसान भी बन जाता है पत्थर

फिक्र की बात ये है कि तेजी से पिघलने का ये प्रॉसेस हमेशा नहीं चल सकता. साइंटिस्ट्स ‘पीक वॉटर’ शब्द का इस्तेमाल उस प्वॉइंट के लिए करते हैं जब ग्लेशियर से मिलने वाले पानी की अवेलेबिलिटी अपने मैक्सिमम लेवल पर पहुंच जाती है और फिर आइस रिजर्व्स कम होने के साथ घटने लगती है. ICIMOD का अनुमान है कि हिंदू कुश हिमालय के ज्यादातर हिस्सों में पानी की अवेलेबिलिटी सदी के मध्य तक अपने पीक पर होगी और उसके बाद कम हो जाएगी. मौजूदा कार्बन इमिशन को देखते हुए ये रीजन 2100 तक अपने मौजूदा ग्लेशियर वॉल्यूम का 80% तक खो सकता है, जिससे निचले इलाकों में पानी की सप्लाई और वहां रहने वाले लोगों के लिए रिस्क बढ़ जाएगा.

---विज्ञापन---

ब्लैक कार्बन की समस्या

रिपोर्ट में ब्लैक कार्बन या अधूरे कंबशन से निकलने वाले कालिख को ग्लेशियर के पिघलने की स्पीड बढ़ाने वाले एक अहम फैक्टर के तौर पर पहचाना गया है. इसका अनुमान है कि हिमालयन ग्लेशियर के पिघलने का तकरीबन एक-तिहाई हिस्सा ब्लैक कार्बन से जुड़ा है, जो इसे एक ऐसा एरिया बनाता है जहां रीजनल एक्शन का सीधा असर हो सकता है. ईंट भट्टों से होने वाले इमिशन को कम करने के साथ-साथ खाना पकाने के लिए साफ ईंधन, ट्रांस्पोर्ट और पराली जलाने पर कंट्रोल करने से ब्लैक कार्बन पॉल्यूशन को कम करने में मदद मिल सकती है.

अब क्या किया जा सकता है?

इस चुनौती से निपटने के लिए जलवायु परिवर्तन को कम करने (Mitigation) और उसके हिसाब से ढलने (Adaptation) दोनों की जरूरत है. भारत ग्लेशियर और नदी की मॉनिटरिंग को मजबूत कर सकता है, अर्ली वार्निंग सिस्टम का विस्तार कर सकता है, वाटर मैनेजमेंट में सुधार कर सकता है और बुनियादी ढांचे को बाढ़ और भूस्खलन के प्रति ज्यादा मजबूत बना सकता है.

---विज्ञापन---

साथ ही ब्लैक कार्बन इमिशन को कम करना लोकल लेवल पर कंट्रोल करने का एक जरूरी उपाय है, जबकि ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने की कोशिशें जारी हैं. इसलिए हिमालय की हिफाजत का असर न सिर्फ पहाड़ी लोगों पर, बल्कि भारत की खाना, पानी, एनर्जी और आर्थिक सुरक्षा पर भी पड़ता है.

First published on: Sep 18, 2026 11:33 PM

End of Article

About the Author

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.

Read More
---विज्ञापन---
संबंधित खबरें
Sponsored Links by Taboola