महाराष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर अब कश्मीर की घाटी में नई पहचान बना रही है। साल 1893 में पुणे से शुरू हुआ सार्वजनिक गणेशोत्सव लगातार तीसरे साल कश्मीर में आयोजित होने जा रहा है। इस बार 27 अगस्त से पांच दिनों तक श्रीनगर, अनंतनाग और कुलगाम में गणेशोत्सव का भव्य आयोजन होगा। शनिवार को पुणे के श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल में विशेष समारोह हुआ, जहां ढोल-ताशों और गणपति बप्पा मोरया के जयघोष के बीच तीन प्रमुख गणेश प्रतिमाओं की प्रतिकृतियां कश्मीरी प्रतिनिधियों को सौंपी गईं। इनमें केसरीवाडा गणपति, अखिल मंडई मंडल का शारदा गजानन और रंगारी गणपति शामिल हैं।
35 साल बाद भावुक क्षण
दक्षिण कश्मीर वेसू वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष सनी रैना ने इस अवसर पर कहा कि 90 के दशक की परिस्थितियों ने हमें अपना घर छोड़ने पर मजबूर किया था। 35 साल बाद फिर से बप्पा का स्वागत कर पाना हमारे लिए बेहद भावुक और खास पल है। भगवान की कृपा से हम इसे पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाएंगे।
दुनिया के 75 देशों में मनाया जाता है उत्सव
उत्सव संयोजक और रंगारी गणपति मंडल के ट्रस्टी पुनीत बालन ने इस पहल को सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि गणेशोत्सव आज सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के 75 देशों में मनाया जाता है। ऐसे में कश्मीर में इसे मनाना बिल्कुल स्वाभाविक है। मेरे कश्मीरी मित्रों ने बताया कि तीन दशकों बाद यहाँ फिर से यह उत्सव संभव हुआ है। यही हमें इसे और आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने आगे कहा कि आज घाटी का माहौल बदल चुका है। जहां कभी हालात कठिन थे, वहीं अब लोग देर रात तक कीर्तन, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद ले रहे हैं। आने वाले समय में योजना है कि इस उत्सव को घाटी के और जिलों तक पहुंचाया जाए।
पुणे के सात मंडलों का सहयोग
इस पहल में पुणे के सात प्रतिष्ठित मंडल- श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति, कसाबा गणपति, अखिल मंडई मंडल, तांबडी जोगेश्वरी, केसरीवाडा, गुरुजी तालीम और तुलसीबाग ने सहभागिता की है। आयोजकों के अनुसार, गणेशोत्सव के दौरान घाटी में भजन, भक्ति गीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की गूंज सुनाई देगी।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किया गया सार्वजनिक गणेशोत्सव आज सिर्फ महाराष्ट्र की परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक सौहार्द का प्तक बन चुका है। कश्मीर में इसकी मौजूदगी इसी संदेश को और आगे बढ़ा रही है।