Ankush jaiswal
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मायानगरी मुंबई की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रहे नगरसेवकों के लिए चुनाव जीतना ही आखिरी जंग साबित नहीं हुआ. ढोल-नगाड़ों और जश्न के बीच असली लड़ाई अब अदालत के कमरों में लड़ी जा रही है. मुंबई महानगरपालिका के कुल 227 निर्वाचित पार्षदों में से 79 नगरसेवकों की कुर्सी पर कानूनी तलवार लटक गई है. मामला फर्जी जाति प्रमाण पत्र, हलफनामे में झूठी जानकारी, संपत्ति छिपाने और आपराधिक मुकदमों की जानकारी दबाने से जुड़ा है.
हालत यह है कि कोर्ट के चक्कर काटते-काटते अब तक 5 नगरसेवकों का निर्वाचन रद्द भी किया जा चुका है, जिससे बाकी 74 पार्षदों की धड़कनें तेज हो गई हैं.
प्रसिद्ध आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में बीएमसी प्रशासन ने इस बात की पुष्टि की है कि चुनाव नतीजों के बाद से अब तक कुल 79 चुनाव याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं.
जनवरी 2026 में बीएमसी चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे. लेकिन नतीजों के बाद मैदान में पिछड़े उम्मीदवारों ने जीतने वाले पार्षदों की पोल खोलने के लिए सीधे बॉम्बे हाईकोर्ट और संबंधित अदालतों का रुख किया. याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि उम्मीदवारों ने चुनाव आयोग को जो शपथपत्र सौंपे थे, उनमें जानकारी सही नहीं थी.
इस कानूनी पचड़े की खास बात यह है कि इसमें किसी एक दल के नहीं, बल्कि मुंबई की राजनीति के लगभग हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल के पार्षद फंसे हुए हैं.
शिवसेना (UBT): सबसे ज्यादा 24 नगरसेवक कानूनी घेरे में.
भारतीय जनता पार्टी (BJP): 16 नगरसेवकों पर कानूनी तलवार.
कांग्रेस: 10 नगरसेवकों का निर्वाचन कटघरे में.
शिवसेना (शिंदे गुट): 7 नगरसेवकों पर याचिका.
AIMIM: 5 नगरसेवकों पर मामला.
MNS (मनसे): 2 नगरसेवक फंसे.
NCP (राष्ट्रवादी): 1 नगरसेवक पर केस.
अदालत में चल रही इन सुनवाइयों के बीच फैसला आना भी शुरू हो गया है. 79 मामलों में से अब तक 5 नगरसेवकों का चुनाव रद्द घोषित किया जा चुका है:
शिवसेना UBT: 2 नगरसेवक
AIMIM: 2 नगरसेवक
राष्ट्रवादी कांग्रेस: 1 नगरसेवक
पूर्व महापौर विशाखा राऊत का नगरसेवक पद रद्द होने के बाद से यह मुद्दा मुंबई के सियासी गलियारों में बेहद गरमा गया है.
कानूनी जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे बाकी मामलों पर कोर्ट के फैसले आएंगे, वैसे-वैसे बीएमसी के भीतर दलों के संख्याबल में भारी उलटफेर हो सकता है. अगर आने वाले दिनों में कुछ और नगरसेवकों की कुर्सी जाती है, तो इसका सीधा असर बीएमसी के बड़े पदों, समितियों के चुनाव और पार्टी के प्रभुत्व पर पड़ेगा.
बात साफ है, चुनाव की बाजी भले ही EVM से जीती जा चुकी हो, लेकिन हलफनामे और कागजों की इस कानूनी परीक्षा में जो फेल होगा, उसे अपनी कुर्सी गंवानी ही पड़ेगी!
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