BJP’s Historic Bengal Win: पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की 204 सीटों वाली ऐतिहासिक जीत महज एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि एक लंबी रणनीति और अथक परिश्रम की परिणति है। ममता बनर्जी के किले को भेदने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अगुवाई में पांच केंद्रीय नेताओं ने जमीनी स्तर पर जो रणनीति बुनी, उसने टीएमसी की जड़ों को हिला दिया। शाह ने खुद बंगाल में डेरा डाल दिया और संगठन की हर सांस पर डेढ़ साल तक लगातार नजर रखी। आइए जानते हैं, इन छह रणनीतिकारों की भूमिका और योगदान को विस्तार से।
शाह की चाणक्य नीति
अमित शाह ने चुनाव से पहले पूरे 14 दिन तक बंगाल में पड़ाव डाला। दिन में वह 50 से अधिक रैलियां और रोड शो करते थे, तो रात देर तक संगठन की बैठकों में नेताओं को मार्गदर्शन देते थे। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग को लागू करने और बदमाशों-घुसपैठियों पर कड़ी कार्रवाई का बड़ा वादा किया। पहले चरण के मतदान के बाद ही उन्होंने ऐलान कर दिया था कि भाजपा ने 110 से अधिक सीटों पर बढ़त बना ली है। इस बयान ने दूसरे चरण के लिए माहौल पूरी तरह भाजपा के पक्ष में कर दिया।
धर्मेंद्र प्रधान: मुख्य रणनीतिकार
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पूरे चुनाव अभियान के प्रमुख रणनीतिकार रहे। उनका काम समाज के विभिन्न तबकों और समुदायों के बीच तालमेल बिठाना था। प्रधान ने केंद्रीय नेतृत्व और राज्य इकाई के बीच एक मजबूत सेतु का काम किया। उन्होंने संसाधनों का कुशल प्रबंधन करते हुए हर बड़े नेता की यात्रा और कार्यक्रम को सुचारू बनाए रखा।
भूपेंद्र यादव: संगठन के कारीगर
संगठन चुनाव की असली ‘मेरुदंड’ यानी रीढ़ की हड्डी होती है है और भूपेंद्र यादव ने इसी मेरुदंड को मजबूती दी। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को गोलबंद करने से लेकर चुनावी प्रक्रिया की कानूनी पेचीदगियों को सुलझाने तक का जिम्मा उनके पास था। बिहार और अन्य राज्यों में कई चुनाव प्रबंधन का उनका गहरा अनुभव बंगाल की चुनौतीपूर्ण जमीन पर बेहद कारगर साबित हुआ। उनकी ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की क्षमता ने जमीनी स्तर पर पार्टी की ताकत को कई गुना बढ़ा दिया।
सुनील बंसल: पन्ना प्रमुख के सेनापति
उत्तर प्रदेश में भाजपा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाले राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल ने बंगाल में पन्ना प्रमुखों की शक्तिशाली सेना खड़ी की। उनका पूरा ध्यान भाजपा के लिए एक ऐसा अनुशासित संगठनात्मक ढांचा तैयार करने पर था, जो टीएमसी की कैडर आधारित व्यवस्था को कड़ी टक्कर दे सके। ग्रास-रूट स्तर पर तैयार किए गए ये पन्ना प्रमुख हर मतदाता तक पार्टी का संदेश पहुंचाने की गारंटी बने।
बिप्लब देब: आक्रामक चुनाव प्रचारक
त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने अपने राज्य में वामपंथ को हराने का सीधा अनुभव हासिल किया था। बंगाल में उन्होंने खासकर उन क्षेत्रों पर फोकस किया जहां की भाषा और संस्कृति त्रिपुरा से मिलती-जुलती है। देब ने स्थानीय कार्यकर्ताओं में जोश भरा और अभियान को एक आक्रामक अंदाज दिया। उनकी शैली ने पार्टी कार्यकर्ताओं को टीएमसी को सीधी चुनौती देने का आत्मविश्वास दिया।
अमित मालवीय: डिजिटल मोर्चे के सेनापति
आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने डिजिटल मोर्चे पर घटनाओं, सभाओं और जन-समस्याओं की जंग को निर्णायक अंजाम तक पहुंचाया। संदेशखाली कांड से लेकर आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले तक, उनकी टीम ने सोशल मीडिया पर हर संवेदनशील घटनाक्रम को जनता तक गहराई और सावधानी से पहुंचाया। इसने टीएमसी सरकार के खिलाफ जबरदस्त असहमति का माहौल बनाया। मालवीय ने टीएमसी के प्रचार तंत्र को डिजिटल माध्यमों से मुंहतोड़ जवाब दिया।
इन पांच केंद्रीय नेताओं और अमित शाह की सामूहिक रणनीति ने ही बंगाल जैसे दुर्गम किले में भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया। बूथ से लेकर सोशल मीडिया तक हर मोर्चे पर चली इस जंग ने टीएमसी के हर दांव को नाकाम कर दिया।