Rishabh Sharma
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घड़ियां टिक-टिक कर रही हैं. कुछ ही घंटों बाद स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स की रणभेरी बज उठेगी. एक खेल प्रेमी या पत्रकार के तौर पर जब मैं इस आयोजन की तरफ देखता हूं, तो मेरे मन में सबसे पहला ख्याल बर्मिंघम 2022 का आता है. पिछली बार भारत ने वहां 61 मेडल जीते थे. कायदे से तो होना यह चाहिए था कि हम इस बार और आगे बढ़ते. हमारे एथलीट्स 70 या 75 मेडल्स का वो जादुई आंकड़ा छूते. खासतौर पर यह बात जानते हुए कि भारत को अगले 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करनी है, यह हमारे पास अपनी ताकत दिखाने का एक बहुत बड़ा मौका था, लेकिन सच्चाई ये है कि इस बार कहानी में बड़ा ट्विस्ट दिखेगा.
देखा जाए तो 2026 ग्लासगो गेम्स का यह मंच हमारे लिए अपने घर में होने वाले उस महाकुंभ की एक परफेक्ट ‘ड्रेस रिहर्सल’ था. हम दुनिया को यह बताने के लिए उतरने वाले थे कि जब आप हमारे घर भारत आएंगे, तो 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स में हम सिर्फ एक शानदार और सत्कार करने वाले मेजबान ही नहीं होंगे, बल्कि मेडल टैली में भी हमारी दावेदारी एक महाशक्ति जैसी होगी. लेकिन बदकिस्मती से इस बार मौके कम है और चुनौतियां पहाड़ जैसी है.
दरअसल गेम्स शुरू होने से पहले ही भारतीय उम्मीदों के सबसे बड़े हथियार हमसे छिन गए हैं. जिसका खामियाज़ा हमें करीब 30 मेडल्स के सीधे नुकसान से उठाना पड़ेगा. जब आप उन खेलों की लिस्ट देखते है जिन्हें इस बार गेम्स से हटा दिया गया है, तो एक भारतीय के तौर पर दिल बैठ सा जाता है. कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हॉकी और क्रिकेट जैसे खेल इस बार आयोजन का हिस्सा ही नहीं है. शूटिंग और स्क्वैश तो पहले ही बाहर किए जा चुके थे.
Team India is all set for Glasgow 2026! 🇮🇳💪
— SAI Media (@Media_SAI) July 22, 2026
🏅 126 Athletes
🎯 13 Disciplines
🏆 113 Events
Our champions are ready to give their all, carry the Tricolour with pride, and make every moment count on the Commonwealth stage.
Let's cheer every effort, every challenge, and every… pic.twitter.com/isPN0vxxau
अब ग्लास्गो गेम्स के आगाज़ से पहले ही जरा सोचिए और गणित लगाइए. कुश्ती ने हमें पिछली बार 12 मेडल दिए थे. टेबल टेनिस ने 7 और बैडमिंटन ने 6 मेडल हमारी झोली में डाले थे. हॉकी और क्रिकेट से भी 3 मेडल आए थे. इन खेलों के न होने का सीधा सा मतलब है कि बिना एक भी मुकाबला खेले, हमने पहले ही अपने करीब 30 मेडल गंवा दिए है. जब जापान ओपन जीतकर शानदार फॉर्म में चल रही पीवी सिंधु का आग उगलता रैकेट, बजरंग पुनिया का अजेय दांव, लक्ष्य सेन की चीते जैसी फुर्ती और हमारी करिश्माई हॉकी टीम की वो जादुई स्टिक इस बार मैदान में नहीं दिखेगी, तो गेम्स में कैसा रोमांच दिखेगा ? हैरानी नहीं कि कई जानकार पहले ही ऐसा मान रहे हैं कि यह ऐसा झटका है जिसने हमारी मेडल टैली की रीढ़ पहले ही तोड़ दी है.
Only one day to go! 🏅🇮🇳
— Team India (@WeAreTeamIndia) July 22, 2026
The countdown is almost over. Tomorrow, Team India begins its Commonwealth Games journey, carrying the hopes and best wishes of a nation. 💙
As our contingent gets ready, let’s stand behind every athlete, every effort, and every dream.
Drop a 🇮🇳 in the… pic.twitter.com/LTVI2UdkpM
अब अगर एक भारतीय फैन होने के नाते आपके जेहन में यह सवाल उठ रहा है कि अचानक गेम्स से ये खेल गायब कैसे हो गए, तो इसके पीछे की कहानी भी जान लीजिए. दरअसल, इस बार की कहानी थोड़ी अजीब और निराश करने वाली है. 2026 के खेलों की मेजबानी पहले ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया स्टेट को करनी थी. लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने बजट और भारी खर्च का हवाला देते हुए बैकआउट कर लिया. एक पल के लिए तो ऐसा लगा मानो 2026 साल के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का वजूद ही खत्म हो जाएगा.
ऐसे में ग्लासगो एक लास्ट मिनट बैकअप के तौर पर सामने आया. उसने गेम्स को बचा तो लिया लेकिन सिर्फ अपनी शर्तों पर. बजट बचाने के लिए खेलों पर बेरहमी से कैंची चला दी गई और सिर्फ 10 खेलों को ही हरी झंडी मिली. एथलेटिक्स, स्विमिंग, ट्रैक साइक्लिंग, वेटलिफ्टिंग, बॉक्सिंग, जूडो, आर्टिस्टिक जिमनास्टिक्स, नेटबॉल, लॉन बॉल्स और 3×3 बॉस्केटबॉल. यानी ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स का मैदान बस इन 10 खेलों में सिमट कर रह गया. जहां इस पूरे समझौते की सबसे भारी कीमत सीधे तौर पर मेडल्स के नज़रिए से भारतीय एथलीट्स को ही चुकानी पड़ रही है.
The XXIII #CommonwealthGames begins in #Glasgow, #Scotland from 23 July – 2 August 2026, bringing together the spirit of excellence, friendship, and fair play from across the Commonwealth.
— Dr. Narottam Sahoo (@narottamsahoo) July 22, 2026
Best wishes to 🇮🇳 Team India – 126 outstanding athletes, including 78 men and 48 women.… pic.twitter.com/QgI0ZKYlbz
कहते हैं कि जब उम्मीदों के आसमान में घने बादल छाते हैं, तो कुछ सितारे अपने आप तेज़ चमकने लगते हैं. इस बार भी कुछ ऐसे ही बड़े नामों से हमें ग्लास्गो गेम्स में करिश्मे की आस रहेगी. इस फेहरिस्त में ओलंपिक गोल्ड मेडेलिस्ट नीरज चोपड़ा भारत के लिए बड़े स्टार रहने वाले हैं. जब ट्रैक एंड फील्ड की बात आती है तो हर भारतीय की नजरें नीरज पर टिक जाती हैं. वैसे साल 2026 नीरज के लिए इंजरी के कमबैक के बाद से बहुत अच्छा नहीं रहा है.
फिटनेस की समस्याओं ने उन्हें काफी परेशान किया है. लेकिन हम जानते है कि यह चैंपियन दबाव में ही अपना सबसे बेहतरीन खेल दिखाता है. भारत को इस बार नीरज से बहुत ज्यादा उम्मीदें है. दूसरी तरफ कुश्ती के न होने पर अब मेडल लाने की बड़ी जिम्मेदारी वेटलिफ्टिंग में मीराबाई चानू की लोहे जैसी कलाइयों और बॉक्सिंग में लवलीना के मुक्कों पर आ गई है. इसके अलावा एथलेटिक्स में मुरली श्रीशंकर और पारुल चौधरी भी अपना दम दिखाने को बेताब हैं.
भले ही हालात हमारे खिलाफ है, किस्मत रूठी हुई है लेकिन भारत का 125 एथलीट्स का दल पूरे जोश के साथ स्कॉटलैंड में है. जब रात को ग्लास्गो गेम्स एरिना की दूधिया रोशनी में ओपनिंग सेरेमनी होगी तो पूरी दुनिया भारतीय दल को गर्व से तिरंगा थामे और सीना ताने मार्च पास्ट करते हुए देखेगा. ओलंपिक मेडलिस्ट और हमारी सबसे होनहार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू इस बार ध्वजवाहक के रूप में सबसे आगे तिरंगा थामेंगी. वही बॉक्सिंग रिंग की शेरनी लवलीना बोरगोहेन ‘किंग्स बैटन’ पकड़कर देश का नेतृत्व करेंगी. यह पल हर हिंदुस्तानी के लिए बेहद गर्व का होगा. हालांकि कुछ दिलों में अंदर ही अंदर एक खामोश टीस भी चुभेगी कि हमारी आधी फौज तो बिना लड़े ही घर पर छूट गई है.
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तार्किक रूप से देखा जाए तो एक दुखद तस्वीर सामने आती है. यह लगभग तय है कि इस बार मेडल टैली में हम काफी नीचे खिसक जाएंगे. शायद यह कॉमनवेल्थ गेम्स भारतीय फैंस के लिए एक ऐसा कड़वा अनुभव बने जिसे हम कभी याद नहीं रखना चाहेंगे. 2030 में दुनिया की मेजबानी करने से ठीक पहले अपनी मेडल रैंकिंग को गिरते हुए देखना किसी भी खेल प्रेमी का दिल तोड़ सकता है. हो सकता है कि 11 दिन बाद जब यह खेल खत्म हो, तो हमारे पास पिछली बार की तरह जश्न मनाने के लिए मेडल का वो भारी अंबार न हो. एक हताशा, एक खामोश मायूसी शायद हमारे चेहरों पर झलक जाए.
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लेकिन ‘सौ बात की एक बात’ ये है कि हम खाली हाथ लौट सकते है, मगर बिना लड़े हथियार नहीं डाल सकते. क्या हुआ अगर इस बार गेम्स में हमारे पास हमारे फेवरेट खेल नहीं हैं. क्या हुआ अगर मैदान हमारे हिसाब से नहीं बुना गया है. हमारे जो एथलीट्स वहां गए है वे उस अजनबी और सीमित मैदान में भी अपना खून-पसीना एक कर देंगे. कॉमनवेस्थ गेम्स इतिहास में यह हालात किसी आपदा से कम नहीं. लेकिन भारतीय तो आपदा को भी अवसर बनाना जानते हैं, अगर आपदा बड़ी है और झटके गहरे है तो क्या हुआ?
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हो सकता है कि यही वो पल हो जहां हमारे बचे हुए खिलाड़ी कोई नया अवसर बना लें. मेडल कम भले ही आएं लेकिन यह टूर्नामेंट हमें यह जरूर सिखा जाएगा कि जब किस्मत आपके खिलाफ खड़ी हो, तब भी मैदान में सीना तानकर कैसे लड़ा जाता है. उम्मीदें टूटी जरूर हैं, लेकिन हौसला अभी भी जिंदा है. भारत ने आखिरी बार 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी की थी और रिकॉर्ड 101 मेडल्स जीते थे. ऐसा मान सकते हैं कि भारत के लिए मिशन 2030 गेम्स का आगाज़ ग्लास्गो से ही होने जा रहा है. जहां बिना लड़े हार नहीं मानने का जज्बा ही हमें जीत दिलाएगा.
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