Rishabh Sharma
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खेल हो या असल ज़िंदगी आपने भी महसूस किया होगा कि जीत से बड़ा कोई टॉनिक नहीं होता. अगर भारतीय टीम श्रीलंका के खिलाफ इस टेस्ट सीरीज़ को 2-0 से जीत लेती, तो वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल की रेस में टीम के आत्मविश्वास को बड़ा बूस्ट मिलता. लेकिन कोलंबो टेस्ट मैच जहां जीत सौ फीसदी तय नज़र आ रही थी वो कुछ गलतियों की वजह से रेत की तरह मुट्ठी से फिसल गया. जब कोई जीती हुई बाज़ी ड्रॉ में तब्दील हो जाए तो वो कागज़ों पर ड्रॉ भले ही हो लेकिन सच्चे फैन के लिए करारी हार से कम नहीं है. मैं तो कहूंगा कि कोलंबो टेस्ट का नतीजा महज़ एक ड्रॉ नहीं, बल्कि टीम इंडिया की कमज़ोर होती मानसिकता का आइना है.
श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज़ का पहला मैच गॉल में भारत जीत चुका था. कोलंबो टेस्ट की पहली पारी में भी भारत ने 503 रन बनाकर 213 रनों की भारी बढ़त ली. लगा अब तो जीत महज़ एक औपचारिकता भर है. लेकिन फिर यहीं पर कप्तान शुभमन गिल और हेड कोच गौतम गंभीर ने श्रीलंका को फॉलोऑन थमा दिया. इसमें कोई शक नहीं कि श्रीलंका ने दूसरी पारी में अद्भुत खेल दिखाया और तय दिख रही हार को टाल दिया.
लेकिन फॉलोऑन को लेकर लिया गया फैसला सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भारत की रणनीति पूरी तरह से सामान्य हो गई थी. क्योंकि अगर भारतीय टीम खुद तीसरी पारी में बल्लेबाज़ी करती तो शायद वो तेज़ी से रन बनाकर 400 का सुरक्षित लक्ष्य दे सकती थी. चौथी पारी में पिच टूटती है और हालात मुश्किल हो जाते हैं. लेकिन फॉलोऑन के बाद भी टीम इंडिया की तरफ से वो अटैकिंग अप्रोच बिल्कुल नज़र नहीं आई जो मैच खत्म करने के लिए ज़रूरी था.
India in SL Test Series
— 𝑺𝒉𝒆𝒃𝒂𝒔 (@Shebas_10dulkar) August 27, 2026
1985 – Srilanka Won (1-0)
1993 – India Won (1-0)
1997 – Drawn (0-0)
2001 – Srilanka Won (2-1)
2008 – Srilanka Won (2-1)
2010 – Drawn (1-1)
2015 – India Won (2-1)
2017 – India Won (3-0)
2026 – India Won (1-0)* pic.twitter.com/plNtoNa4iy
शुभमन गिल एक बेहद शानदार क्रिकेटर हैं और मोहम्मद अज़हरुद्दीन और विराट कोहली के बाद श्रीलंका में टेस्ट सीरीज़ जीतने वाले तीसरे भारतीय कप्तान बन गए हैं. लेकिन एक खेल पत्रकार या फैन की नज़र से कहूं तो दूसरे सेशन के बाद कप्तान शुभमन गिल की बॉडी लैंग्वेज में वो ‘एग्रेशन’ बिल्कुल नहीं दिखा जो हम विराट कोहली और रोहित शर्मा में देखते थे.
जब विकेट नहीं मिल रहे थे तो लगा कि कप्तान सिर्फ बल्लेबाज़ की गलती का इंतज़ार कर रहे हैं. खासकर जब रवींद्र जडेजा गेंदबाज़ी कर रहे थे और सामने लोअर ऑर्डर के बल्लेबाज़ थे. माना कि एक छोर पर सोनल दिनुषा जैसा गोल्डन फॉर्म में दिख रहा बल्लेबाज़ खेल रहा था. लेकिन उनके अलावा दूसरे खिलाड़ियों के लिए तो स्लिप या गली का ना होना हर क्रिकेटिंग लॉजिक के खिलाफ ही कहा जाएगा.
Sri Lanka’s resilience with the bat ensures that only three wickets fall on the final day. The two teams shake hands after a hard-fought Test, which ends in a draw.#TeamIndia win the series 1-0.
— BCCI (@BCCI) August 27, 2026
Details – https://t.co/Uh4Xgn8rB5 pic.twitter.com/spxoqmBzct
गौतम गंभीर ने बतौर कोच भारत को वन-डे और टी20 फॉर्मेट में बड़ी-बड़ी ट्रॉफी जिताई हैं. फिर भी टेस्ट में उनका करियर एक लाचार कोच जैसा ही साबित हुआ है. यही वजह थी कि श्रीलंका टेस्ट सीरीज़ को गंभीर के लिए किसी लिटमस टेस्ट की तरह माना जा रहा था. जब भी गौतम गंभीर से टेस्ट फॉर्मेट में टीम के ढीले प्रदर्शन पर सवाल पूछे गए तो उन्होंने इशारों-इशारों में एक अलग ही ढाल का इस्तेमाल किया.
उन्होंने ऐसा दिखाया कि टीम इंडिया आजकल विराट कोहली, रोहित शर्मा और रविचंद्रन अश्विन जैसे दिग्गज सीनियर खिलाड़ियों की रुख्सती और ‘बदलाव के दौर’ से पार पाने की कोशिश में है. यह सच है कि टीम में कई नए चेहरे हैं लेकिन अगर सौ फीसदी तय दिख रही जीत इस कदर ड्रॉ हो जाए तो वहां मायूसी होनी चाहिए. बदलाव के दौर का मतलब यह नहीं होता कि टीम अपनी जीत की भूख ही भूल जाए. इन युवा खिलाड़ियों को मौका देने का फैसला भी आपका ही है. शायद अब गंभीर को भी ये समझना होगा कि टीम का माइंडसेट और भी कमज़ोर होता दिख रहा है.
A victory in the first Test at Galle and a closely contested second Test ending in a draw at Colombo.
— BCCI (@BCCI) August 27, 2026
India win the Series 1–0. #SLvIND pic.twitter.com/SjCwxmZtIS
एक फैन के लिए सबसे ज़्यादा तकलीफदेह तब होता है जब खिलाड़ियों को हाथ से फिसलती जीत का कोई मलाल तक ना हो. कोलंबो में श्रीलंका की पारी के दौरान टीम इंडिया के तथाकथित कई युवा खिलाड़ियों में टेस्ट ना जीत पाने का दुख बिल्कुल नज़र नहीं आया. जब श्रीलंकाई बल्लेबाज़ भारत की जीत की उम्मीदें तोड़ रहे थे तब हमारे कुछ खिलाड़ियों के चेहरों पर बेफिक्र मुस्कान थी. वो श्रीलंकाई बल्लेबाज़ों के लिए मज़ाक के अल्फ़ाज़ भी इस्तेमाल कर रहे थे.
चैंपियन टीमें जब हार की कगार पर होती हैं, तो उनके चेहरों पर लड़ने का जज़्बा दिखता है बेफिक्री या मज़ाक नहीं. ऐसा लग रहा था कि टीम ने सीरीज़ की जीत से संतोष कर लिया लेकिन 2-0 की भूख शायद कभी थी ही नहीं. सीरीज़ के नतीजे के बाद आखिरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कप्तान गिल का ये कहना कि ‘हम कुछ नहीं कर सकते थे… हमने अपना बेस्ट दिया लेकिन किस्मत उनके साथ थी.’ क्या एक चैंपियन टीम का माइंडसेट हो सकता है? चैंपियन टीमें रास्ते ढूंढती हैं किस्मत का रोना नहीं रोतीं. आने वाले दिनों में फिर से ‘ट्रांजिशन पीरियड’ वाला बहाना कभी ना कभी सुनाई दे जाएगा लेकिन सच ये है कि टीम ने बिना लड़े हथियार डाल दिए थे.
🚨 WTC POINTS TABLE 🏆
— Johns. (@CricCrazyJohns) August 27, 2026
– It's going to be a close battle, all the possibilities are alive. pic.twitter.com/NjlSZtSo4D
हम अक्सर कहते हैं कि भारत के पास बॉलर्स की लंबी फौज है. लेकिन कोलंबो की पाटा पिच ने सच्चाई सामने ला दी. जब विकेट से कोई मदद ना हो तब बुमराह जैसा ‘एक्स-फैक्टर’ ही गेम बनाता है. युवा स्पिनर मानव सुथार ने जरूर इम्पैक्ट डाला लेकिन सिराज और प्रसिद्ध कृष्णा जैसे पेसर्स बिल्कुल आउट ऑफ रिदम दिखे. बुमराह का टीम में ना होना सीधे-सीधे सीरीज के नतीजों पर कितना असर डालता है ये कोलंबो में फिर साबित हो गया.
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हालांकि मैच के कुछ सेशन ऐसे थे जहां पिच कभी-कभी हलचल करती दिखी लेकिन बार-बार होती बारिश ने रही सही कसर भी धो डाली. क्या ये सच्चाई कोई छिपा सकता है कि जिन कुलदीप यादव को सीरीज़ के आगाज़ से पहले हमारी स्पिन गेंदबाज़ी का ट्रंप कार्ड माना जा रहा था, वो ऐसे बेअसर दिखे कि दूसरे टेस्ट में उन्हें अंतिम-11 में मौका तक नहीं मिल पाया.
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वैसे कोलंबो टेस्ट की कहानी श्रीलंकाई बल्लेबाज़ों की तारीफ के बिना पूरी नहीं हो सकती. सोनल दिनुषा ने अकेले दम पर भारतीय गेंदबाज़ों को थका दिया. 126 की औसत से रन बनाकर वो प्लेयर ऑफ द सीरीज़ बने. उनका ऐतिहासिक साथ महज़ अपना दूसरा टेस्ट खेल रहे केशारा नुवांता ने दिया. नुवांता का फर्स्ट क्लास क्रिकेट में औसत सिर्फ 12 का था लेकिन उन्होंने 256 मिनट क्रीज़ पर डटकर भारत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. दोनों के बीच सातवें विकेट के लिए हुई 112 रनों की साझेदारी ने ही असल में भारत से वो कीमती जीत छीन ली. सोनल दिनुषा ने रिकॉर्ड्स की झड़ी लगाई है. चाहता तो हूं कि उनपर कुछ और लिखूं लेकिन आज पहले बात भारतीय टीम की नाकामी की करना ज़रूरी है.
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कोलंबो टेस्ट का यह ड्रॉ सिर्फ एक मैच का नतीजा नहीं बल्कि वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप फाइनल की राह में एक बड़ा रोड़ा है. टीम इंडिया को इस सीरीज़ से पूरे पॉइंट्स की उम्मीद थी. 2-0 की जीत से फाइनल का रास्ता बहुत आसान हो जाता. लेकिन अब इस नतीजे के बाद टीम का जीत का प्रतिशत गिर गया है. WTC के फाइनल में पहुंचने के लिए अब हर मैच बहुत कीमती हो गया है. भारत ने अब तक जैसा ढीला-ढाला प्रदर्शन किया है उसे देखते हुए यह ड्रॉ बहुत भारी पड़ने वाला है. हमने अपने हाथों से एक सुनहरा मौका गंवा दिया है. अब कोलंबो को भूलकर आगे बढ़ना ही होगा.
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गिल और गंभीर के सामने जो चुनौतियां हैं वो काफी बड़ी हैं. आगे भारतीय टीम को न्यूज़ीलैंड और फिर ऑस्ट्रेलिया जैसी धाकड़ टीमों का सामना करना है. न्यूज़ीलैंड सीरीज़ कीवी टीम अपने घर पर खेलेगी. वहां की पिचें और भारत को पिछली बार हमारे घर पर 3-0 से हराने के बाद उनका माइंडसेट और भी आक्रामक होगा. फिर बारी ऑस्ट्रेलिया की आएगी जो भारत को घर पर न्यूज़ीलैंड और साउथ अफ्रीका जैसी टीमों से मिले घाव देने का विचार करेगी. अगर टीम इंडिया इसी सामान्य रणनीति और बिना ‘एग्रेशन’ वाली अप्रोच के साथ उतरी तो नतीजे भयानक हो सकते हैं. टेस्ट में रोहित-विराट तो वापस नहीं आ सकते लेकिन वक्त आ गया है कि इस ‘हारनुमा ड्रॉ’ से सबक लिया जाए और वो पुरानी ‘किलर इंस्टिंक्ट’ वापस लाई जाए.
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