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Religion

Vikram Samvat: अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल आगे चलता है विक्रम संवत, जानें हिन्दू नववर्ष के रोचक फैक्ट्स

Vikram Samvat: भारतीय परंपरा का प्राचीन और वैज्ञानिक कैलेंडर विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से 57 साल आगे चलता है. आज भी हिंदू त्योहार इसी पंचांग के अनुसार मनाए जाते हैं. खगोल गणना और संस्कृति से जुड़ी इस परंपरा का नया साल 19 मार्च 2026 से शुरू हो रहा है. जानिए, इससे जुड़े रोचक तथ्य.

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Written By: Shyamnandan Updated: Mar 18, 2026 20:42
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Photo Credit: AI Gemini

Vikram Samvat: भारतीय समय गणना की परंपरा बेहद प्राचीन और वैज्ञानिक मानी जाती है. इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण आधार है विक्रम संवत. यह कैलेंडर अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष आगे चलता है और आज भी अधिकांश हिंदू त्योहारों की तिथियां इसी से तय होती हैं. खगोल गणना, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का अनोखा मेल इसे खास बनाता है. हिन्दू नववर्ष 19 मार्च, 2026 से आरंभ हो रहा है. आइए जानते हैं, इससे जुड़े कुछ रोचक फैक्ट्स.

राजा विक्रमादित्य ने किया स्थापित

विक्रम संवत केवल तारीख बताने वाला कैलेंडर नहीं है. यह भारतीय खगोल विज्ञान, संस्कृति और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. माना जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व शकों पर विजय के बाद इसकी शुरुआत की थी. आज भी भारत के कई हिस्सों में यह पंचांग परंपराओं और त्योहारों का आधार बना हुआ है.

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विक्रम संवत से जुड़े प्रमुख रोचक फैक्ट्स

57 साल आगे चलता है: विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर यानी ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे चलता है. साल 2026 में विक्रम संवत 2083 शुरू होगा.
लूनी-सोलर कैलेंडर: यह कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर तैयार किया जाता है. इसी कारण इसे ‘लूनी-सोलर कैलेंडर’ भी कहा जाता है.
चंद्रमा की कलाओं से तय होते महीने: विक्रम संवत में महीनों का निर्धारण चंद्रमा की कलाओं के अनुसार किया जाता है. प्रत्येक माह अमावस्या या पूर्णिमा के चक्र से जुड़ा होता है.
अधिकमास की व्यवस्था: लगभग हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है जिसे अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं. इससे चंद्र और सौर वर्ष के बीच का अंतर संतुलित रहता है.
ऋतुओं का संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था: अधिकमास जोड़ने की परंपरा के कारण त्योहार हमेशा सही मौसम और ऋतु में ही आते हैं.
पौराणिक मान्यता: धार्मिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सृष्टि की रचना शुरू की थी. इसी कारण इसे हिंदू नववर्ष का पहला दिन माना जाता है.
त्योहारों का आधार: होली, दिवाली, रक्षाबंधन, नवरात्रि और जन्माष्टमी जैसे प्रमुख हिंदू त्योहार आज भी विक्रम संवत की तिथियों के आधार पर ही मनाए जाते हैं.

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हिंदू नववर्ष से जुड़ी प्रमुख परंपराएं

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरुआत: विक्रम संवत का नया साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है. इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है.
देशभर में अलग-अलग नाम: इसे महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादी और उत्तर भारत में चैत्र नववर्ष कहते हैं.
घर की सजावट की परंपरा: इस दिन घरों के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण लगाया जाता है. इसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
नए वस्त्र और पूजा: लोग नए कपड़े पहनते हैं, मंदिरों में पूजा करते हैं और परिवार के साथ नववर्ष का स्वागत करते हैं.

ज्योतिष और वर्ष का भविष्यफल

वर्ष का राजा और मंत्री: जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता है, उस दिन के ग्रह को उस पूरे वर्ष का राजा माना जाता है. इस वर्ष 2083 के राजा बृहस्पति और मंत्री मंगल हैं.
ग्रहों के आधार पर भविष्यवाणी: ज्योतिषाचार्य ग्रहों की स्थिति देखकर वर्ष के मौसम, कृषि, व्यापार और सामाजिक स्थितियों के बारे में अनुमान लगाते हैं.
पंचांग श्रवण की परंपरा: नववर्ष के दिन पंडित या ज्योतिषाचार्य से नए साल का पंचांग सुनने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है.

व्यापार और बाजार में महत्व

दिवाली पर नया लेखा वर्ष: भारत के कई व्यापारी दिवाली से नया व्यापारिक वर्ष शुरू करते हैं.
मुहूर्त ट्रेडिंग की परंपरा: शेयर बाजार में दिवाली के दिन विशेष “मुहूर्त ट्रेडिंग” का आयोजन होता है. इसे नए संवत के शुभ आरंभ का प्रतीक माना जाता है.
परंपरा और आधुनिकता का मेल: आधुनिक समय में भी विक्रम संवत भारतीय संस्कृति, ज्योतिष और व्यापारिक परंपराओं में मजबूत स्थान बनाए हुए है.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Mar 18, 2026 08:42 PM

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