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Pancharatra Vrat: ‘पंचरात्र व्रत’ क्या है, जिससे कुबेर बने धन के देवता, जानें क्या हैं व्रत के नियम

Pancharatra Vrat: पंचरात्र व्रत भगवान विष्णु का विशेष 5 दिवसीय व्रत है. मान्यता है कि इससे दुख, दरिद्रता और कष्ट दूर होते हैं तथा विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं, यह व्रत कब किया जाता है, किसने किया था और इसके प्रमुख नियम क्या हैं?

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Pancharatra Vrat: पंचरात्र व्रत अधिकमास में किया जाने वाला 5 दिनों का एक विशेष अनुष्ठान है. यह भगवान विष्णु को समर्पित व्रत हैं, जो 5 रात्रियों तक पूर्ण नियम, उपवास और अपार श्रद्धा क साथ किया जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को रखने से इस जन्म के सभी दुख-दरिद्रता और कष्ट हमेशा के लिए मिल जाते हैं और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है. कंगाल को मालामाल करने वाले इस व्रत को किसने किया था, यह कब किया जाता है और इसके नियम क्या हैं?

कुबेर ने पाया धन देवता का पद

हिन्दू धर्म के शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि एक बार भगवान कुबेर ने धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए महादेव शिव से उपाय पूछा. भगवान शिव ने उन्हें पंचरात्र व्रत करने की सलाह दी थी. कहते हैं, इस व्रत का असर ऐसा हुआ कि उन्हें देवता का दर्जा मिला और देवताओं के खजांची होने का पद प्राप्त हुआ.

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कब करते हैं पंचरात्र व्रत?

पंचरात्र व्रत को भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण भक्ति, प्रेम और समर्पण व्यक्त करने का श्रेष्ठ अनुष्ठान माना गया है. इसके आरंभ करने का सर्वोत्तम समय अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास माना गया है. प्रायः इसकी शुरुआत अधिकमास में कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी तिथि से किया जाता है, जो पूर्णिमा तिथि को समाप्त होता है. लेकिन इसे कार्तिक मास में भी करने का नियम है.

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अंगूठे पर खड़े रहने का नियम: प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इस पंचरात्रिका व्रत के दौरान जल भी ग्रहण नहीं करते थे और दिन के एक पहर पैर के अंगूठे पर खड़े होकर भगवान विष्णु का ध्यान करते थे.

पंचरात्र व्रत के नियम

पंचरात्र व्रत के 5 दिनों में भगवान विष्णु के ‘5 व्यूह’ रूपों की आराधना की जाती है. ये व्यूह रूप हैं- वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण. इनकी पूजा से 5 प्रकार के अज्ञान यानी मोह, महामोह, तामिस्र, अंधतामिस्र और अविद्या का नाश होता है.

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इस व्रत के करने लिए साधक को पूरे दिन को 5 भागों में बांटना होता है:

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  • अभिगमन: सुबह उठकर भगवान का स्मरण और दर्शन
  • उपादान: पूजा के लिए फूल, तुलसी और अन्य पूजन सामग्री का संग्रह करना
  • इज्या: दोपहर में मुख्य देव-पूजा और भोग लगाना
  • स्वाध्याय: धार्मिक ग्रंथों का पाठ, ईश्वर का चिंतन, कीर्तन
  • योग: रात को सोने से पहले भगवान के चरणों में ध्यान लगाना

आपको याद दिला दें कि इस पूजा के दौरान भी भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते अवश्य चढ़ाएं, क्योंकि तुलसी दल बिना उनकी पूजा रहती है. साथ ही, पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्र का 108 बार जाप जरूर करना चाहिए.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Jun 09, 2026 08:19 PM

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Shyamnandan

श्यामनंदन पिछले 20 से अधिक वर्षों से पत्रकारिता और कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में सक्रिय हैं। वर्तमान में वे News24 में धर्म और ज्योतिष सेक्शन के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जहां उनकी कोशिश रहती है कि पाठकों को सटीक, सरल और उपयोगी जानकारी मिल सके। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से ज्योतिष का सांगोपांग अध्ययन किया है। साल 2015 से वे धर्म और ज्योतिष विषय पर लगातार लिख रहे हैं और इस क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता रखते हैं। धार्मिक परंपराओं, वैदिक ज्योतिष, ग्रह-गोचर, राशिफल, अंक ज्योतिष, वास्तु, सामुद्रिक शास्त्र, व्रत-त्योहार, पूजा-पद्धति और आध्यात्मिक विषयों को आसान और भरोसेमंद भाषा में पाठकों तक पहुंचाना उनकी पहचान है। डिजिटल मीडिया, SEO और कंटेंट रणनीति की उन्हें गहरी और अच्छी समझ है।

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