Neem Karoli Baba: दंग कर देने वाले हैं 1920 से 30 के बीच नीम करोली बाबा के भेष, जानें तलैया बाबा और जटाधारी रूप की कहानी

Neem Karoli Baba Story: कहते हैं, 1920 30 के अज्ञात वर्षों में नीम करोली बाबा ने घोर तपस्या की थी और इस कठिन दौर में उन्होंने कई चमत्कारी और अनोखे भौतिक रूप धारण किए. आइए जानते हैं, उनके गुजरात में ‘तलैया बाबा’ और यूपी के फर्रुखाबाद की गुफा में ‘जटाधारी’ भेष में रहने की कहानी क्या है?

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सन 1920-30 के दौर में नीम करोली बाबा ने घोर तपस्या की थी. (Photo Credit: AI/News24)

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Neem Karoli Baba Story: नीम करोली बाबा एक ऐसा नाम हैं, जिनके दर्शन मात्र का पुण्य लाभ लेने के लिए दुनिया के अमीर से अमीर और शक्तिशाली लोग दौड़े चले आते हैं. हर कोई उनके चमत्कारों और उनकी तपस्या की ऊर्जा के आगे नतमस्तक हो जाता है. लेकिन आपको पता नहीं होगा, उनका एक समय, एक दौर ऐसा था, जब उनके भौतिक रूप कई प्रकार के थे. उस समय उनके भेष और साधन के तरीके को देख कर लोग दंग रह जाते थे.

नीम करोली बाबा के जीवन की 1920 से 1030 तक की अवधि लगभग अज्ञातमय रही है, क्योंकि कहा जाता है कि संभवतः यह उनके जीवन का सबसे कठिन और चमत्कारी दौर भी था. आइए जानते है, इस दौरान बाबा किस भेष में थे और ‘तलैया बाबा’ से ‘जटाधारी’ रूप में कैसे और क्यों आए? आपको बता दें कि बाबा के जीवन के इस काल को बहुत लोग ‘लापता काल’ कह देते हैं, जो गलत है. यह काल उनकी तपस्या का वो समय था, जब वे जनता के बीच कम और ईश्वर के करीब अधिक थे.

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बबानिया के ‘लक्ष्मणदास’ और ‘तलैया बाबा’

कहते हैं, नीम करोली बाबा ने 1911-12 में अपना घर-बार छोड़ दिया था. वे गृहस्थ जीवन से बाहर निकल आए थे. उन्होंने भारत के भिन्न-भिन्न हिस्सों का भ्रमण किया. उनके जीवनी लिखने वाले लेखक और साधक राम दास जी की ‘मिरैकल ऑफ लव’ और प्रेम प्रकाश जी की ‘नीम करोली बाबा: ही इज विथ अस हियर एंड नाउ’ नामक पुस्तकों में वर्णन मिलता है कि 1920 के दशक के शुरुआती समय वे गुजरात के मोरबी के पास बबानिया गांव में रहते थे. यहां वे एक वैष्णव संत के रूप में थे. लोग उनको ‘लक्ष्मण दास’ कहते थे.

इसी गांव में एक छोटा सा तालाब था, जिसे बबानिया के लोकल लैंग्वेज में ‘तलैया’ कहा जाता था. बाबा लक्ष्मण दास इस तालाब के किनारे घंटों तक ध्यान लगाए रहते थे. उनकी इस आदत और तालाब के प्रति लगाव को देख स्थानीय लोगों ने उन्हें ‘तलैया बाबा’ कहना शुरू कर दिया.

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गुफा में रहने वाले बाबा का ‘जटाधारी रूप’

कहते सन 1925 के आसपास बाबा उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले के ‘नीब करौरी’ गांव पहुंचे. ट्रेन वाली महाचमत्कार की घटना यहीं घटी थी, जहां उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया था और इसके बाद ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी थी. कहते हैं, ट्रेन की घटना के बाद सम्मानपूर्वक उन्हें नीब करौरी गांव लाया गया. यहां बाबा का पूरा भेष बदल गया.

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कहते हैं, यहां उन्होंने साधना के लिए जमीन के अंदर एक गुफा तैयार करवाई थी. दिन में में वे इसी गुफा में रहते थे और केवल कभी-कभी रात को बाहर आते थे. इस समय बाबा केवल एक लंगोट धारण करते थे. कहते हैं, उनके बाल भयंकर रूप से उलझ गए थे, जटाएं काफी लंबी हो गई थीं. उनका यह रूप एक दिव्य रूप था, लोग देखकर विस्मित और चकित हो जाते थे.

1930 में बदला बाबा का भेष

कहते हैं, 1930 के आसपास बाबा ने नीब करौरी गांव में हनुमान जी का एक भव्य मंदिर बनवाया था. इसके बाद उन्होंने अपनी गुप्त साधना त्याग कर दिया. अपनी लंबी जटाओं का मुंडन करवा दिया. वे लंगोट की जगह सूती धोती पहनने लगे. यही वह समय था, जब लोगों ने उन्हीं नीब करोरी बाबा या ‘नीम करोली बाबा’ कहना शुरू और जो आजतक कहा जा रहा है. आपको बता दें कि इसी कालखंड में लोग उन्हें ‘हांडी वाले बाबा’ और ‘तिकोनिया वाले बाबा’ भी कहते थे.

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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लेखक के बारे में

Shyamnandan

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श्यामनंदन कुमार News24.com में चीफ सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामनंदन ज्योतिष, अंक शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, पर्व-त्योहार सहित भारतीय धर्म-संस्कृति के जानकार पत्रकार हैं. उन्होंने पत्रकारिता में एम.ए. की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से की है और ज्योतिष का अध्ययन भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से किया है. अपने पेशे में डिजिटल करियर की शुरुआत उन्होंने एनडीटीवी कन्वर्जेंन्स के साथ की. श्यामनंदन हिंदुस्तान टाइम्स, बंसल न्यूज (भोपाल) जैसे न्यूज प्लेटफॉर्म्स के साथ भी जुड़े रहे हैं. उन्होंने देश के प्रसिद्ध संतों के सत्संग और समागम की रिपोर्टिंग की है.
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