Maa Ganga Stortam Lyrics: बड़े से बड़े पाप व कष्ट से मिल सकती है मुक्ति, रोजाना पढ़ें श्री गंगा स्तोत्रम्

Maa Ganga Stortam Lyrics: प्राचीन काल से ही गंगा की पूजा नदी और देवी दोनों के रूप में की जा रही है, जिनकी कृपा से व्यक्ति बड़े से बड़े पाप व कष्ट से मुक्त हो सकता है. अगर आप भी देवी गंगा से मनचाहा वरदान पाना चाहते हैं तो नियमित रूप से श्री गंगा स्तोत्रम् का पाठ कर सकते हैं. यहां पर श्री गंगा स्तोत्रम् के सही लिरिक्स दिए गए हैं.

Maa Ganga Stortam Lyrics

Credit- AI Gemini

Maa Ganga Stortam Lyrics: गंगा को भारत की प्रमुख नदियों में से एक माना जाता है, जिसकी पूजा माता गंगा के रूप में भी की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता गंगा की पूजा करने से पापों का नाश होता है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं. साथ ही नियमित रूप से गंगा नदी में स्नान करना शुभ होता है. यदि आप भी अपने पापों से छुटकारा पाकर खुशहाल जीवन जीना चाहते हैं तो माता गंगा की विशेष कृपा प्राप्त कर सकते हैं, जिसके लिए रोजाना विधिपूर्वक श्री गंगा स्तोत्रम् का पाठ करना उचित रहेगा. चलिए विस्तार से जानते हैं कि श्री गंगा स्तोत्रम् के महत्व, लिरिक्स और लाभ आदि के बारे में.

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श्री गंगा स्तोत्रम् का महत्व

श्री गंगा स्तोत्रम्, देवी गंगा को समर्पित एक बेहद शक्तिशाली व पवित्र स्तुति है, जिसमें मुख्य रूप से माता गंगा की महिमा और गुणों का उल्लेख है. साथ ही इसके जरिए माता गंगा से पापों और जीवन के तमाम कष्टों से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना की जाती है. आपको बता दें कि प्राचीन काल में श्री आदि शंकराचार्य ने माता गंगा के प्रति अपनी गहरी भक्ति प्रकट करने और जन-कल्याण के लिए श्री गंगा स्तोत्रम् की रचना की थी.

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श्री गंगा स्तोत्रम् के लिरिक्स

ll श्रीमच्छनकराचार्य रचित गंगा स्तोत्र ll

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देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरल तरंगे।
शंकर मौलिविहारिणि विमले मम मति रास्तां तव पद कमले॥ १ ॥
भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः।
नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम्॥ २ ॥
हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम्॥ ३ ॥
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम्।
मातर्गंगे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः॥ ४ ॥
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खंडित गिरिवरमंडित भंगे।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये॥ ५ ॥
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके।
पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवति कृततरलापांगे॥ ६ ॥
तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे॥ ७ ॥
पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जय जय जाह्नवि करुणापांगे।
इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये॥ ८ ॥
रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम्।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९ ॥
अलकानंदे परमानंदे कुरु करुणामयि कातरवंद्ये।
तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुंठे तस्य निवासः॥ १० ॥
वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः।
अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः॥ ११ ॥
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये।
गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम्॥ १२ ॥
येषां हृदये गंगा भक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः।
मधुराकंता पंझटिकाभिः परमानंदकलितललिताभिः॥ १३ ॥
गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम्।
शंकरसेवक शंकर रचितं पठति सुखीः त्व॥ १४ ॥

॥ इति श्रीमच्छनकराचार्य विरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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