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Relationship Label: ‘ब्रेकअप’ एक ऐसा शब्द था जो मिलेनियल्स के डेटिंग समय में हर भावना कोल बताता था। लेकिन जैसे-जैसे पीढ़ियों के साथ रिश्ते बढ़े सोशल मीडिया पर अलग-अलग लेबल के साथ भावनाओं के भी नाम आते गए। बेंचिंग, जाॅम्बी-इंग, ब्रेडक्रंबिंग, घोस्टिंग और कई और नाम इस पीढ़ी के रिलेशनशिप डिक्शनरी में जुड़ते रहते हैं। हालांकि ये परिभाषित भावनाएं वास्तव में हर पीढ़ी द्वारा महसूस की जाती थीं लेकिन पहले कभी भी इन्हें लेबल नहीं किया गया था। जबकि आम आदमी इस भाषा की भूलभुलैया के लिए जेनरेशन जेड को दोषी ठहराएगा यहां एक बड़ा सांस्कृतिक बदलाव चल रहा है।
जेनरेशन Z ने इंटरनेट के समय में जन्म लिया है जहां सोशल मीडिया उनका दूसरा घर बन चुका है। इंस्टाग्राम, ट्विटर, और टिकटॉक जैसे प्लेटफार्म्स पर अपनी पहचान बनाने और दूसरों से जुड़ने की आदत बहुत जल्दी पकड़ी है। रिलेशनशिप्स के बारे में खुलकर बात करना और अपने रिश्ते को सबके सामने ‘लेबल’ करना यहां की एक आम बात बन गई है। यह न केवल खुद को पहचानने में मदद करता है बल्कि यह दूसरों को भी उनके रिश्ते के बारे में सच्चाई दिखाता है।
जेनरेशन Z को रिश्तों में सब कुछ एक ही समय में चाहिए होता है। दोस्ती, रोमांस, और कभी-कभी एक साथ ही मानसिक समर्थन। इसलिए वे रिलेशनशिप्स को ज्यादा ‘स्पेसिफिक’ करते हैं ताकि हर पहलू को कवर किया जा सके। एक रिश्ता सिर्फ रोमैंटिक होने के बजाय दोस्ती और म्यूच्यूअल प्रायोरिटीज का बनकर रह जाता है। ऐसे में “बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड” या “डेडिकेटेड पार्टनर” जैसे लेबल्स ज्यादा चल रहें हैं।
आज की जेनरेशन अपनी पहचान को लेकर बहुत क्लियर है। वे खुद को उनके रिश्तों, रुचियों और प्रायोरिटीज से डिफाइन करना चाहते हैं। जब कोई रिलेशनशिप लेबल होता है तो यह उन्हें अपनी पहचान बनाने में मदद करता है और साथ ही परिवार, दोस्त और समाज के सामने भी उनके रिश्ते को मान्यता मिलती है। सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से लेबल लगाए गए रिश्ते अक्सर दूसरों से समर्थन और स्वीकृति प्राप्त करते हैं जो एक अहम बात है।
मिलेनियल्स की तुलना में जेनरेशन Z कमिटमेंट के प्रति थोड़ी अलग मानसिकता रखते हैं। वे रिश्तों को लेकर ज्यादा खुले होते हैं और यह मानते हैं कि एक इंसान कई प्रकार के रिश्तों का अनुभव कर सकता है जिनमें से कुछ लंबे समय के और कुछ शॉर्ट-टर्म हो सकते हैं। इस नजरिए से लेबल्स सिर्फ रिश्ते के बारे में बताने के लिए होते हैं न कि उस पर बंधन डालने के लिए।
जेनरेशन Z अपने रिश्तों को लेबल्स से अलग-अलग तरीके से देखता है। जैसे “पार्टनर” या “सपोर्ट सिस्टम” जैसे लेबल्स जो किसी भी जेंडर और सेक्सुअल ओरिएंटेशन को सीमित नहीं करते। ऐसे रिश्ते ज्यादा लचीले होते हैं और यह जेनरेशन के लिए खुद को दिखाने का एक नया तरीका है।
आजकल जेनरेशन Z के लिए सेल्फ-केयर और मानसिक स्वास्थ्य की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। वे चाहते हैं कि उनके रिश्ते उनके मानसिक और भावनात्मक भले के लिए काम करें। जब एक रिश्ता लेबल के साथ होता है तो यह उसे गंभीरता से लेने और रिश्ते को प्रायोरिटी देने का संकेत देता है। इसके अलावा लेबल यह भी सुनिश्चित करता है कि पार्टनर एक-दूसरे के लिए जिम्मेदार रहें।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रिलेशनशिप एडवाइस और इंस्पिरेशनल कंटेंट का बढ़ता हुआ प्रभाव भी इस बदलाव की एक बड़ी वजह है। जेनरेशन Z सोशल मीडिया से प्रेरित होती है जहां रिश्तों को लेकर चर्चा होती है और नई चीजें सीखने का मौका मिलता है। ऐसे में वे आसानी से लेबल्स को अपनाते हैं ताकि उन्हें एक दिशा मिल सके कि वे अपने रिश्तों को कैसे देख सकते हैं।
जेनरेशन Z का रिलेशनशिप्स को लेकर यह नया नजरिया निश्चित ही एक दिलचस्प बदलाव है। आज के डिजिटल समय में जहां पहचान और स्वीकृति सबसे जरूरी है ऐसे में रिश्तों को लेबल करना न केवल एक ट्रेंड है बल्कि यह एक तरीका बन चुका है खुद को और अपने रिश्तों को सही तरीके से समझने और दिखाने का। क्या यह बदलाव भविष्य में और मजबूत होगा? यह तो समय ही बताएगा लेकिन फिलहाल जेनरेशन Z अपनी शर्तों पर रिश्तों के बारे में बताने में पूरी तरह सक्षम है।
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