'गंगा में चिकन खाने से कोई कानून नहीं रोक सकता' मुस्लिम छात्रों की गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट के जज ने बताया गलत

Justice Ujjal Bhuyan: आपको याद होगा कि इस साल वाराणसी में रमजान के दौरान गंगा नदी पर बोट राइड के दौरान कुछ मुसलमानों ने इफ्तार में चिकन बिरयानी खाई थी, जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी की गई थी. अब इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अपनी राय रखी है.

Ganga Chicken Biryani

Justice Ujjal Bhuyan On Eating Chicken On The Ganga: भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में जस्टिस जीपी सिंह के चौथे मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए, सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने वाराणसी में मुस्लिम छात्रों के एक ग्रुप की गिरफ्तारी की आलोचना की. उन्होंने कहा कि उन्हें एक ऐसे काम के लिए जेल में रखा गया जो कोई अपराध नहीं है.

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‘बिरयानी खाना अपराध नहीं’

इस घटना का जिक्र करते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि नेचर ऑफ एलिगेशन के बावजूद ये युवा तकरीबन 3 महीने तक जेल में रहे. उन्होंने कहा, ‘मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है. ये अपराध नहीं हो सकता.. उन्हें इसी वजह से गिरफ्तार किया गया था, और उन्हें 3 महीने तक जेल में रहना पड़ा.’

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वाराणसी में क्या हुआ था?

मार्च 2026 में रमजान के दौरान वाराणसी पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 और 299 के तहत 14 मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार किया था. इन पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, दुश्मनी को बढ़ावा देने, सार्वजनिक उपद्रव पैदा करने और जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने जैसे आरोप लगाए गए थे. शिकायत करने वालों के मुताबिक, ये ग्रुप गंगा में नाव की सवारी के दौरान चिकन बिरयानी खा रहा था और कथित तौर पर मांस की हड्डियां और बचा हुआ खाना नदी में फेंक दिया, जिसे सनातन धर्म में पवित्र माना जाता है.

‘लोकतंत्र शांतिपूर्ण असहमति पर निर्भर करता है’

जस्टिस भुइयां ने जोर देकर कहा कि अपनी राय बताने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की क्षमता लोकतांत्रिक शासन का आधार है. उन्होंने चिंता जताई कि विरोध के सामान्य कामों को भी अब आपराधिक कानून के नजरिए से देखा जा रहा है. उन्होंने आगे कहा, ‘अपनी राय व्यक्त करने और शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता है. बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं. बदकिस्मती से, नॉर्मल एक्टिविटीज को भी अपराध माना जा रहा है.’

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छात्रों के साथ सलूक पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट के जज ने एनवायरनमेंटल एक्टिविस्ट्स और स्टूडेंट प्रोटेस्टर्स के साथ किए जाने वाले बिहेवियर का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जो लोग जायज चिंताएं उठाते हैं, उनके साथ अक्सर ऐसा सलूक किया जाता है जैसे उन्होंने कोई गंभीर अपराध किया हो.

जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘जो लोग पर्यावरण के नुकसान – जो कि एक सच्चाई है – पर अपनी चिंता जाहिर करने आते हैं, उन्हें ऐसे भगा दिया जाता है जैसे वे अपराधी हों. कैंपस में विरोध करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, और उन्हें 30-40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती.’ उन्होंने ये भी बताया कि कई छात्रों को शिक्षण संस्थानों से सस्पेंशन का सामना भी करना पड़ता है, जिससे उन्हें अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने से पहले कानूनी मदद लेनी पड़ती है.

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जमानत की शर्तों पर सवाल

जस्टिस भुइयां ने ये भी सवाल उठाया कि क्या अदालतों की तरफ से जमानत के लिए लगाई गई सख्त शर्तें नागरिकों को असहमति जताने के उनके अधिकार का इस्तेमाल करने से रोक सकती हैं. उन्होंने माना कि अदालतें कई मामलों में जमानत देती हैं, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि देरी और पाबंदी वाली शर्तें चिंता का विषय बनी हुई हैं.

उन्होंने कहा, ‘हालांकि अदालतें संवेदनशील हैं और जमानत देती भी हैं, लेकिन कई बार इसमें देर हो जाती है. लेकिन जमानत देते वक्त लगाई जाने वाली पाबंदी वाली शर्तें सबसे ज्यादा चिंता का विषय हैं. क्या ऐसे पाबंदी वाले आदेशों के जरिए अदालतें इनडायरेक्ट तौर पर नागरिकों को असहमति न जताने के लिए कह रही हैं या उन्हें ऐसा करने से रोक रही हैं?’

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बुलडोजर जस्टिस और फिलिस्तीन प्रोटेस्ट का जिक्र

जस्टिस भुइयां ने सजा के तौर पर अपनाए जाने वाले ‘बुलडोजर जस्टिस’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का स्वागत किया, लेकिन ये भी कहा कि यह फैसला ‘2 साल की देरी’ से आया. उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया जिनमें जमानत की शर्तों की वजह से आरोपी पब्लिक मीटिंग में शामिल नहीं हो पाए या सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं कर पाए. उन्होंने कहा कि ऐसी पाबंदियां उनकी बुनियादी आजादी और लिबर्टी को बुरी तरह कमजोर करती हैं.

इसके अलावा, जस्टिस भुइयां ने फिलिस्तीन के समर्थन में प्रोटेस्ट की इजाजत न देने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले की आलोचना की. उन्होंने अदालत की टिप्पणियों को ‘काफी अजीब’ बताया और कहा कि याचिकाकर्ताओं से घरेलू मुद्दों के बजाय गाजा में हो रही घटनाओं के बारे में विरोध प्रदर्शन करने को लेकर सवाल पूछे गए थे, जबकि भारत ने पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन को मान्यता दी है और यहां फिलिस्तीनी दूतावास भी है.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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