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1974 का वह छात्र आंदोलन जिसने गिरा दी थी बहुमत की सरकार, NEET विवाद के बीच जानिए क्या था नवनिर्माण आंदोलन?

NEET 2026 पेपर लीक विवाद के बीच CJP के आंदोलन ने देशभर में छात्र शक्ति पर नई बहस छेड़ दी है. ऐसे में 1974 के गुजरात के ऐतिहासिक नवनिर्माण आंदोलन को कोई कैसे भूल सकता है. बता दें कि इस आंदोलन की शुरुआत महज 30 रुपये के मेस बिल में बढ़ोतरी के विरोध से हुई थी और आखिरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा था.

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Gujarat Navnirman Andolan History: दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगातार जारी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन इस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. नीट 2026 पेपर लीक के बाद गुस्साएं छात्रों ने ‘चलो संसद’ मार्च किया. इस दौरान दिल्ली पुलिस और छात्रों के बीच जमकर टकराव देखने को मिला. पुलिस ने भीड़ को कंट्रोल करने के लिए आंसू गैस के गोले का भी इस्तेमाल किया और छात्रों पर लाठियां भी चलाई. इतना टकराव होने के बाद भी छात्र रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं और ये सब देखकर ही छात्रों के गुस्से का अंदाजा लगाया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट की महज एक टिप्पणी से सामने आया एक शब्द ‘कॉकरोच’ कैसे सरकार के लिए आज के समय में सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है. इतिहास के पन्नों को पलटकर देखेंगे तो पता चलेगा कि ये कोई पहला छात्रों का आंदोलन नहीं है जिसने सत्ता की कुर्सियों को हिलाया है बल्कि जब भी सत्ता पक्ष ने छात्रों की ताकत, उनकी एकता को कम आंका है तब-तब उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है.

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जब 30 रुपये की बढ़ोतरी बनी जनआंदोलन की वजह

देश में छात्र आंदोलनों का इतिहास कई बड़े राजनीतिक बदलावों का गवाह रहा है. इन्हीं आंदोलनों में एक नाम गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन का भी है, जिसने साल 1974 में तत्कालीन राज्य सरकार की सत्ता तक हिला दी थी. इस आंदोलन की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक मुद्दे से नहीं, बल्कि एक इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल मेस बिल में लगभग 30 रुपये की बढ़ोतरी के विरोध से हुई थी. लेकिन थोड़े समय बाद ही इस आंदोलन ने महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी नीतियों के खिलाफ भी अपनी आवाज तेज कर दी थी.

1973, दिसंबर का समय… जब देश में महंगाई अपने चरम पर थी आम आदमी पर राशन की कमी का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा था. इस महंगाई के बोझ के दौरान ही अहमदाबाद के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में छात्रों के मेस (खाने) का बिल अचानक 70 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये कर दिया गया था. सीधे 30 रुपये की बढ़ोतरी एक साथ. महंगाई की मार के बीच आम छात्रों को ये बढ़ोतरी बिल्कुल भी हजम नहीं हुई. जिसके बाद 20 दिसंबर 1973 को एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने इस बढ़ोतरी के खिलाफ हड़ताल शुरू की.

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3 जनवरी, 1974 आते-आते एल.डी. इंजीनियरिंग के छात्रों द्वारा जलाई गई ये आग गुजरात यूनिवर्सिटी तक भी पहुंच गई. इस दौरान पुलिस और छात्रों के बीच खूब झड़पें हुईं. छात्रों ने लाठी-डंडे खाए और देखते ही देखते ये इस हड़ताल ने एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया.

बनी थी नवनिर्माण युवक समिति

उस समय राज्य में महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर पहले से ही लोगों में नाराजगी थी. ऐसे में छात्रों का विरोध आम जनता की आवाज बना और व्यापारी, कर्मचारी और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी आंदोलन को अपना समर्थन दिया. सिर्फ आम लोग ही नहीं छात्रों के इस आंदोलन में धीरे-धीरे वकील, प्रोफेसर, मिडिल क्लास के लोग और मजदूर वर्ग भी जुड़ता गया. जिसके बाद आंदोलन को सही दिशा में चलाने के लिए नवनिर्माण युवक समिति का गठन किया गया.

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कुछ ही दिनों में ये प्रदर्शन पूरे राज्य में फैल गया. कई शहरों में रैलियां, धरने और विरोध मार्च होने लगे. कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई स्थानों पर पुलिस बल तैनात किया गया. इस बीच पुलिस और छात्रों के बीच हिंसक झड़पों की घटनाएं भी हुईं.

कांग्रेस के चिमनभाई पटेल थे मुख्यमंत्री

छात्रों के इस बड़े आंदोलन ने सरकार की कुर्सियां तक हिला दी थीं और कांग्रेस के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगने लगे. सरकार पर लगातार दबाव बढ़ रहा था. अब छात्रों की मांग सिर्फ ये नहीं थी कि मेस के खाने में बढ़ाए गए रुपये वापस लिए जाए बल्कि छात्र ये भी मांग कर रहे थे कि राज्य के मुख्यमंत्री को हटाया जाए.

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साल 1974 जनवरी के आखिर तक पूरे गुजरात में सब कुछ बंद कर दिया गया था. हर तरफ प्रदर्शन हो रहे थे और पुलिस के साथ छात्रों की झड़प अब आम हो गई थी. यहां तक की 1974 के समय गुजरात के कई शहरों में सरकार को कर्फ्यू लगाना पड़ गया था और सेना को भी बुला लिया गया. इस दौरान छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे थे और पुलिस के साथ हुईं झड़पों में कम से कम 100 लोगों की मौत भी हो चुकी थी.

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जब मुख्यमंत्री को देना पड़ा इस्तीफा

पूरे गुजरात में भयानक स्थिति थी. चारों ओर पुलिस, प्रदर्शन, छात्रों की मौतों के बाद भी प्रदर्शनकारियों के हौसले में कोई कमी नहीं आई थी. छात्रों का प्रदर्शन हर दिन उग्र होता जा रहा था. जिसे देखकर आखिरकार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी इस मामले में दखल देना पड़ा था. जिसके बाद 9 फरवरी 1974 को छात्रों के भारी दबाव के बीच मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को अपना इस्तीफा देना पड़ा था.

छात्रों ने की विधानसभा भंग करने की मांग

सीएम के इस्तीफे के बाद भी छात्रों का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ बल्कि गुस्साएं छात्रों ने विधानसभा भंग करने की भी मांग की और फिर 16 मार्च 1974 को गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया. इसे आज भी स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली छात्र आंदोलनों में से एक माना जाता है.

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First published on: Jul 24, 2026 03:00 PM

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