'वंदे मातरम' के सिर्फ 2 छंद गाने पर क्यों अड़ी कांग्रेस? 89 साल पुराने किस रेफ्रेंस को बना रही ढाल

यह विवाद तब शुरू हुआ जब हाल ही में दक्षिण गोवा में कांग्रेस के एक सम्मेलन के दौरान पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम’ के पहले दो छंद गाए गए.

Sonia Gandhi Mallikarjun Kharge

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बुधवार को बैठक हुई है. (Image - ANI)

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राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर छिड़े सियासी संग्राम के बीच कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अपने ऐतिहासिक रुख को दोहराया है. बुधवार को हुई CWC की बैठक में तय किया गया कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे. कांग्रेस ने साफ किया कि उसका यह फैसला अक्टूबर 1937 में पारित CWC के आधिकारिक प्रस्ताव पर आधारित है.

कब शुरू हुआ विवाद?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब हाल ही में दक्षिण गोवा में कांग्रेस के एक सम्मेलन के दौरान पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम’ के पहले दो छंद गाए गए. इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर ‘अधूरा’ राष्ट्रीय गीत गाने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा था.

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खरगे का पलटवार

भाजपा पर पलटवार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि उन्होंने वही वंदे मातरम गाया जो दशकों से देश के बड़े नेता गाते आए हैं. खरगे ने कहा, ‘मैंने वही ‘वंदे मातरम’ गाया जो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी गाते थे. अगर यह कोई अपराध है, तो गांधीजी, नेहरू और सरदार पटेल के खिलाफ केस दर्ज कराइए. भाजपा को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान पर कांग्रेस द्वारा लिए गए ऐतिहासिक फैसलों की जानकारी नहीं है. उनके जन्म से पहले ही कांग्रेस ने इस पर प्रस्ताव पारित कर दिया था. मैं वही कर रहा हूं जो पिछले 80 सालों से होता आ रहा है.’

कांग्रेस सिर्फ पहले दो छंद ही क्यों गाती है?

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित और बाद में उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किए गए ‘वंदे मातरम’ के पूरे स्वरूप पर 1930 के दशक में व्यापक बहस हुई थी. गीत के शुरुआती दो छंदों में केवल मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और वंदना का जिक्र है. बाद के छंदों में विशिष्ट धार्मिक और पौराणिक संदर्भ शामिल हैं.

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कांग्रेस का कहना है कि अक्टूबर 1937 में इस मुद्दे पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह ली थी. टैगोर ने राय दी थी कि पहले दो छंद एक समावेशी राष्ट्रीय गान के रूप में आदर्श हैं, जबकि बाद के हिस्से सभी समुदायों के संयुक्त राष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते. इसके बाद 1937 में CWC ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सार्वजनिक और राष्ट्रीय मंचों पर केवल पहले दो छंद गाने की सिफारिश की थी.

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लेखक के बारे में

Arif Khan

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आरिफ खान मंसूरी न्यूज 24 में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. आरिफ को डिजिटल पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा अनुभव हैं. उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लगातार तीन लोकसभा चुनाव के अलावा पिछले 15 सालों में देशभर में हुए विधानसभा चुनावों की भी व्यापक कवरेज की है. न्यूज 24 से पहले उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी, यहां देश, दुनिया और पॉलिटिक्स की खबरों पर काम किया. आरिफ ने इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की हिंदी वेबसाइट जनसत्ता के साथ अपनी पारी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स की हिंदी न्यूज वेबसाइट लाइवहिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया. लाइवहिंदुस्तान.कॉम के बाद वह एनडीटीवी ग्रुप के साथ जुड़ गए. एनडीटीवी में करीब छह साल तक काम करने के बाद न्यूज24 के साथ जुड़ गए. न्यूज24 में भी होमपेज की जिम्मेदारी संभालते हैं. शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कला संकाय में स्नातक और मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री हासिल की है. आरिफ देश, विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरों के अलावा एक्सप्लेनर लिखने में भी माहिर हैं.
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