'इसके प्रावधान और शब्दावली स्पष्ट नहीं…' UGC के 'इक्विटी रेगुलेशन' पर ABVP
एबीवीपी का आरोप है कि यूजीसी जिस “समता” को लागू करने की बात कर रहा है, उसकी कोई ठोस परिभाषा तय नहीं की गई है.
Written By Kumar Gaurav

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उच्च शिक्षा में समता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ अब विवादों के घेरे में आ गए हैं. एबीवीपी ने इन विनियमों के उद्देश्य को स्वीकार करते हुए भी इसके प्रावधानों और शब्दावली को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है. कहा है कि अस्पष्ट नियम शैक्षणिक परिसरों में सौहार्द की बजाय भ्रम और विभाजन को जन्म दे सकते हैं.
एबीवीपी का कहना है कि यूजीसी जिस “समता” की बात कर रहा है, उसकी न तो स्पष्ट परिभाषा दी गई है और न ही उसके क्रियान्वयन की ठोस रूपरेखा सामने रखी गई है. संगठन के अनुसार नियमों की भाषा व्याख्या-निर्भर है, जिससे विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों के बीच अनिश्चितता बढ़ रही है.
संगठन ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि विनियम पूरी तरह संतुलित और स्पष्ट हैं, तो फिर देशभर के शैक्षणिक परिसरों में असमंजस क्यों है? एबीवीपी का आरोप है कि नीति निर्माण के दौरान व्यापक संवाद का अभाव रहा और अब बिना स्पष्टता के इन नियमों को लागू करने की कोशिश की जा रही है, जो परिसरों में तनाव की स्थिति बना सकती है.
मामला वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद यूजीसी की ओर से ठोस और सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने न आने को लेकर भी एबीवीपी ने नाराजगी जताई है. संगठन ने मांग की है कि आयोग शीघ्र हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करे कि इन विनियमों की मंशा, दायरा और सीमाएं क्या हैं?
एबीवीपी के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि शैक्षणिक परिसरों में समानता और सौहार्द अनिवार्य है. समता के नाम पर ऐसी अस्पष्ट नीतियां स्वीकार्य नहीं हैं जो नए भेदभाव की आशंका पैदा करें. उन्होंने कहा कि सभी हितधारकों से संवाद कर भ्रम दूर करना यूजीसी की जिम्मेदारी है.
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