क्या स्मार्टफोन कमजोर कर रहा है आपकी याद्दाश्त? जानिए क्या है गूगल इफेक्ट
Memory Loss Study: आजकल हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए लोग तुरंत गूगल का सहारा लेते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर बात के लिए फोन और इंटरनेट पर निर्भर रहना आपकी याद्दाश्त को कैसे प्रभावित करता है?
Written By: Seema Thakur|Updated: May 20, 2026 17:07
Edited By : Seema Thakur|Updated: May 20, 2026 17:07
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फोन किस तरह याद्दाश्त पर असर डालता है, जानिए यहां.
हाइलाइट्स
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गूगल इफेक्ट के मुख्य बिंदु
गूगल इफेक्ट का अर्थ है कि इंटरनेट पर जानकारी आसानी से उपलब्ध होने के कारण लोग उसे याद रखने की बजाय यह याद रखते हैं कि जानकारी कहाँ मिलेगी।
साल 2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजी प्रोफेसर बेट्सी स्पैरो ने इस विषय पर एक अध्ययन किया था।
गूगल इफेक्ट को 'डिजिटल एमनेशिया' भी कहा जाता है, जहाँ व्यक्ति को लगता है कि जब जानकारी आसानी से मिल रही है तो उसे याद रखने की मेहनत क्यों की जाए।
तकनीक पर निर्भरता के प्रभाव
मोबाइल कीपैड का प्रेडिक्टिव टेक्स्ट फीचर भी व्यक्ति की याददाश्त और नई चीजें सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
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What Is Google Effect: इस बात से कोई अनजान नहीं है कि हर चीज हमारे फोन पर उपलब्ध रहने के कारण हमने उन चीजों को याद करना ही छोड़ दिया है, चाहे किसी का फोन नंबर हो या घर का पता और आइडी नंबर. लेकिन, यह आम सी लगने वाली चीज असल में आपकी याद्दाश्त (Memory) से खिलवाड़ कर रही है. हर चीज के लिए फोन पर निर्भरता इंसान की याद रखने की क्षमता को कम कर रहा है. यही है गूगल इफेक्ट जिसपर साल 2011 में एक स्टडी भी आई थी.
क्या है गूगल इफेक्ट
साल 2011 में एक स्टडी आई थी जिसमें इस बात पर चर्चा की गई थी कि किस तरह गूगल या इंटरनेट और फोन पर पूरी तरह निर्भर हो जाना इंसानी मेमोरी को प्रभावित कर रहा है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजी प्रोफेसल बेट्सी स्पैरो ने यह स्टडी की थी जिसमें उन्होंने पाया कि जब लोगों को पता होता है कि कोई जानकारी उन्हें ऑनलाइन मिल जाएगी तो वह उसे याद रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि इस बात पर फोकस करते हैं कि वो जानकारी उन्हें कहां से मिली है. यही गूगल इफेक्ट है. गूगल इफेक्ट को डिजिटल एमनेशिया भी कहते हैं.
इसमें व्यक्ति को लगता है कि जब उसे सारी जानकारी आसानी से मिल ही रही है तो वह भला उन चीजों को याद रखने की मेहनत क्यों करे. रिसर्चर्स के अनुसार, इंटरनेट ने इंसानी दिमाग तो आउटसोर्स मेमोरी की तरह काम करने पर मजबूर कर दिया है, यानी दिमाग खुद चीजें याद रखने के बजाय तकनीक पर भरोसा करने लगा है. हालांकि, तकनीक पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन इसपर जरूरत से ज्यादा निर्भरता मानसिक क्षमता को प्रभालित कर सकती है.
कीबोर्ड का प्रेडिक्टेबल हो जाना
लेकिन, फोन से जुड़ी अब एक और दिक्कत दिखने लगी है, यह है मोबाइल कीपैड का हर चीज को प्रेडिक्ट करना. आप जो लिख रहे हैं आपका कीबोर्ड आपके पूरा वाक्य लिखने से पहले ही आपको सजेशन देने लगता है कि आपको आगे क्या लिखना चाहिए. ऐसे में अगर फोन का कीबोर्ड ही हमारी जगह सोचने का काम करने लगेगा तो हम क्या सोचेंगे? इससे ना सिर्फ व्यक्ति की याद्दाश्त कमजोर होगी बल्कि उसे नई चीजें सीखने की जरूरत भी महसूस नहीं होगी. ऐसे में फोन पर पूरी तरह निर्भरता याद्दाश्त पर असर डाल सकती है.
अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.
What Is Google Effect: इस बात से कोई अनजान नहीं है कि हर चीज हमारे फोन पर उपलब्ध रहने के कारण हमने उन चीजों को याद करना ही छोड़ दिया है, चाहे किसी का फोन नंबर हो या घर का पता और आइडी नंबर. लेकिन, यह आम सी लगने वाली चीज असल में आपकी याद्दाश्त (Memory) से खिलवाड़ कर रही है. हर चीज के लिए फोन पर निर्भरता इंसान की याद रखने की क्षमता को कम कर रहा है. यही है गूगल इफेक्ट जिसपर साल 2011 में एक स्टडी भी आई थी.
क्या है गूगल इफेक्ट
साल 2011 में एक स्टडी आई थी जिसमें इस बात पर चर्चा की गई थी कि किस तरह गूगल या इंटरनेट और फोन पर पूरी तरह निर्भर हो जाना इंसानी मेमोरी को प्रभावित कर रहा है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजी प्रोफेसल बेट्सी स्पैरो ने यह स्टडी की थी जिसमें उन्होंने पाया कि जब लोगों को पता होता है कि कोई जानकारी उन्हें ऑनलाइन मिल जाएगी तो वह उसे याद रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि इस बात पर फोकस करते हैं कि वो जानकारी उन्हें कहां से मिली है. यही गूगल इफेक्ट है. गूगल इफेक्ट को डिजिटल एमनेशिया भी कहते हैं.
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इसमें व्यक्ति को लगता है कि जब उसे सारी जानकारी आसानी से मिल ही रही है तो वह भला उन चीजों को याद रखने की मेहनत क्यों करे. रिसर्चर्स के अनुसार, इंटरनेट ने इंसानी दिमाग तो आउटसोर्स मेमोरी की तरह काम करने पर मजबूर कर दिया है, यानी दिमाग खुद चीजें याद रखने के बजाय तकनीक पर भरोसा करने लगा है. हालांकि, तकनीक पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन इसपर जरूरत से ज्यादा निर्भरता मानसिक क्षमता को प्रभालित कर सकती है.
कीबोर्ड का प्रेडिक्टेबल हो जाना
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लेकिन, फोन से जुड़ी अब एक और दिक्कत दिखने लगी है, यह है मोबाइल कीपैड का हर चीज को प्रेडिक्ट करना. आप जो लिख रहे हैं आपका कीबोर्ड आपके पूरा वाक्य लिखने से पहले ही आपको सजेशन देने लगता है कि आपको आगे क्या लिखना चाहिए. ऐसे में अगर फोन का कीबोर्ड ही हमारी जगह सोचने का काम करने लगेगा तो हम क्या सोचेंगे? इससे ना सिर्फ व्यक्ति की याद्दाश्त कमजोर होगी बल्कि उसे नई चीजें सीखने की जरूरत भी महसूस नहीं होगी. ऐसे में फोन पर पूरी तरह निर्भरता याद्दाश्त पर असर डाल सकती है.
अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.