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प्रेग्नेंसी में डायबिटीज क्यों हो जाती है? डॉक्टर ने बताए कारण, कैसे होगा इलाज और बचने के लिए क्या करना है जरूरी

Diabetes In Pregnancy: डॉ. यशदीप गुप्ता, एम्स दिल्ली के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर से जानिए गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज जिसे जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं क्यों होती है और इससे किस तरह से बचा जा सकता है.

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Gestational Diabetes: गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज होने को जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं. कई महिलाओं में डिलीवरी के बाद ब्लड शुगर लेवल्स नॉर्मल हो जाते हैं तो ऐसी भी कई महिलाए हैं जो डायबिटीज (Diabetes) की दिक्कत से दोचार होने लगती हैं. ऐसे में प्रेग्नेंसी में डायबिटीज को लेकर खास सावधानी बरतना जरूरी होता है. AIIMS दिल्ली के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. यशदीप गुप्ता से जानिए जेस्टेशनल डायबिटीज क्या है, यह किन महिलाओं को प्रभावित करती है, इसका बच्चे पर क्या असर पड़ता है और इससे किस तरह बचकर रहा जा सकता है.

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प्रेग्नेंसी में डायबिटीज का पता कैसे चलता है

डॉ. यशदीप गुप्ता बताते हैं कि जेस्टेशनल डायबिटीज तब होती है जब गर्भावस्था के दौरान पहली बार हाई ब्लड शुगर लेवल (High Blood Sugar Levels) का पता चलता है. हर 7 में से 1 महिला को यह स्थिति प्रभावित करती है. यह डायबिटीज गर्भावस्था के दौरान और बाद में मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर असर डालती है. इस डायबिटीज का पता लगाने के लिए गर्भावस्था के 24 से 28 सप्ताह के बीच 75 ग्राम ग्लूकोज का टेस्ट किया जाता है. खून के नमूने खाली पेट 1 या 2 घंटे बाद लिए जाते हैं. अगर रिजल्ट्स कट ऑफ से ज्यादा हो तो डायबिटीज का पता चलता है. डायबिटीज के जोखिम वाली महिलाओं के लिए 24 सप्ताह से पहले टेस्ट करवाना जरूरी होता है. जिनमें जोखिम ना दिखे उनमें शुरुआती गर्भावस्था में फास्टिंग प्लाज्मा टेस्ट किया जा सकता है.

प्रेग्नेंसी के दौरान क्यों होती है डायबिटीज

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प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज होने में पहले से मौजूद दिक्कतों की बड़ी भूमिका है. मोटापा, ज्यादा उम्र, पीसीओडी, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज का पारिवारिक इतिहास हो या फिर पहली गर्भावस्था में यह डायबिटीज हुई हो तो यह दोबारा होने की संभावना रहती है. डॉक्टर बताते हैं कि गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान शारीरिक रूप से एक्टिव ना रहना और हेल्दी डाइट ना लेना भी डायबिटीज के जोखिम को बढ़ाता है.

प्रेग्नेंसी में डायबिटीज से क्या होता है

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जेस्टेशनल डायबिटीज प्लेसेंटा के विकास को प्रभावित कर सकती है जिससे गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन और प्रीटर्म बर्थ जैसी जटिलताएं आ सकती हैं. यह भूर्ण के विकास को भी प्रभावित कर सकती है जिससे शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म परिणाम दिख सकते हैं.

शॉर्ट टर्म कॉम्प्लिकेशंस में बच्चा बड़े आकार का हो सकता है, पीलिया, सांस लेने में कठिनाई हाइपोग्लाइसीमिया और जन्म के दौरान चोटें जैसी दिक्कतें शामिल हैं.

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लॉन्ग टर्म कॉम्पलिकेशंस में बच्चे मोटापे और डायबिटीज का शिकार हो सकते हैं.

जेस्टेशनल डायबिटीज गर्भवती महिला में भी कई दिक्कतों की वजह बन सकती है, जैसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और दिल की दिक्कतें. डिलीवरी के बाद पहले 10 सालों में डायबिटीज होने का खतरा रहता है. इसीलिए स्क्रीनिंग करवाना जरूरी है.

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प्रेग्नेंसी में डायबिटीज से बचाव और इलाज

  • डॉक्टर कहते हैं कि महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान स्वस्थ आहार (Healthy Diet) का पालन करना चाहिए. रोजाना 1500 से अधिक कैलोरी का सेवन करें जिसे एक्टिविटी, ट्राइमेस्टर और वजन के अनुसार बनाया गया हो.
  • कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट लें.
  • जूस, ठंडे पेयर, चॉक्लेट और बेकरी आइटम से बचें.
  • रोजाना 70 ग्राम प्रोटीन का सेवन करें.
  • 3 मुख्य भोजन और 3 से 4 नाश्ते खाएं.
  • सब्जियां, फल, कम फैट वाला दूध और डेयरी उत्पाद अपनी डाइट में शामिल करें.
  • रोजाना कम से कम 28 ग्राम फाइबरयुक्त भोजन का सेवन करें.
  • डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए एक्सरसाइज करना बेहद जरूरी है. एक्सरसाइज ब्लड शुगर को नियंत्रित करने, वेट कंट्रोल और ओवलऑल हेल्थ सुधारने में मदद करती है.
  • रोजाना 30 मिनट चलना इंसुलिन की आवश्यक्ता को कम करता है, दिल की सेहत को बेहतर करता है और कॉम्प्लिकेशन के रिस्क को को कम करता है. लेकिन, एक्सरसाइज करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें.

डायबिटीज में दवा की जरूरत

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अगर लाइफस्टाइल में बदलाव करने पर भी डायबिटीज कम नहीं होती है तो दवाओं की जरूरत पड़ सकती है. लेकिन, अगर शुगर लेवल बहुत ज्यादा नहीं है और कोई अन्य समस्या नहीं है तो डॉक्टर नॉर्मल दवा दे सकते हैं. गर्भकालीन डायबिटीज और बेहतर तरह से डिलीवरी हो इसके लिए ब्लड शुगर पर नजर रखना जरूरी है.

अगर शुरुआती परीक्षणों में गर्भवती महिला का शुगर लेवल ज्यादा होता है तो खाना खाने से पहले और बाद में दिन में 6 बार तक शुगर लेवल की निगरानी की आवश्यक्ता होती है. अगर शुगर लेवल नॉर्मल है और कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं है तो दिन में 2 बार निगरानी की जा सकती है. डॉक्टर आपकी कंडीशन को देखते हुए निगरानी कितनी बार करनी है यह बता सकते हैं.

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अस्वीकरण – इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें. न्यूज 24 किसी तरह का दावा नहीं करता है.

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Source - AIIMS

First published on: Aug 26, 2026 10:24 AM

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