भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसे पूरी तरह इस्तेमाल करने के लिए जरूरी बैटरी स्टोरेज और बिजली ग्रिड का ढांचा अभी भी पर्याप्त नहीं है. नतीजतन, दोपहर के समय जब सोलर प्लांट सबसे अधिक बिजली बनाते हैं, तब उस बिजली का एक हिस्सा उपयोग में नहीं आ पाता और उसे ग्रिड से हटाना (curtailment) पड़ता है.

भारत आज के समय में पहले से कहीं ज्यादा सौर ऊर्जा (solar power) पैदा कर रहा है. लेकिन बड़ी समस्या यह है कि इस बिजली को संभालकर रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. इसलिए दोपहर में बनने वाली काफी सौर बिजली बेकार चली जाती है.

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हर दिन इतनी सौर बिजली बर्बाद हो रही है कि उससे दिल्ली की रोज की बिजली जरूरत का एक बड़ा हिस्सा पूरा किया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि भारत के पास अभी इतनी बैटरी स्टोरेज और आधुनिक बिजली ग्रिड नहीं है, जो दिन में बनने वाली अतिरिक्त बिजली को शाम के लिए बचाकर रख सके.

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मई 2026 तक 29% हुई बिजली उत्पादन क्षमता

देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में सोलर पावर का हिस्सा 2015-16 में सिर्फ 2% था, जो मई 2026 तक बढ़कर लगभग 29% हो गया है. जिसके कारण दिन के समय तेजी से बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने और कोयले पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है. लेकिन इस सफलता ने भारत के ऊर्जा बदलाव (Energy Transition) में एक नई कमजोरी को भी उजागर किया है.

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दुनिया में कार्बन डाइऑक्साइड का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के चलते, भारत ने फॉसिल फ्यूल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी का तेजी से विस्तार किया है. लेकिन भारत जितनी तेजी से बिजली पैदा कर रहा है, उतनी ही तेजी से उसे स्टोर और इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है. जिसके नतीजे भी दिखने लगे हैं. 6 जुलाई को कुछ समय के लिए, भारत की बिजली की आधी जरूरत रिन्यूएबल स्रोतों से पूरी हुई.

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स्टोरेज क्षमता बढ़ाने और ग्रिड मैनेजमेंट की जरूरत

नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने 7 जुलाई को X पर एक पोस्ट में कहा, 'भारत की क्लीन पावर ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है. 6 जुलाई 2026 को सुबह 11:46 बजे, भारत की आधी से ज्यादा बिजली क्लीन एनर्जी स्रोतों से मिली, जबकि सिस्टम की मांग 221 GW तक पहुंच गई थी. भले ही यह कुछ समय के लिए ही पीक पर थी, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि भारत का ग्रिड किस दिशा में आगे बढ़ रहा है.'

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हालांकि, भारत को अब उन सभी रिन्यूएबल स्रोतों से मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल करने पर ध्यान देना चाहिए जिनका वह इस्तेमाल कर रहा है. इसके लिए स्टोरेज क्षमता बढ़ाने और ग्रिड मैनेजमेंट की जरूरत है.

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक वर्किंग पेपर के अनुसार- जिसे EAC-PM के सदस्य संजीव सान्याल और IRS अधिकारी सात्विक देव ने लिखा है, इसमें कहा गया है कि भारत नियमित रूप से इतनी सौर बिजली बर्बाद कर देता है जिससे एक बड़े शहर को बिजली दी जा सकती है. ऐसा इसलिए नहीं है कि मांग कम है, बल्कि इसलिए है क्योंकि बनने के बाद अतिरिक्त बिजली को स्टोर करने की कोई जगह ही नहीं है.

अब सवाल यह नहीं है कि देश पर्याप्त बिजली पैदा कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह सौर बिजली तब उपलब्ध करा सकता है जब उपभोक्ताओं को वास्तव में इसकी जरूरत हो.

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भारत का पावर ग्रिड 'डक कर्व' की ओर बढ़ रहा

हर 15 मिनट में रिकॉर्ड किए गए बिजली के डेटा के आधार पर, EAC-PM की रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत का पावर ग्रिड "डक कर्व" (duck curve) जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है. इसका मतलब है कि दिन के समय, भरपूर सोलर पावर से देश की बिजली की ज्यादातर जरूरत पूरी हो जाती है. लेकिन सूरज डूबने के बाद, जब सोलर पैनल बिजली बनाना बंद कर देते हैं, तब भी बिजली की मांग ज्यादा बनी रहती है. ऐसे में पावर प्लांट को तेजी से इस कमी को पूरा करना पड़ता है.

वहीं, दिन में सोलर पावर ग्रिड में बहुत ज्यादा मात्रा में आती है. चूंकि भारत के इलेक्ट्रिसिटी रूल्स, 2021 के तहत सोलर पावर को "फर्स्ट-रन" या "मस्ट-रन" का दर्जा मिला हुआ है, इसलिए इसे कोयला और गैस प्लांट से पहले ग्रिड में भेजा जाता है.

जैसे-जैसे सुबह के समय सोलर से बिजली का उत्पादन बढ़ता है, पारंपरिक जनरेटरों को तेजी से अपना उत्पादन कम करना पड़ता है. लेकिन, दोपहर तक सोलर से बिजली का उत्पादन ठीक उसी समय कम होने लगता है जब घरों में बिजली की मांग बढ़ने लगती है. ऐसे में, शाम की मांग को पूरा करने के लिए कोयले, हाइड्रो और गैस से चलने वाले पावर प्लांट को बहुत तेजी से बिजली बनानी पड़ती है.

EAC-PM की रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन सालों में सोलर, कोयला और हाइड्रोपावर के बीच यह बदलाव बहुत तेजी से हुआ है. मई 2023, 2025 और 2026 में गर्मियों के औसत दिनों की तुलना करने पर पता चलता है कि कोयले, तेल और नैचुरल गैस से होने वाली पारंपरिक बिजली सप्लाई (Conventional power supply) में सुबह के समय कमी (रैंप-डाउन) लगभग तीन गुना हो गई. मई 2023 में यह लगभग 18 गीगावाट (GW) थी जो मई 2026 में बढ़कर लगभग 53 GW हो गई, जबकि इस दौरान सिस्टम में सोलर एनर्जी की भारी सप्लाई हो रही थी.

बता दें कि एक गीगावाट, एक अरब (1 बिलियन) वॉट के बराबर होता है. एक गीगावाट बिजली, एक करोड़ (10 मिलियन) 100-वॉट के बल्ब जलाने के लिए काफी होती है. वहीं, शाम के समय बिजली की मांग और आपूर्ति में उतार-चढ़ाव (रैम्प-अप) लगभग दोगुना हो गया है; यह मई 2023 में लगभग 36 GW से बढ़कर मई 2026 तक लगभग 74 GW हो गया है.

स्टोरेज की कमी के कारण ग्रिड की एनर्जी हो रही बर्बाद

EAC-PM की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले मई 2026 में भारत में लगभग 747 GWh सोलर बिजली का उत्पादन रोकना पड़ा. औसतन हर दिन लगभग 24 GWh सोलर बिजली बंद करनी पड़ी या बर्बाद हो गई, ऐसा या तो इसलिए हुआ क्योंकि ग्रिड उसे ले नहीं पा रहा था, या फिर सिस्टम की स्थिरता बनाए रखने के लिए बने सहायक मार्केट मैकेनिज्म की वजह से ऐसा करना पड़ा.

747 GWh (गीगावाट-घंटे) इतनी बिजली है कि इससे एक करोड़ (10 मिलियन) 100-वाट के बल्ब लगभग 75 घंटे, यानी तीन दिन से भी ज्यादा समय तक लगातार जलाए जा सकते हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में हर रोज लगभग 90 GWh बिजली की खपत होती है. वहीं, भारत हर दिन इतनी सौर बिजली बर्बाद कर देता है जिससे राजधानी के एक-चौथाई हिस्से को बिजली दी जा सकती है और फिर कुछ घंटों बाद ही उसे बिजली की कमी का सामना करना पड़ता है.

अप्रैल और मई 2026 के दौरान, भारत में 61 दिनों में से केवल छह दिन सौर ऊर्जा के पीक समय (जब सबसे ज्यादा सौर ऊर्जा बनती है) के दौरान बिजली की कमी हुई.

भारत के सोलर एनर्जी स्टोरेज सबसे बड़ी समस्या

EAC-PM पेपर का तर्क है कि एनर्जी स्टोरेज भारत के सौर ऊर्जा बदलाव का एक जरूरी हिस्सा है. अनुमान है कि गर्मियों में शाम के समय बिजली की बढ़ती मांग (डिमांड रैंप) को आधा भी कम करने के लिए, दोपहर 1 बजे से रात 8 बजे के बीच लगभग 130 GWh स्टोर की गई बिजली की जरूरत होगी. फिर भी, भारत का पूरा बैटरी और पंप-स्टोरेज सिस्टम अभी एक औसत दिन में केवल 23.8 GWh बिजली ही सप्लाई कर पाता है.

भारत ने हाल के वर्षों में सौर ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि की है, लेकिन ऊर्जा भंडारण (Energy Storage) की क्षमता उसी गति से नहीं बढ़ी. सोलर पैनल दिन में सबसे अधिक बिजली पैदा करते हैं, जबकि बिजली की सबसे ज्यादा मांग शाम और रात में होती है. इस समय सौर उत्पादन लगभग शून्य हो जाता है.

चूंकि अतिरिक्त बिजली को बड़े पैमाने पर स्टोर करने की सुविधा सीमित है, इसलिए दिन में बनने वाली काफी सौर ऊर्जा का पूरा लाभ नहीं मिल पाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को बैटरी स्टोरेज, पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज और ट्रांसमिशन नेटवर्क में तेजी से निवेश करना होगा, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा का अधिकतम उपयोग हो सके.

बिजली मांग लगभग 300 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान

देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. डेटा सेंटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और औद्योगिक विकास के कारण आने वाले वर्षों में पीक बिजली मांग लगभग 300 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है. ऐसे में मजबूत ग्रिड और स्टोरेज सिस्टम की आवश्यकता और बढ़ जाएगी.

भारत की चुनौती अब केवल अधिक सौर ऊर्जा पैदा करना नहीं है, बल्कि उसे सही समय पर सुरक्षित रखना और जरूरत पड़ने पर उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है. यदि स्टोरेज और बिजली वितरण ढांचे को मजबूत नहीं किया गया, तो स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ने के बावजूद उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा.