'अल नीनो' क्या है, जो बदल सकता है वर्ल्ड क्लाइमेट, भारत पर कैसा होगा असर?

What is El Nino: अल नीनो इफेक्ट के बारे में आजकल अक्सर सुनने को मिलता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये मौसम और ग्लोबल क्लाइमेटिक कंडीशन को कैसे अफेक्ट कर सकता है, साथ ही भारत इसका कैसा असर पड़ने की संभावना है.

Drought PTI

'अल नीनो' का असर भारत पर भी पड़ सकता है (Photo-PTI)

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El Nino Explained: अल नीनो एक नेचुरल वेदर पैटर्न है जो तब बनता है जब मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. ये बदलाव नॉर्मल एटमॉस्फेरिक सर्कुलेशन और बारिश के पैटर्न को बिगाड़ सकता है, जिससे कई महाद्वीपों में वेदर कंडीशन अफेक्ट होते हैं. अल नीनो की घटनाएं आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होती हैं, हालांकि इनकी टाइमिंग और इंटेंसिटी में काफी अंतर हो सकता है. ये घटना पिछली बार 2023-24 के दौरान देखी गई थी और ये दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हद से ज्यादा गर्मी, सूखे, भारी बारिश और तूफान लाने के लिए जानी जाती है.

ग्लोबल वार्मिंग के साथ कनेक्शन

अल नीनो और इंसानों की वजह से होने वाला जलवायु परिवर्तन अलग-अलग प्रॉसेस हैं, लेकिन इनके असर एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं. ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ने से बेसलाइन कंडीशन गर्म हो सकते हैं, जबकि अल नीनो की घटना अस्थायी रूप से तापमान और मौसम की अन्य चरम स्थितियों को और बढ़ा सकती है. वैज्ञानिक अभी भी इस बात की स्टडी कर रहे हैं कि क्या ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल नीनो की घटनाएं ज्यादा बार हो रही हैं या ज्यादा इंटेंस हो रही हैं. कुछ रिसर्च बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन अल नीनो से जुड़े बारिश के पैटर्न को बदल सकता है, लेकिन रिसर्चर्स का कहना है कि इनके बीच डायरेक्ट लिंक स्थापित करने के लिए अभी पर्याप्त सबूत नहीं हैं.

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क्या ये ‘सुपर अल नीनो’ बन सकता है?

साइंटिस्ट्स अल नीनो की इंटेंसिटी का पता लगाने के लिए समंदर के तापमान के मेजरमेंट का यूज करते हैं. हालांक आज की घटनाओं की तुलना पुरानी घटनाओं से करना ज्यादा जटिल हो गया है क्योंकि पृथ्वी के गर्म होने के साथ-साथ प्रशांत महासागर का तापमान भी बढ़ा है. पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में बहुत ज्यादा तापमान एटमॉस्फेरिक सर्कुलेशन में बड़े बदलाव ला सकता है. अगर हद से ज्यादा वार्म कंडीशन बने रहते हैं, तो इसकी वजह से होने वाला अल नीनो दुनिया के कई हिस्सों में असामान्य रूप से ज्यादा असर डाल सकता है.



दुनिया के इन इलाकों पर असर

अल नीनो की वजह से अमेजन में सूखे का खतरा बढ़ सकता है और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा और जंगल की आग जैसे हालात बन सकते हैं. प्रशांत महासागर के तटीय इलाकों में तापमान बढ़ सकता है, जबकि दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों में बारिश के पैटर्न में बड़ा बदलाव आ सकता है. यूरोप के कुछ रीजन में भी मौसम का अजीब मिजाज देखने को मिल सकता है, हालांकि वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि मौसम की किसी खास घटना को सीधे तौर पर अल नीनो से नहीं जोड़ा जा सकता, खासकर तब जब ग्लोबल वार्मिंग और एटमॉस्फेरिक सर्कुलेशन जैसे दूसरे फैक्टर्स भी शामिल हों.

भारत के लिए अल नीनो कितना खतरनाक?

भारत अल नीनो को लेकर खास तौर से सेंसेटिव है क्योंकि इसका कनेक्शन साउथ वेस्ट मानसून से है. ऐतिहासिक रूप से अल नीनो का कनेक्शन अक्सर भारत के कुछ हिस्सों में कमजोर मानसून बारिश से रहा है, हालांकि ये रिश्ता हमेशा एक जैसा नहीं होता और हर घटना के साथ बदलता रहता है.

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कमजोर मानसून खेती, पानी की अवेलेबिलिटी, जलाशयों के जलस्तर और ग्रामीण आय को प्रभावित कर सकता है. साथ ही अल नीनो तापमान बढ़ने में योगदान दे सकता है, जिससे बिजली की डिमांड, फसलों और पब्लिक हेल्थ पर प्रेशर बढ़ सकता है. हालांकि, भारत का मानसून कई दूसरे फैक्टर्स से भी अफेक्ट होता है, जिसमें ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ भी शामिल है, इसलिए सिर्फ अल नीनो की घटना देश में मौसमी बारिश को डिसाइड नहीं कर सकती है.

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क्या रिस्क को कम किया जा सकता है?

आज के दौर में सबसे बड़ा फायदा बेहतर पूर्वानुमान है. हमारा मॉडर्न क्लाइमेट सिस्टम किसी बड़े अल नीनो के बनने से कई महीने पहले ही चेतावनी दे सकती हैं, जिससे सरकारें, किसान और समुदाय संभावित सूखे, बाढ़, लू र जंगल की आग के लिए तैयारी कर सकें. पानी को ठंडा करने की कोशिशें शामिल हैं, लेकिन उनकी इफेक्टिवनेस और संभावित नतीजों के बारे में अभी कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. चूंकि अल नीनो दुनिया भर में खेती, जल संसाधनों और इकॉनमी को प्रभावित करता है, इसलिए बेहतर समंदर की मॉनिटरिंग और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम देशों को इसके इफेक्ट के लिए तैयार होने में मदद कर सकती हैं.

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लेखक के बारे में

Shariqul Hoda

Shariqul Hoda

न्यूज़ 24 डिजिटल में शारिकुल होदा सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. मुख्य तौर पर वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरें लिखते हैं. शारिकुल ने 2008 में दूरदर्शन में बतौर इंटर्न अपनी शुरुआत की, इसके बाद वह दैनिक जागरण, टीवी टुडे नेटवर्क, जनसंदेश, श्री न्यूज़, भारत खबर, स्पोर्ट्सकीड़ा, WION और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने 3 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव से लेकर देश की बड़ी घटनाओं को कवर किया है. अपने डेढ़ दशक के मीडिया करियर में शारिकुल ने देश की राजनीति, इंटरनेशनल डिप्लोमेसी, खेलकूद से जुड़ी घटनाओं की अच्छी समझ हासिल की है. कितने साल का तजुर्बा: 16 साल शिक्षा: शारिकुल ने बैंगलोर यूनिवर्सिटी (आचार्य इंस्टीट्यूट) से बीए जर्नलिज्म और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (एपीजे इंस्टीट्यूट) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है.
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