---विज्ञापन---

Explainer angle-right

क्या था बोफोर्स केस? 40 साल बाद जिसका सुप्रीम कोर्ट ने किया कानूनी अंत, घोटाले से हिल गई थी राजीव गांधी सरकार

Bofors Case: बोफोर्स मामले में जांच एजेंसी और अन्य पक्षों की ओर से समय-समय पर मामले को दोबारा खोलने की कोशिश होती रही, लेकिन कोर्ट में आरोपों को सही साबित करने वाली कड़ी आज तक नहीं बन सकी.

---विज्ञापन---

करीब चार दशक तक भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था में चर्चा का केंद्र रहा बोफोर्स मामले का अब कानूनी अंत हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली आखिरी लंबित याचिका खारिज कर दी. इस फैसले के साथ ही हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश हथियार कंपनी एबी बोफोर्स से जुड़े केस को दोबारा खोलने की कोशिश पर भी विराम लग गया. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में इतने लंबे समय बाद आगे की सुनवाई की जरूरत पर सवाल उठाया. बोफोर्स केस की फाइल बंद होने के बाद अब ये मामला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. आइए जानते हैं क्या था ये घोटाला, जिसने हिला दी थी राजीव गांधी सरकार की नींव.

क्या बोफोर्स घोटाला?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बोफोर्स विवाद की शुरुआत 24 मार्च 1986 को हुई. इसी दिन तत्कालीन भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से 400 बोफोर्स 155 एमएम हॉवित्जर तोपें खरीदने के लिए करीब 1437 करोड़ रुपये का समझौता किया. अगले ही साल स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि सौदे को हासिल करने के लिए कथित तौर पर करीब 64 करोड़ रुपये की अवैध दलाली दी गई. रिपोर्ट में दावा किया गया कि तोप बनाने वाली कंपनी एबी बोफोर्स ने भारत सरकार के बड़े नेताओं और रक्षा विभाग के अधिकारियों को घूस खिलाई थी. इसके बाद यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में बदल गया.

---विज्ञापन---

यह भी पढे़ं: ‘टेंशन मत लीजिए, मैं हूं आपके साथ’, 45 बागी सांसदों से बोले PM मोदी, ब्रेकफास्ट मीटिंग में दिखे TMC से आए सांसद

घोटाले ने हिलाई राजीव गांधी सरकार की नींव

स्वीडिश रेडियो की रिपोर्ट से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी सरकार की छवि प्रभावित हुई और विपक्ष ने भी इस मामले को लेकर निशाना साधा. उस समय के रक्षा मंत्री वीपी सिंह को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके सामने कई और आरोप लगे जिसने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया. बोफोर्स के चलते 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी को नुकसान उठाना पड़ा और कांग्रेस चुनाव हार गई. बोफोर्स घोटाला केस में राजीव गांधी समेत कई बड़े नेताओं पर आरोप लगे, लेकिन उन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके.

---विज्ञापन---

2005 में ही खत्म हो चुका था केस

आपको बता दें कि इस मामले में CBI ने जनवरी 1990 में FIR दर्ज कर जांच शुरू की. करीब एक दशक की जांच के बाद 1999 में चार्जशीट दाखिल की गई. हालांकि 31 मई 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खत्म कर दी. अदालत ने अभियोजन के पास आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं होने की बात कही थी.

यह भी पढ़ें: Video: अभिजीत दीपके ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल, बोले- लोकतंत्र ऐसे नहीं चलेगा, तय करनी पड़ेगी जवाबदेही

---विज्ञापन---

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन CBI की अपील भी लंबे विलंब के कारण 2018 में खारिज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने उस समय 4,522 दिनों की देरी को गंभीरता से लिया और कहा कि देरी की पर्याप्त वजह नहीं बताई गई.

चार दशक बाद सुप्रीम कोर्ट ने लगाया फुल स्टॉप

बोफोर्स मामले में जांच एजेंसी और अन्य पक्षों की ओर से समय-समय पर मामले को दोबारा खोलने की कोशिश होती रही, लेकिन कोर्ट में आरोपों को सही साबित करने वाली कड़ी आज तक नहीं बन सकी. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के साथ इस मामले से जुड़ी आखिरी कानूनी चुनौती भी खत्म हो गई है. बोफोर्स अब सिर्फ एक अदालती मामला नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार, रक्षा सौदों और सत्ता की जवाबदेही पर दशकों तक चली बहस की एक मिसाल के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया है.

---विज्ञापन---

First published on: Aug 07, 2026 01:33 PM

End of Article

About the Author

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला (Akarsh Shukla) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में वो News 24 Digital टीम को शिफ्ट हेड के तौर पर लीड कर रहे हैं। आकर्ष शुक्ला की विशेषज्ञता प्रिंट, डिजिटल मीडिया (वेबसाइट) और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से खबरों को सजीव और प्रभावी रूप में पेश करने में है। देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों के साथ-साथ आकर्ष को मनोरंजन, लाइफस्टाइल, ट्रेंडिंग और खेल जगत की खबरों का भी बखूबी ज्ञान है। आकर्ष शुक्ला, पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम मानते हैं।

Read More

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला (Akarsh Shukla) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में वो News 24 Digital टीम को शिफ्ट हेड के तौर पर लीड कर रहे हैं। आकर्ष शुक्ला की विशेषज्ञता प्रिंट, डिजिटल मीडिया (वेबसाइट) और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से खबरों को सजीव और प्रभावी रूप में पेश करने में है। देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों के साथ-साथ आकर्ष को मनोरंजन, लाइफस्टाइल, ट्रेंडिंग और खेल जगत की खबरों का भी बखूबी ज्ञान है। आकर्ष शुक्ला, पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम मानते हैं।

Read More
---विज्ञापन---
संबंधित खबरें
Sponsored Links by Taboola