इंटरनेट और तकनीक ने दुनिया को एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है, लेकिन भारत में आज भी एक ऐसा समुदाय मौजूद है जो आधुनिक समाज से पूरी तरह अलग जीवन जीता है. देश की सीमाओं के भीतर रहने के बावजूद इन लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग न के बराबर है. यही वजह है कि वे सामान्य सरकारी जनगणना प्रक्रिया में भी शामिल नहीं होते हैं. आखिर कौन हैं ये लोग और कैसी है उनकी दुनिया? आइए जानते हैं.
जनगणना से दूर क्यों ये भारतीय लोग?
भारत में रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा हर दस साल में होने वाली जनगणना में दर्ज होता है. लेकिन अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में एक ऐसा समुदाय भी है, जिसके बारे में सरकार के पास आज भी पूरी और सटीक आबादी का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. यह समुदाय नॉर्थ सेंटिनल द्वीप पर रहने वाले सेंटिनलीज लोगों का है. बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग रहना और किसी भी तरह के संपर्क से दूरी बनाए रखना इनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान है.
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नॉर्थ सेंटिनल द्वीप अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का हिस्सा है और करीब 60 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. यहां रहने वाले सेंटिनलीज समुदाय को दुनिया की सबसे अलग-थलग जनजातियों में गिना जाता है. इनके इतिहास और उत्पत्ति को लेकर कई वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं, लेकिन समुदाय के लोगों से सीधा संपर्क बेहद सीमित रहा है. यही वजह है कि इनकी वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं.
बाहरी दुनिया से संपर्क न के बराबर
सेंटिनलीज लोग बाहरी दुनिया से संपर्क स्थापित करने में कोई रुचि नहीं दिखाते हैं. वे मुख्य रूप से शिकार, मछली पकड़ने और जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर रहते हैं. तटीय इलाकों में मछली पकड़ने के लिए छोटी नावों का इस्तेमाल करते हैं और पारंपरिक तौर पर तीर-धनुष के जरिए शिकार करते हैं. आधुनिक तकनीक और बाहरी जीवनशैली से उनका संपर्क लगभग न के बराबर है.
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55,000 सालों से इस द्वीप पर रह रहा ये समुदाय
बता दें कि नॉर्थ सेंटिनल द्वीप भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का हिस्सा माना जाता है. ये द्वीप सिर्फ 60 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है. कुछ रिपोर्ट में ये भी सामने आया है कि ये समुदाय इस द्वीप पर पिछले 55,000 सालों से रह रहा है. इतना ही नहीं, वैज्ञानिक आधार पर इन्हें अफ्रीका से बाहर निकलने वाली पहली मानव प्रजाति का सीधा वंशज माना जाता है.
नहीं है किसी भी बाहरी को जाने की अनुमति
वहीं, इस टापू की दिलचस्प बात यह भी है कि ये लोग खुद को क्या कह कर बुलाते हैं यह आज तक कोई भी व्यक्ति जान नहीं सका है. सेंटिनलीज लोग आज भी पूरी तरह से शिकार और वन उपज जुटाने पर निर्भर हैं. आमतौर पर ये लोग धातुओं और आधुनिक तकनीक से कोसो दूर रहते हैं, लेकिन लकड़ी तराशकर बेहद मजबूत और सुंदर छोटी नावें (डोंगी) बनाने में माहिर होते हैं.
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आज तक यहां नहीं पहुंच पाए जनगणना अधिकारी
यूं तो भारत सरकार हर दस साल में देश के हर नागरिक को गिनने के लिए जनगणना अभियान चलाती है लेकिन आज भी इस द्वीप पर जनगणना अधिकारी नहीं पहुंच पाते हैं. इस समुदाय के लोगों को इंसानों की मौजूदगी बिल्कुल भी पसंद नहीं है और यही कारण है कि इनकी कुल आबादी कितनी है इसकी जानकारी भी मौजूद नहीं है.
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सरकार ने क्यों लगा रखा है यहां बैन?
सवाल यह भी है कि जब भारत में जनगणना हर नागरिक तक पहुंचने की कोशिश करती है, तो इस समुदाय की गिनती क्यों नहीं हो पाती? इसकी सबसे बड़ी वजह सरकार की नीति है. सेंटिनलीज समुदाय को बाहरी संपर्क से बचाने के लिए नॉर्थ सेंटिनल द्वीप प्रतिबंधित क्षेत्र है. प्रशासन ने लंबे समय से यह नीति अपनाई है कि द्वीप के करीब जाकर समुदाय के जीवन में हस्तक्षेप न किया जाए.
भारतीय सेना और तटरक्षक बल करते हैं निगरानी
द्वीप की बेहद संवेदनशील स्थिति को देखते हुए भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल आस-पास के समुद्री क्षेत्र पर लगातार नजर बनाए रखते हैं. बाहरी लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध है, इसलिए पर्यटकों या शोधकर्ताओं को यहां जाने की अनुमति नहीं मिलती है. प्रशासन की नीति स्पष्ट रूप से ‘हस्तक्षेप न करने’ की है यानी सुरक्षा और निगरानी सुनिश्चित की जाती है, लेकिन द्वीपवासियों की जीवनशैली, परंपराओं और संस्कृति में किसी तरह का दखल नहीं दिया जाता है. इस लिहाज से यह भारत का एक अनोखा क्षेत्र है, जहां संवैधानिक संप्रभुता देश की है, जबकि स्थानीय समुदाय अपने पारंपरिक तरीके से अपना जीवन संचालित करता है.
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